Home » देश » मोदी की लाठी खामोश लेकिन असरदार

मोदी की लाठी खामोश लेकिन असरदार

राजनीतिक विरोधियों की चुनौतियाँ और मोदी नेतृत्व की प्रतिक्रिया: एक विश्लेषण

भारतीय राजनीति में बीते वर्षों में बड़ा बदलाव देखा गया है, जहां कई प्रमुख पत्रकार, कलाकार, बुद्धिजीवी और राजनेता, जो कभी सुर्खियों में रहते थे, अब सोशल मीडिया और यूट्यूब जैसे माध्यमों पर सीमित हो गए हैं। वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और राजनीतिक पकड़ लगातार चर्चा का विषय बनी हुई है।

वरिष्ठ पत्रकारों की बदलती भूमिका

बरखा दत्त, राजदीप सरदेसाई, अजीत अंजुम, पुण्य प्रसून बाजपेयी, अभिसार शर्मा और प्रभु चावला जैसे दिग्गज पत्रकार अब मुख्यधारा मीडिया से हटकर डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सक्रिय हैं। आलोचकों का मानना है कि मौजूदा सरकार के विरोध की कीमत उन्हें अपनी पत्रकारिता की स्थिति से चुकानी पड़ी, वहीं समर्थकों का तर्क है कि यह डिजिटल युग की स्वाभाविक प्रक्रिया है।

बॉलीवुड पर जन प्रतिक्रिया

शाहरुख खान और आमिर खान जैसे सुपरस्टार्स को बीते कुछ वर्षों में अपने बयानों और फिल्मों को लेकर आम जनता की नाराजगी का सामना करना पड़ा। कुछ फिल्मों का बहिष्कार हुआ, जबकि सलमान खान जैसे अभिनेता अपेक्षाकृत सुरक्षित रहे, जिन्हें कई बार सत्ता के करीब देखा गया।

बुद्धिजीवी वर्ग और इतिहासकारों पर सवाल

इरफान हबीब और रोमिला थापर जैसे इतिहासकारों को वर्तमान राजनीतिक विमर्श में किनारे किया गया है। उनके आलोचकों का मानना है कि वे अब भी अपने विचारों को थोपने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि समर्थकों के अनुसार, यह बौद्धिक स्वतंत्रता पर अंकुश का संकेत है।

राजनीतिक गठबंधन और हानि-लाभ

कुमारस्वामी से लेकर उपेंद्र कुशवाहा तक, कई नेताओं ने गठबंधन की राजनीति में भारी उतार-चढ़ाव देखा है। वहीं, कुछ नेता जैसे उदित राज, अपनी विचारधारा बदलते हुए हास्य का पात्र बनते नज़र आए, जबकि रामदास अठावले जैसे नेता सत्ता के साथ बने रहने में सफल रहे।

बोलने की छूट और परिणाम

शत्रुघ्न सिन्हा, यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी जैसे नेताओं को बोलने का मौका जरूर मिला, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें पार्टी से किनारा कर दिया गया। कुछ ने विपक्ष में जगह बनाई, लेकिन प्रभाव सीमित रहा।

मोदी विरोधियों पर दबाव की राजनीति?

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि मेहबूबा मुफ्ती जैसे नेताओं को नजरबंद किया जाना और उद्धव ठाकरे तथा संजय राउत पर जांच एजेंसियों की कार्रवाई यह दर्शाती है कि सरकार विरोधी आवाजों को दबाया जा रहा है। जबकि सरकार समर्थकों का कहना है कि यह कानूनी प्रक्रिया है और राजनीतिक एजेंडे से प्रेरित नहीं।

राम मंदिर और मोदी की छवि

राम मंदिर का निर्माण भाजपा के प्रमुख वादों में से एक रहा है, लेकिन समर्थकों का दावा है कि इसका श्रेय केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नहीं, बल्कि श्रीराम को जाता है। मोदी को कई बार विरोध प्रदर्शनों में पुतला जलाए जाने की घटनाओं का सामना करना पड़ा, लेकिन समर्थकों का दावा है कि उनका व्यक्तित्व इतना मजबूत है कि इन घटनाओं से उनकी छवि पर असर नहीं पड़ा।

विरोधियों से दूरी रखने का लाभ?

नवीन पटनायक जैसे नेताओं ने मोदी का खुलकर विरोध नहीं किया और उन्हें केंद्र के साथ सौहार्दपूर्ण संबंधों का लाभ मिला। विश्लेषकों का मानना है कि ममता बनर्जी सहित कई विपक्षी नेताओं ने अब रचनात्मक विपक्ष का रास्ता अपनाना शुरू कर दिया है।

sssrknews
Author: sssrknews

इस खबर पर अपनी प्रतिक्रिया जारी करें

Leave a Comment

Share This