किस माला के भजन करने से क्या फल मिलता है एवं जन्मकुण्डली में विवाहित अविवाहित योग कैसे बनता है आओ जानें
सनातन परंपरा में विभिन्न चीजों से 108 मनकों की माला से जप करने या धारण करने से सिद्धि और शुभ फलों की प्राप्ति बताई गई है। अलग-अलग देवी-देवताओं के मंत्र जाप और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए अलग-अलग तरह के मनकों की माला का प्रयोग किया जाता है। इन दिव्य मालाओं को धारण करते समय नियमों को ध्यान में रखने से मनुष्य जीवन की कई तरह की समस्याओं से मुक्ति पा सकता है। ये मालाएं बहुत ही दिव्य और चमत्कारिक मानी जाती है।
मालाएं कई प्रकार की होती है जैसे- रुद्राक्ष माला, स्फटिक माला, तुलसी माला, चंदन माला, कमलगट्टे की माला इत्यादि । हर माला का अपना महत्व होती है। इन सभी मालाओं धारण करने से अलग-अलग फल की प्राप्ति होती है।
माला – संख्या
कई स्पष्टीकरण हैं कि क्यों 108 मनका हैं, जिसमें संख्या 108 मनका कई हिन्दू और बौद्ध परंपराओं में विशेष धार्मिक महत्व रखते है।
27 नक्षत्र × 4 पद (भागों) = 108
12 राशि चक्रघरों × 9 ग्रह = 108
उपनिषद या वेदों के ग्रंथों = 108
इस प्रकार जब हम संख्या 108 पढ़ते या सुनते हैं, तो हम वास्तव में पूरे ब्रह्मांड को याद कर रहे हैं। यह हमें इस तथ्य की याद दिलाता है कि ब्रह्मांड स्वयं सर्वव्यापी हैं, यह स्वयं की सहज प्रकृति है।
रुद्राक्ष माला
रुद्राक्ष की उत्पत्ति भगवान शिव के आंसुओं से मानी गई हैं। रुद्राक्ष की माला धारण करने और इससे जाप करने से भगवान शिव की ही कृपा प्राप्त नहीं बल्कि रुद्राक्ष ग्रह-नक्षत्रों को भी संतुलित करता हैं। स्वास्थ्य की दृष्टि से भी रुद्राक्ष धारण करना काफी लाभदायक हैं। इसके अलावा रुद्राक्ष धारण करने से शनि दोष के बुरे प्रभावों से भी मुक्ति मिलती हैं। रुद्राक्ष की माला आपके जीवन की सभी समस्याओं का समाधान करने में सक्षम हैं।
तुलसी माला
तुलसी की माला बहुत ही शुभ और पवित्र मानी गई हैं। तुलसी की माला धारण करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती हैं। तुलसी की माला में विद्युत शक्ति होती हैं। इस माला को पहनने से यश, कीर्ति और सौभग्य प्राप्त होता हैं। इस माला को धारण करने के बाद अपने आचरण को शुद्ध रखना आवश्यक होता हैं। तुलसी की माला पर कभी भी देवी और शिव जी के मंत्रों का जप नहीं करना चाहिए।
माला – सुमेरु
माला पर 109 वी मनका को सुमेरु, बिंदू, स्तूपा या गुरू मनका कहा जाता है। गिनती हमेशा सुमेरू के बगल में एक मनका के साथ शुरू होनी चाहिए । वैदिक परंपरा में, यदि एक से अधिक दोहराव की माला की जानेवाली हो, तो व्यक्ति इसे पार करने के बजाय सुमेरू तक पहुंचने पर दिशा बदलता है।
जन्मकुण्डली में विवाहित अविवाहित योग
सप्तम भाव का स्वामी शुभ ग्रह हो या अशुभ ग्रह यदि वह अपने भाव सप्तम में हि स्थित हो या किसी अन्य में स्थित होकर अपने भाव को देख रहा हो और सप्तम भाव पर किसी पाप ग्रह का प्रभाव या द्रष्टी नहों तो जातक का विवाह अवश्य होता हैं।
सप्तम भाव में कोई पाप ग्रह स्थित नहीं हो और नाहीं द्रष्टी हो, तो विवाह अवश्य होता हैं।
सप्तम भाव में सम राशि हो या सप्तमेश और शुक्र भी सम राशि में स्थित हों या सप्तमेश बली हो, तो विवाह होता हैं।
सप्तम भाव में कोई ग्रह नहों, न किसी पाप ग्रह की द्रिष्टि हो व सप्तमेश बली होतो विवाह अवश्य होता हैं।
यदि दूसरे, सातवें और बारहवें भाव के स्वामी केन्द्र या त्रिकोण में हों, और गुरु से द्रष्ट हो, तो विवाह अवश्य होता हैं.
कुण्डली में सप्तमेश से दूसरे, सातवें और ग्यारवे भाव में सौम्य ग्रह स्थित हो तो स्त्री सुख अवश्य मिलता हैं।
शुक्र द्विस्वभाव राशि में होने पर विवाह अवश्य होता हैं।
विवाहित बाधा योग-
सप्तम में बुध और शुक्र दोनो हो, तो विवाह के प्रस्ताव आते रहते हैं पर विवाह अधेड उम्र में होता हैं.
शुक्र एवं मंगल दोनो पंचम या नवें भाव में हों, तो विवाह बाधा योग होता हैं.
सप्तम भाव में मंगल हों उस पर शनि कि द्रष्टी हों, तो विवाह बाधा योग होता हैं।
सप्तमेश अशुभ होकर 6,8,12 वे भाव में अस्त या नीच का हो कर स्थित हो, तो विवाह बाधा योग होता हैं।
सप्तम भाव में शनि या गुरु स्थित हो, तो शादी देर से करवाते हैं।
सप्तम भाव पर शनि कि द्रष्टी विवाह में विलंब करवाती हैं।
चन्द्रमा से सप्तम में गुरु स्थित हो, तो शादी देर से करवाता हैं।
कर्क लग्न में सप्तम में गुरु स्थित हो, तो शादी देर से करवाता हैं।
सप्तम में 6,8,12 वे भाव का स्वामी स्थित हों उस पर किसी शुभ ग्रह कि द्रष्टी या युति नहो शादी देर से करवाते हैं।
कन्या की कुन्डली में सप्तमेश के साथ शनि स्थित होने से विवाह अधिक आयु में होता हैं।
सूर्य, मंगल, बुध लगन में स्थित हो और गुरु बारहवें भाव में बैठा हो तो विवाह बडी आयु में होता हैं।
लगन, सप्तम, बारहवें तीनो भाव में पाप ग्रह स्थित हों तथा पंचम भाव में चन्द्रमा कमजोर हो, तो विवाह नही होता यदि होता हैं तो संतान कि संभावना कम होती हैं।
राहु की महादशा या अंतर्दशा में विवाह हो, या राहु सप्तम भाव को दूषित कर रहा हो, तो दिमागी भ्रम के कारण शादी होकर टूट जाती हैं या साथी से अलगाव होता हैं।
अविवाहित योग-
जन्म कुण्डली में सप्तमेश अशुभ स्थान 6,8,12 वे भाव पर स्थित हों और सप्तमेश पर एक से अधिक पाप ग्रहो का प्रभाव हो तो जातक अविवाहित रहता हैं।
लगन या चतुर्थ भाव में मंगल स्थित हो, सप्तम मेंभाव में शनि स्थित हो तो कन्या की रुचि शादी में नही होती हैं।
सप्तमेश छ: आठ या बारहवें स्थान पर अस्त या नीच राशि का होकर बैठा हो, तो जातक अविवाहित रहता हैं।
सप्तमेश बारहवें भाव में हो और लगनेश या राशि कास्वामी सप्तम में बैठा हो, तो जातक अविवाहित रहता हैं।
चन्द्र शुक्र साथ स्थित हों, उस्से सप्तम स्थान पर मंगल और शनि स्थित हो अर्थात चंद्र और शुक्र कि युति से सप्तन भाव में मंगल शनि कि युति हो, तो जातक अविवाहित रहता हैं।
शुक्र और मंगल दोनों सप्तम में हो, तो जातक अविवाहित रहता हैं।
शुक्र किसी पाप ग्रह के साथ पंचम या सप्तम या नवम भाव में युति हो, तो जातक अविवाहित रहता हैं। और यदि हो जाये तो जातक जीवन साथी के वियोग से पीडित रहता हैं।
सप्तम और बारहवे भाव में दो या दो से अधिक पाप ग्रह स्थित हो और पंचम भाव में चंद्र स्थित हो, तो जातक का विवाह नहीं होता।
जन्म कुण्डली में शुक्र, बुध, शनि तीनो ग्रह नीच हों, तो जातक का विवाह नहीं होता।
सूर्य स्पष्ट और सप्तम स्पष्ट बराबर का होने पर भी जातक का विवाह नहीं होता।
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विश्व पर्यावरण दिवस पर शास्त्रों में स्वच्छता के सूत्र
हमारे पूर्वज अत्यंत दूरदर्शी थे। उन्होंने हजारों वर्षों पूर्व वेदों व पुराणों में महामारी की रोकथाम के लिए परिपूर्ण स्वच्छता रखने के लिए स्पष्ट निर्देश दे कर रखें हैं-
1.👉 लवणं व्यञ्जनं चैव घृतं
तैलं तथैव च ।
लेह्यं पेयं च विविधं
हस्तदत्तं न भक्षयेत् ।।
– धर्मसिन्धू ३पू. आह्निक
👉 नमक, घी, तेल, चावल, एवं अन्य खाद्य पदार्थ चम्मच से परोसना चाहिए हाथों से नही।
2.👉 अनातुरः स्वानि खानि न
स्पृशेदनिमित्ततः ।।
– मनुस्मृति ४/१४४
👉 अपने शरीर के अंगों जैसे आँख, नाक, कान आदि को बिना किसी कारण के छूना नही चाहिए।
3.👉 अपमृज्यान्न च स्न्नातो
गात्राण्यम्बरपाणिभिः ।।
– मार्कण्डेय पुराण ३४/५२
👉एक बार पहने हुए वस्त्र धोने के बाद ही पहनना चाहिए। स्नान के बाद अपने शरीर को शीघ्र सुखाना चाहिए।
4.👉 हस्तपादे मुखे चैव पञ्चाद्रे
भोजनं चरेत् ।।
पद्म०सृष्टि.५१/८८
नाप्रक्षालितपाणिपादो
भुञ्जीत ।।
सुश्रुतसंहिता चिकित्सा
२४/९८
👉 अपने हाथ, मुहँ व पैर स्वच्छ करने के बाद ही भोजन करना चाहिए।
5.👉 स्न्नानाचारविहीनस्य सर्वाः
स्युः निष्फलाः क्रियाः ।।
– वाघलस्मृति ६९
👉 बिना स्नान व शुद्धि के यदि कोई कर्म किये जाते है तो वो निष्फल रहते हैं।
6.👉 न धारयेत् परस्यैवं
स्न्नानवस्त्रं कदाचन ।I
– पद्म० सृष्टि.५१/८६
👉स्नान के बाद अपना शरीर पोंछने के लिए किसी अन्य द्वारा उपयोग किया गया वस्त्र (टॉवेल) उपयोग में नही लाना चाहिये।
7.👉 अन्यदेव भवद्वासः
शयनीये नरोत्तम ।
अन्यद् रथ्यासु देवानाम
अर्चायाम् अन्यदेव हि ।।
– महाभारत अनु १०४/८६
👉 पूजन, शयन एवं घर के बाहर जाते समय अलग- अलग वस्त्रों का उपयोग करना चाहिए।
8.👉 तथा न अन्यधृतं (वस्त्रं
धार्यम् ।।
– महाभारत अनु १०४/८६
👉 दूसरे द्वारा पहने गए वस्त्रों को नही पहनना चाहिए।
9.👉 न अप्रक्षालितं पूर्वधृतं
वसनं बिभृयाद् ।।
– विष्णुस्मृति ६४
👉 एक बार पहने हुए वस्त्रों को स्वच्छ करने के बाद ही दूसरी बार पहनना चाहिए।
10👉 न आद्रं परिदधीत ।।
– गोभिसगृह्यसूत्र ३/५/२४
👉 गीले वस्त्र न पहनें।
सनातन धर्म ग्रंथो के माध्यम से ये सभी सावधानियां समस्त भारतवासियों को हजारों वर्षों पूर्व से सिखाई जाती रही है।
इस पद्धति से हमें अपनी व्यतिगत स्वच्छता को बनाये रखने के लिए सावधानियां बरतने के निर्देश तब दिए गए थे जब आज के जमाने के माइक्रोस्कोप नही थे। लेकिन हमारे पूर्वजों ने वैदिक ज्ञान का उपयोग कर धार्मिकता व सदाचरण का अभ्यास दैनिक जीवन में स्थापित किया था।
आज भी ये सावधानियां अत्यन्त प्रासंगिक है। यदि हमें ये उपयोगी लगती हो तो इनका पालन कर सकते हैं।
सनातन संस्कृति



