गाजियाबाद मानवीय संवेदनाओं, त्याग और अटूट पारिवारिक प्रेम की एक बेमिसाल मिसाल है। फादर्स डे के ठीक पहले सामने आई यह कहानी दिल को छू लेने के साथ-साथ समाज को एक बहुत बड़ा और गहरा संदेश देती है।
इस कहानी के कई ऐसे पहलू हैं जो इसे बेहद खास और प्रेरणादायक बनाते हैं:
#बेटियां बोझ नहीं, सहारा हैं’ का जीवंत उदाहरण
अक्सर समाज में बेटों को वंश आगे बढ़ाने वाला या बुढ़ापे की लाठी माना जाता है, लेकिन इन दो बेटियों ने इस रूढ़िवादी सोच को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया। जब पिता की जिंदगी पर संकट आया, तो वे सिर्फ मूकदर्शक या कमजोर नहीं बनीं, बल्कि अपने पिता के लिए ढाल बनकर खड़ी हो गईं
#जीवनदान देने का सबसे बड़ा त्याग
लिवर और किडनी ट्रांसप्लांट जैसी गंभीर और जटिल सर्जरी के लिए अपने अंगों को दान करना कोई छोटा फैसला नहीं है। इसके लिए अत्यधिक मानसिक साहस और शारीरिक त्याग की आवश्यकता होती है। दोनों बेटियों ने बिना एक पल गंवाए यह साबित कर दिया कि पिता की जान से बढ़कर उनके लिए कुछ भी नहीं है।
#फादर्स डे का सबसे अनमोल तोहफा
बाजार में मिलने वाले महंगे से महंगे उपहार भी उस ‘जीवनदान’ के सामने फीके हैं जो इन बेटियों ने अपने पिता को दिया है। एक पिता के लिए इससे गौरवमयी क्षण और क्या हो सकता है कि जिन बच्चों की उन्होंने उंगली पकड़कर चलना सिखाया, आज वही बच्चे उनके अस्तित्व की रक्षा कर रहे हैं।
बेटियों ने ऐसा कर दिखाया है जिससे हर किसी को भावुक कर दिया है। अक्सर कहा जाता है कि बेटियां परिवार की शान, सम्मान और सबसे मजबूत सहारा होती हैं, लेकिन मोरटा की दो बेटियों ने इसे अपने त्याग और समर्पण से सच साबित कर दिखाया। जब उनके पिता की जिंदगी पर संकट मंडराने लगा और डॉक्टरों ने लीवर तथा किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत बताई, तब दोनों बेटियां बिना एक पल गंवाए उनके जीवन की सबसे बड़ी उम्मीद बनकर सामने आईं।
#कहते हैं बेटियां भाग्य से होती हैं, पर ऐसी बेटियां जो पिता के प्राणों की रक्षा के लिए खुद को समर्पित कर दें, वे साक्षात ईश्वर का वरदान होती हैं।
यह कहानी हर उस व्यक्ति को झकझोरती है जो बेटियों को कमतर आंकता है। मोरटा गांव की इन बहादुर बेटियों को सलाम, जिन्होंने रिश्तों की परिभाषा को एक नया और बेहद खूबसूरत आयाम दिया है।






