अनमोल रत्न
अनिल जी अपनी धर्मपत्नी के साथ अपनी रिटायर्ड जिंदगी बहुत हंसी खुशी बीता रहे थे।
उनके तीनो बेटे शहर में अपने अपने परिवारों के साथ थे, लेकिन उन्होनें नियम बना रखा था कि दीपावली हो या कोई अन्य त्यौहार तीनों बेटे सपरिवार उनके पास आएंगे साथ रहेंगे खाएंगे वक्त बिताएंगे पूरे एक सप्ताह तक।
वो एक सप्ताह कैसे मस्ती में बीत जाता था कुछ पता ही नही चलता था। सारा परिवार खुशी से झूम उठता था। अलग अलग भले ही रहते थे मगर उस एक सप्ताह में पूरी कसर साथ रहने की खत्म हो जाती थी। उन सुखद अनुभव और खुशियों के सहारे अनिल जी और पत्नी की जिंदगी सुखद थी।
मगर फिर उनकी खुशियो को जैसे किसी की नज़र ही लग गई। अचानक पत्नी को एक रात दिल का दौरा पड़ा और एक झटके में उनकी सारी खुशियां बिखर गई।
तीनो बेटे दुखद समाचार पाकर दौड़े आए। उनके सब क्रियाकर्म के बाद सब शाम को एकत्रित हो गए तब बड़ी बहू ने बात उठाई बाबूजी अब आप यहां अकेले कैसे रह पाऐंगे, आप भी हमारे साथ चलिये…
नही बहू…. अभी यही रहने दो…यहां अपनापन लगता है… उसकी अनेकों यादें है और फिर बच्चों की गृहस्थी में कहते कहते वो चुप से हो गए। बड़ा पोता कुछ बोलने को हुआ उन्होंने हाथ के इशारे से उसे चुप कर दिया…
“बच्चो, उसकी कुछ चीजें है…. वो तुम लोग आपस में बांट लो मुझसे अब उनकी साज सम्हाल नही हो पाऐगी। यह कहते हुए अलमारी से अनिल जी “चांदी का श्रृंगार दान और “सोने के पट्टे वाली पुरानी रिस्टवाच” लाऐ। सब इतनी खूबसूरत चीजों पर लपक से पड़े….
छोटा बेटा जोश में बोला। अरे ये घड़ी, ये तो अम्मा सरिता को देना चाहती थी, मंझला बोला ये श्रंगार दान मै सहेज कर रख लुंगा।
अनिल जी : इन दो चीजों से उसे बहुत लगाव था बेहद चाव से कभी कभी निकाल कर देखती थी, लेकिन अब कैसे उनकी दो चीजो को तुम तीनों में बांटू समझ नही आ रहा।
उनके मन के भाव शायद बड़ी बहू ने पढ़ लिए.. बाबूजी., आप शायद मेरे विषय में सोच रहे है, आप ये श्रृंगार दान और घड़ी इन दोनो को दे दे।
बाबूजी, आपके पास एक और अनमोल रत्न है और वो अम्माजी मुझे ही देना चाहती थी, बड़ी बहू बोल पड़ीं।
अनिल जी की तरह दोनों बेटे बहु भी हैरानी से बड़ी बहु को देखने लगे कौनसा वो अनमोल रत्न है जो बडी भाभी चांदी के श्रृंगार दान और सोने के पट्टे वाली रिस्टवाच को छोड़ उस अनमोल रत्न को पाना चाहती है जरूर बेहद कीमती या अमूल्य होगा हे भगवान शायद हमने जल्दबाजी कर दी।
सबकी हैरानी और परेशानी को भांप कर बड़ी बहू नंदिनी मुस्कुरा कर बोली, वो सबसे अनमोल रत्न तो आप स्वयं हैं बाबूजी, पिछली बार अम्माजी ने मुझसे कह दिया था कि मेरे बाद बाबूजी की देखरेख तेरे जिम्मे है बहु। बस अब आप उनकी इच्छा का पालन करे और हमारे साथ चलें।
अनिल जी की आँखें खुशी से और कृतज्ञता से भीग गई
बन्धुओ जीवन मे सबसे अनमोल हमारे माता पिता हमारे बुजुर्ग है इनका आर्शीवाद इनके अनुभव इनकी सलाह इनकी छत्रछाया किसी अनमोल रत्न अनमोल धरोहर से कम नही है!
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