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जिस माँ को बेटों ने अनपढ़ समझा, वही बनी परिवार की सबसे बड़ी ताकत

अगले दो दिन घर में मातम जैसा सन्नाटा रहा। घर बेचने की बात पक्की हो गई थी। ब्रोकर आने वाले थे। रोहित और मोहित कागजी कार्रवाई में उलझे थे। सुमित्रा देवी ने देखा कि उनके पति रातों को सो नहीं पा रहे हैं। वह जानती थीं कि यह घर उनकी आत्मा है।

शाम की चाय का वक्त था। ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठे मिस्टर खन्ना और उनके दोनों बेटे—रोहित और मोहित—गहरी चिंता में डूबे थे। घर का माहौल तनावपूर्ण था। खन्ना टेक्सटाइल्स, जो कभी शहर की शान हुआ करती थी, अब दिवालिया होने के कगार पर थी। पिछले छह महीनों से मार्केट में मंदी और एक बड़े ऑर्डर के कैंसिल होने से हालात बदतर हो गए थे। बैंक का नोटिस आ चुका था—अगर अगले पंद्रह दिनों में पचास लाख रुपये जमा नहीं हुए, तो उनका पुश्तैनी घर और फैक्ट्री दोनों नीलाम हो जाएंगे।

रसोई से बर्तनों की खनखनाहट आ रही थी। 55 वर्षीय सुमित्रा देवी, मिस्टर खन्ना की पत्नी, हमेशा की तरह रात के खाने की तैयारी में जुटी थीं। वह बीच-बीच में ड्राइंग रूम की तरफ देख लेतीं, लेकिन वहां चल रही गंभीर बातों में दखल देने की उनकी हिम्मत नहीं होती थी।

“पापा, अब और कोई रास्ता नहीं है। हमें यह घर बेचना ही पड़ेगा,” रोहित ने सिर पकड़ते हुए कहा। वह एमबीए करके बिजनेस संभाल रहा था, लेकिन आज उसकी सारी डिग्रियां उसे बेबस लग रही थीं।

मोहित, जो अभी कॉलेज में ही था लेकिन बिजनेस में हाथ बंटाता था, ने भी हां में हां मिलाई। “भैया सही कह रहे हैं। फैक्ट्री बचाने के लिए घर तो जाएगा ही। और वैसे भी, अब इतनी बड़ी कोठी का हम करेंगे भी क्या? किराए के फ्लैट में शिफ्ट हो जाएंगे।”

मिस्टर खन्ना की आंखों में आंसू थे। यह घर उनके पिता की निशानी थी। “रोहित, क्या मार्केट से कुछ उधारी नहीं मिल सकती? या कोई इन्वेस्टर?”

“पापा, मार्केट में खबर फैल चुकी है कि हम डूब रहे हैं। कोई पैसा नहीं लगाना चाहता। और रिश्तेदार? वो तो फोन उठाना भी बंद कर चुके हैं,” रोहित ने झुंझलाते हुए कहा।

तभी सुमित्रा देवी ट्रे में चाय और नाश्ता लेकर वहां आईं। उन्होंने मेज पर कप रखते हुए धीमे स्वर में पूछा, “क्या हुआ जी? आप लोग इतने परेशान क्यों लग रहे हैं? बैंक वाले फिर आए थे क्या?”

रोहित ने चिढ़कर अपनी माँ की तरफ देखा। “माँ, प्लीज! आप चाय रखिये और किचन में जाइये। यह बिजनेस की बातें हैं, आपके समझ में नहीं आएंगी। आपको बस घर का राशन और सब्जी-भाजी का हिसाब आता है, यह करोड़ों का मामला है।”

सुमित्रा देवी का हाथ एक पल के लिए कांपा, लेकिन उन्होंने खुद को संभाला। यह पहली बार नहीं था जब उन्हें ‘घरेलू’ होने का अहसास दिलाया गया हो। “बेटा, मैं बस पूछ रही थी। शायद कोई मदद…”

“मदद?” मोहित ने व्यंग्य से हंसते हुए कहा। “माँ, आप क्या मदद करेंगी? अपनी किटी पार्टी की सहेलियों से पैसा मांगेंगी? या पापा के पुराने स्वेटर उधेड़कर बेचेंगी? देखिए, हमें बहुत टेंशन है। आप बस खाना बनाइये, वही आता है आपको।”

मिस्टर खन्ना ने भी बेटों को नहीं टोका। शायद उन्हें भी यही लगता था कि सुमित्रा, जो दसवीं पास थी और जिसने पूरी जिंदगी सिर्फ रसोई और बच्चे संभाले, वह इस आर्थिक संकट में क्या ही कर पाएगी। सुमित्रा देवी चुपचाप वहां से चली गईं। उनकी आंखों में आंसू नहीं थे, लेकिन दिल में एक अजीब सी टीस थी। उन्हें दुख इस बात का नहीं था कि बेटे बदतमीजी कर रहे थे, बल्कि इस बात का था कि वे अपनी माँ को इतना कमतर आंकते थे।

अगले दो दिन घर में मातम जैसा सन्नाटा रहा। घर बेचने की बात पक्की हो गई थी। ब्रोकर आने वाले थे। रोहित और मोहित कागजी कार्रवाई में उलझे थे। सुमित्रा देवी ने देखा कि उनके पति रातों को सो नहीं पा रहे हैं। वह जानती थीं कि यह घर उनकी आत्मा है।

तीसरे दिन सुबह, जब रोहित ब्रोकर को फोन करने जा रहा था, सुमित्रा देवी ने उसे रोका। “रोहित, एक मिनट रुकना। मुझे तुम सब से कुछ बात करनी है।”

रोहित ने घड़ी देखी। “माँ, अभी नहीं। ब्रोकर आने वाला है। घर का सौदा करना है।”

“घर नहीं बिकेगा,” सुमित्रा देवी की आवाज में एक ऐसी दृढ़ता थी जो पहले कभी किसी ने नहीं सुनी थी।

मिस्टर खन्ना, रोहित और मोहित—तीनों चौंककर उनकी तरफ देखने लगे।

“क्या मतलब घर नहीं बिकेगा? माँ, आप इमोशनल हो रही हैं। प्रैक्टिकल बनिए। पचास लाख रुपये आसमान से नहीं टपकेंगे,” रोहित ने ऊँची आवाज में कहा।

सुमित्रा देवी ने कुछ नहीं कहा। वह अपने कमरे में गईं और वहां से एक पुराना, लोहे का जंग लगा हुआ संदूक घसीटते हुए बाहर लाईं। यह वही संदूक था जिसे मोहित अक्सर कबाड़ में फेंकने की बात करता था।

उन्होंने अपनी साड़ी के पल्लू में बंधी चाबी से उस संदूक का ताला खोला। अंदर पुराने कपड़ों की तह लगी थी। सुमित्रा देवी ने कपड़े हटाए और नीचे से एक मखमली पोटली और कुछ पुरानी डायरियां निकालीं।

उन्होंने वह पोटली सोफे पर पलट दी।

छन-छन की आवाज के साथ सोने की गिन्नियां, पुराने जमाने के भारी कंगन, और कुछ बेशकीमती रत्न बिखर गए। और साथ ही, उन्होंने एक डायरी खोली जिसमें कुछ बैंक के फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) के बांड्स और पोस्ट ऑफिस की सेविंग्स के सर्टिफिकेट्स रखे थे।

कमरे में सन्नाटा छा गया। रोहित और मोहित की आंखें फटी की फटी रह गईं।

“ये… ये सब क्या है, सुमित्रा?” मिस्टर खन्ना हकलाते हुए बोले।

सुमित्रा देवी ने सोफे पर बैठते हुए कहा, “ये वो ‘खाना बनाना’ है जो मुझे आता है। ये वो ‘किटी पार्टी’ की बचत है जिसका तुम लोग मजाक उड़ाते थे। ये वो सब्जी-भाजी का हिसाब है जिसे तुम लोग मामूली समझते थे।”

उन्होंने एक-एक करके चीजें गिनवानी शुरू कीं।

“रोहित, याद है जब दस साल पहले तुम्हारी फैक्ट्री में आग लगी थी और पापा को पैसों की जरूरत थी, लेकिन उन्होंने मुझे बताया नहीं था? तब मैंने अपने मायके से मिले पुश्तैनी हार को बेचकर पैसों का इंतजाम किया था, और पापा को लगा था कि इंश्योरेंस का पैसा आया है। मैंने वो पैसा कभी अपने ऊपर खर्च नहीं किया। उसे मैंने पोस्ट ऑफिस की स्कीम में डाल दिया था। आज वो रकम पंद्रह लाख हो चुकी है।”

उन्होंने सोने की गिन्नियां उठाईं।

“मोहित, जब तुम छोटे थे और बीमार पड़े थे, डॉक्टर ने ऑपरेशन के लिए पैसे मांगे थे। तुम्हारे पापा के पास कैश नहीं था। मैंने घर का पुराना तांबा और पीतल बेचकर, और अपनी साड़ियों में से पैसे बचाकर ये छोटी-छोटी गिन्नियां खरीदी थीं। हर साल दिवाली पर जब तुम लोग पटाखे जलाते थे, मैं एक गिन्नी खरीदकर इस संदूक में डाल देती थी। आज सोने का भाव आसमान छू रहा है। ये गिन्नियां कम से कम बीस लाख की हैं।”

फिर उन्होंने वो भारी कंगन दिखाए।

“और ये कंगन… ये मेरी सास, तुम्हारी दादी ने मुझे दिए थे। उन्होंने कहा था, ‘सुमित्रा, औरत घर की नींव होती है। जब दीवारें हिलने लगें, तो नींव ही घर को बचाती है।’ मैंने आज तक इन्हें नहीं पहना, ताकि आज के दिन ये काम आ सकें। इनका वजन पंद्रह तोले है। आज के हिसाब से इसकी कीमत भी अच्छी खासी होगी।”

सुमित्रा देवी ने एक डायरी आगे बढ़ाई।

“और ये देखो। पिछले तीस सालों से, तुम्हारे पापा मुझे घर खर्च के लिए जो पैसे देते थे, उसमें से मैंने हर महीने थोड़ा-थोड़ा बचाया। कभी सब्जी वाले से मोलभाव करके, कभी अपनी दवाइयां न लेकर, कभी नई साड़ी न खरीदकर। मैंने उन पैसों को ‘महिला बचत समूह’ में डाला था। वहां से मुझे ब्याज समेत करीब दस लाख रुपये मिलेंगे।”

कमरे में सुई गिरने जैसी शांति थी। रोहित का सिर शर्म से झुक गया था। मोहित अपनी माँ की तरफ देख नहीं पा रहा था। मिस्टर खन्ना की आंखों से आंसू बह रहे थे।

“कुल मिलाकर…” सुमित्रा देवी ने हिसाब लगाते हुए कहा, “ये करीब साठ लाख रुपये का इंतजाम है। पचास लाख बैंक को दे दो, और बाकी के दस लाख से फैक्ट्री में कच्चा माल मंगवा लो। घर बेचने की जरूरत नहीं है।”

रोहित ने कांपते हाथों से वो डायरी उठाई। उसमें एक-एक पाई का हिसाब लिखा था—’दूध के पैसे बचाए’, ‘पुरानी रद्दी बेची’, ‘अचार बनाकर बेचा’।

उसे याद आया कि कैसे वह अक्सर माँ को ‘कंजूस’ कहता था। उसे याद आया कि कैसे वह माँ के पुराने कपड़ों का मजाक उड़ाता था। आज उसी ‘कंजूसी’ ने उनकी इज्जत, उनका घर और उनका भविष्य बचा लिया था।

रोहित दौड़कर सुमित्रा देवी के पैरों में गिर पड़ा और फूट-फूट कर रोने लगा। “माँ… मुझे माफ कर दो। मैं अंधा हो गया था। मैं आपको अनपढ़ समझता रहा, लेकिन आपने तो वो अर्थशास्त्र (Economics) पढ़ा है जो दुनिया की किसी यूनिवर्सिटी में नहीं पढ़ाया जाता। मैं आपका गुनहगार हूँ माँ।”

सुमित्रा देवी ने रोहित को उठाया और गले लगा लिया। “पगले, माँ से माफी नहीं मांगते। और बेटा, औरत कभी खाली नहीं बैठती। जब वो रसोई में रोटियां बेलती है, तो साथ में अपने परिवार का भविष्य भी बेलती है। जब वो दाल में तड़का लगाती है, तो उसमें सुरक्षा और बचत का तड़का भी लगाती है। हमें बस क्रेडिट (श्रेय) लेना नहीं आता, इसका मतलब ये नहीं कि हमें कुछ आता नहीं।”

मिस्टर खन्ना ने आगे बढ़कर सुमित्रा के हाथ थाम लिए। “सुमित्रा, आज तुमने साबित कर दिया कि इस घर का असली ‘बॉस’ मैं नहीं, तुम हो। मैं तो बस पैसा कमाना जानता था, उसे सहेजना और बढ़ाना तो तुमने सिखाया। आज अगर ये छत हमारे सिर पर है, तो सिर्फ तुम्हारी वजह से।”

मोहित ने भी माँ के गले लगते हुए कहा, “माँ, आप तो घर की वित्त मंत्री (Finance Minister) निकलीं। हम बेकार में एमबीए की डिग्री लेकर घूम रहे हैं।”

उस दिन घर नहीं बिका। बैंक का कर्जा चुका दिया गया। फैक्ट्री में दोबारा काम शुरू हुआ। लेकिन उस दिन सबसे बड़ा बदलाव जो हुआ, वो यह था कि अब सुमित्रा देवी सिर्फ ‘रसोई’ तक सीमित नहीं थीं। अब बिजनेस की हर मीटिंग में, हर बड़े फैसले में उनकी राय ली जाती थी।

रोहित ने अपनी फैक्ट्री के नए प्रोडक्ट का नाम ‘सुमित्रा’ रखा।

शाम को जब वे सब चाय पी रहे थे, रोहित ने हंसते हुए कहा, “माँ, अब तो मान जाओ, आपको खाना बनाने के अलावा भी बहुत कुछ आता है।”

सुमित्रा देवी मुस्कुराईं, “हाँ, मुझे डूबते हुए जहाज को किनारे लगाना भी आता है।”

यह कहानी उन सभी माताओं और गृहणियों को समर्पित है जिन्हें समाज अक्सर ‘सिर्फ हाउसवाइफ’ कहकर कमतर आंकता है। वे घर की चारदीवारी में रहकर भी वो कर जाती हैं जो बड़े-बड़े धुरंधर नहीं कर पाते। उनकी खामोश बचत और त्याग ही परिवार की असली पूंजी है।

साभार : पूजा मिश्रा जी की कलम से ❤️

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Author: sssrknews

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