Home » देश » **”डिजिटल युग का नया परिवार: साथ रहते हैं, पर जुड़े स्क्रीन से ज़्यादा दिल से कम”**

**”डिजिटल युग का नया परिवार: साथ रहते हैं, पर जुड़े स्क्रीन से ज़्यादा दिल से कम”**

अब परिवार नाम की चीज़ भी एक “पुराना मॉडल” हो गई है। पहले जहाँ लोग परिवार बसाते थे, अब “रिलेशनशिप मैनेज” करते हैं। पहले घर में लोग साथ रहते थे, अब ग्रुप चैट में “गुड मॉर्निंग” भेजकर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं। रिश्ते अब भावनाओं से नहीं, नेट स्पीड से चलते हैं।
माँ को अब बेटे की मुस्कान देखने के लिए उसके स्टेटस पर जाना पड़ता है। पिता अब बच्चों से सलाह नहीं लेते, गूगल से लेते हैं। बहन के लिए राखी अब ऑनलाइन आती है — “राखी विद चॉकलेट गिफ्ट हैंपर ₹499” — और भाई “थैंक्यू सिस ❤️” लिखकर भावनाओं का भुगतान कर देता है।
पति-पत्नी के बीच संवाद अब “व्हाट्सऐप नोटिफिकेशन” पर निर्भर है — अगर ब्लू टिक लग जाए तो प्यार है, वरना तकरार। सास-बहू का रिश्ता अब टी.वी. सीरियल्स से कम और रील्स से ज़्यादा प्रभावित होता है। और बच्चे? उन्हें अब यह सिखाना पड़ता है कि “पापा मम्मी से भी बातें की जाती हैं, सिर्फ़ AI से नहीं।”
आज का परिवार एक “इमोशनल स्टार्टअप” बन गया है — जहाँ निवेश कम, अपेक्षाएँ ज़्यादा हैं। सबको अपनी-अपनी आज़ादी चाहिए, पर कोई यह नहीं समझता कि आज़ादी बिना आत्मीयता के, Wi-Fi बिना नेटवर्क जैसी है — सिग्नल तो पूरा दिखता है, पर कनेक्शन नहीं होता।
दरअसल, रिश्ते अब नहीं दरक रहे — वे अपग्रेड हो रहे हैं। पहले दिल से निभाए जाते थे, अब डिजिटल बैलेंस और मूड सेटिंग्स पर। परिवार अब घर नहीं रहा, एक “सहअस्तित्व प्रोजेक्ट” बन गया है — जहाँ लोग रहते साथ हैं, पर जीते अपने-अपने कमरे में, अपने-अपने मोबाइल स्क्रीन पर।

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Author: sssrknews

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