सोमवती अमावस्या को पितृदोष निवारण के लिए कैसे कराए पितृ शांति पाठ आओ जानें
यदि आपको या आपके घर परिवार में या कुंडली पितृदोष लगा हुआ है या पितृदोष निवारण के लिए उपाय जानने के लिए आप हमें परसनल संदेश लिखकर जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
रामायण के जीवन सूत्र
आज की दुनिया में सब भाग रहे हैं—किसके पीछे?
अधिक पैसे…अधिक सफलता…अधिक पहचान…और इसी दौड़ में हम खो देते हैं वह संपत्ति, जो धन से कभी खरीदी ही नहीं जा सकती।
लेकिन रामायणजी कहती हैं कि “सबसे बड़ी दौलत, भीतर होती है और जिसे पाने के लिए बाहर नहीं, भीतर जाना पड़ता है।”
समस्या है कि आज का इंसान टूट रहा है, थक रहा है और सूख रहा है
आज के समय में हर व्यक्ति तीन चीजों से जूझ रहा है:
1. मन में बेचैनी
Notifications, काम का दबाव, रिश्तों की उम्मीदें—मन शांत ही नहीं होता। रात को सोते वक्त भी दिमाग भाग रहा होता है।
2. दिल में खालीपन
करोड़ों के बीच भी अकेलापन। लोग आसपास होते हैं, पर संबंध नहीं होते। हँसी होती है, पर खुशी नहीं होती।
3. आत्मा में थकान
हम रोज़ “करते रहो-चलते रहो-जीतते रहो” वाले मैराथन में लगे हैं।
पर खुद से पूछा ही नहीं—“मैं अंत में चाहता क्या हूँ?” ये सब उस wealth की कमी है, जो पैसा नहीं खरीद सकता।
रामायणजी हमें 8 ऐसी संपत्तियाँ देती है, जो हमें एक अंदर से समृद्ध, शांत, और संतुलित जीवन देती हैं।
1. शांति (Peace of Mind) – श्रीराम।
राम वनवास में भी शांत रहे, क्योंकि उनकी शांति किसी परिस्थिति पर नहीं, उनके चरित्र पर टिकी थी।
आज हमारी शांति फोन की बैटरी, बैंक बैलेंस या रील्स के likes पर टिकी है। राम कहते हैं—“शांति भीतर की यात्रा है, बाहर की स्थिति नहीं।”
2. स्नेह (Affection) – माँ सीता।
सीता हर परिस्थिति में प्रेम और गरिमा का प्रतीक रहीं—चाहे राजमहल हो या अशोक वाटिका।
आज लोग प्यार conditional देते हैं—काम करो तो अच्छा, हमेशा उपलब्ध रहो तो अच्छा, हमारी बात मानो तो अच्छा।
सीता सिखाती हैं कि “सच्चा स्नेह परिस्थिति नहीं देखता, मन देखता है।”
3. निष्ठा (Loyalty) – लक्ष्मण
लक्ष्मण 14 साल तक सिर्फ एक बात पर टके हुए थे—कर्तव्य।
आज हम commitment से डरते हैं—रिश्तों में भी, काम में भी, खुद से भी। लक्ष्मण सिखाते हैं—“जो निष्ठा सीख लेता है, वह हर जगह चमकता है।”
4. भक्ति (Devotion) – हनुमान जी
हनुमानजी की भक्ति सिर्फ पूजा नहीं थी, वह समर्पण + एकाग्रता + loyalty का मिश्रण था।
आज हम शुरू तो करते हैं, पर भक्ति जैसी consistency नहीं होती।
“भक्ति मतलब: जहाँ हो, वहाँ पूरी तरह होना।”
5. धैर्य (Patience) – भरतजी
भरतजी ने 14 साल तक राज नहीं लिया, क्योंकि उन्हें धन से ज्यादा धर्म प्यारा था।
आज हम Instant चाहते हैं— Instant food, Instant results, Instant success.
भरत कहते हैं—“जो धैर्य सीख गया, वह जीवन में कभी हार नहीं सकता।”
6. क्षमा (Forgiveness) – श्रीराम
राम ने सबको क्षमा किया— रावण को भी। क्योंकि वह जानते थे कि कड़वाहट भीतर ही जला देती है।
आज हम ego में जलते रहते हैं। राम कहते हैं—“क्षमा आत्मा का detox है।”
7. संयम (Self-control) – जनक जी
जनक राजमहल में रहते हुए भी अंदर से भिक्षु जैसे थे।
आज हमारा मन एक क्षण भी शांत नहीं—क्योंकि संयम नहीं।
जनक कहते हैं—“Life becomes easy the day mind becomes trained.”
8. संतोष (Contentment) – शबरी
शबरी के पास कुछ भी नहीं था पर भीतर सब कुछ था।
आज हमारे पास सब कुछ है—पर भीतर खालीपन है।
शबरी सिखाती है—“कृतज्ञता वह धन है जो जीवन को instantly rich बना देती है।”
रामायणजी कहती है कि जिसके भीतर शांति, प्रेम, धैर्य, निष्ठा, भक्ति, क्षमा, संयम और संतोष है, उसके पास दुनिया की सबसे दुर्लभ दौलत है। यह wealth किताबों की तरह है—बाहर से simple,अंदर से life-changing। आज एक पल रुककर खुद से पूछिए—“मेरे भीतर कौन सी wealth की कमी है?”
क्योंकि जो रामायणजी देती हैं ये वो संपत्तियां हैं जो पैसे से नहीं ख़रीदी जा सकती ।
बुरी नजर लगने की मान्यता क्यों
संसार के लगभग सभी देशों में बुरी नजर लगने के प्रभाव को जाना जाता है। जीवित प्राणियों पर ही नहीं वरन् निर्जीव पदार्थ तक बुरी नजर लगने पर विकारग्रस्त हो जाते हैं। सुंदर वस्तुएं खो जाती हैं, नष्ट हो जाती हैं। यहां तक कि सुंदर प्रतिमा बुरी नजर प्रभाव से खंडित होती देखी गई है। बिना किसी पूर्व रोग के एकाएक बच्चा बीमार पड़ जाता है। दुधारू पशु-गाय, भैंस आदि को जब बुरी नजर लग जाती है, तो उसका दूध सूख जाता है।
बुरी नजर लगने का आशय यह है कि जब कोई व्यक्ति अत्यधिक दुर्भावना या आकर्षण से एकाग्र होकर किसी व्यक्ति या वस्तु को देखता है, तो उसकी बेधक दृष्टि उस वस्तु पर दुष्प्रभाव डालती है। भूखे व्यक्ति की कुटृष्टि आपके भोजन को विषैला बना सकती है। अतः भोजन जहां तक हो सके, अजनबियों के बीच न करें।
आमतौर पर बुरी नजर का प्रभाव कोमल चित्त वाले, बच्चों, महिलाओं और पालतू जानवरों पर देखा जाता है। इसके अलावा मकान, उद्योग, व्यापार, वाहन, दुकान आदि पर भी बुरी नजर का असर होता है। बच्चों पर बुरी नजर का प्रभाव शैशवावस्था में अधिक होता है। बुरी नजर के प्रभाव से अच्छा भला बच्चा देखते-देखते ही बीमार पड़ जाता है। वह दूध पीना छोड़कर अधिक रोता है। चिड़चिड़ा हो जाता है, ज्वर आ जाता है। उसकी आंखें चढ़ी हुई-सी रहती हैं। पलकों की बरौनियां खड़ी तथा मुंह से खट्टी गंध आने लगती है। अपच की शिकायत हो जाती है।
महिलाओं पर बुरी नजर का प्रभाव विवाह के समय, गर्भावस्था में बच्चा होने के बाद के समय में अकसर होता है। वयस्क व्यक्ति को जब बुरी नजर लगती है, तो उसे मानसिक तनाव, बेचैनी, अशांति का अनुभव, शरीर की पीड़ा, ज्वर, मंदाग्नि आदि तकलीफें महसूस होती हैं।
बुरी नजर लगने के मूल में वैज्ञानिकों ने मानवीय विद्युत का अहितकर प्रभाव माना है। किसी-किसी व्यक्ति की दूषित दृष्टि इतनी बेधक होती है कि उससे बच्चे की शक्ति खिंचती है और वे उसके झटके को बर्दाश्त न करके बीमार हो जाते हैं। ऐसा देखा गया है कि अजगर अपनी दृष्टि से आकाश से पक्षियों को अपनी ओर खींच लेता है। भेड़िए की दृष्टि से भेड़ और बिल्ली की दृष्टि से कबूतर इतने अशक्त हो जाते हैं कि भाग तक नहीं सकते। इसी को आंखों की आकर्षण शक्ति का सम्मोहन कहते हैं।
नजर से बचाने के लिए काले टीके का या काले धागे के प्रयोग के पीछे मान्यता यह है कि यह विद्युत् का सुचालक होता है। आमतौर पर देखने में आया है कि आकाश की बिजली अकसर काले आदमी, जानवर, सांप या अन्य काली वस्तुओं पर पड़ती है। जाड़े के दिनों में काले कपड़े अधिक गर्मी सोखते हैं। इसीलिए बच्चों को कपाल, हाथ-पैरों में और आंखों में काजल लगाया जाता है। पैर, हाथ, गले, कमर में काला डोरा बांधा जाता है। काली बकरी का दूध पिलाया जाना और काली भस्म चटाना जैसे सभी कार्यों का उद्देश्य नजर के दुष्प्रभाव से बचाने की शक्ति ग्रहण करना है। बुरी नजर से बचने के लिए शेर का नाखून, नीलकंठ का पर, मूंज या तांबे का ताबीज गले में पहना जाता है। दुकानदार नीबू और हरी मिर्चे दुकान में लटका कर रखते हैं। ट्रक मालिक ट्रक के पीछे जूता लटकाते हैं। कारखाने वाले प्रवेश द्वार पर घोड़े की नाल लगाते हैं। मकान पर काली हंडिया टांगी जाती है। यह नजर की एकाग्रता भंग करने की दृष्टि से किया जाता है।



