आईआईटी गुवाहाटी का छात्र। ‘फूड डिलीवरी बॉय’- गांववालों ने यही नाम दे दिया। अजीब बात यह है कि ताने में दिए नाम को उसने अपना अलंकार माना था। बिहार के वैशाली जिले के बिहटा गांव। उस गांव में, जहां से अक्सर आईएएस और आईपीएस निकलते हैं
जहां सरकारी नौकरी ही ‘सबसे सुरक्षित सपना’ मानी जाती है
वहां 17 साल का ऋषु राज ने एक अलग रास्ता चुना।
पिता चाहते थे, बेटा पढ़ाई करे, यूपीएससी की तैयारी करे।
गांव वाले हंसते, ‘ये तो खाना पहुंचाने वाला बन गया।’
लेकिन ऋषु ने एक चीज देखी, जो किसी और ने नहीं देखी थी।
स्विगी, जोमैटो जैसी बड़ी कंपनियां, उसके इलाके तक कभी नहीं पहुंचीं।
सड़कें कमजोर थीं, मुनाफा कम था
इसलिए कोई आया ही नहीं।
पटना में जेईई की तैयारी के दौरान
हॉस्टल के घटिया खाने ने उसके मन में एक सवाल बो दिया
अगर शहरों में खाना घर बैठे आ सकता है, तो गांवों में क्यों नहीं?
2025 में, बिना किसी निवेश के, अपने ही मोबाइल और लैपटॉप से, उसने बनाया- Zrestro.
कोई फंडिंग नहीं थी। कोडिंग खुद की जानता था, तो पूरा प्लेटफॉर्म खुद बनाया
फ्रंट-एंड भी, बैक-एंड भी। पहला ऑर्डर पाने के लिए
हर डिलीवरी पर मुफ्त डिलीवरी और दस रुपए की कैम्पा कोला की बोतल दी।
दोस्तों से कहा, ऐप डाउनलोड करो, ऑर्डर करो,
स्क्रीनशॉट व्हाट्सऐप स्टेटस पर लगाओ।
एक लोकल इन्फ्लुएंसर को दो सौ रुपए की पिज्जा देकर प्रमोशन करवाया।
पहले दिन, सिर्फ दस-बीस ऑर्डर।
दस महीने बाद, पच्चीस हज़ार डाउनलोड, चौदह-पंद्रह हजार सक्रिय उपयोगकर्ता
रोजाना सौ से दो सौ ऑर्डर, साठ प्रतिशत से ज्यादा ग्राहक बार-बार लौटकर आते हैं।
कुल राजस्व, तीस लाख रुपए।
कई लोकल रेस्टोरेंट, जो पहले हफ्ते भर में मुश्किल से कमाते थे
अब बीस से तीस हज़ार रुपए हफ्ते भर में कमा रहे हैं।
गांववाले उसे ‘फूड डिलीवरी बॉय’ कहकर चिढ़ाने लगे थे
उसी ने धीरे धीरे सैकड़ों परिवारों के लिए नई आमदनी का रास्ता खोल दिया।
यह सिर्फ एक ऐप की कहानी नहीं है।
यह सवाल है, कामयाबी की असली जड़ कहां होती है?
मनोवैज्ञानिक एंजेला डकवर्थ ने इसे ‘ग्रिट’ कहा है
सिर्फ टैलेंट नहीं, बल्कि एक लंबे लक्ष्य के लिए लगातार जुनून और धैर्य।
डकवर्थ का शोध बताता है कि सफलता अक्सर सबसे होशियार इंसान को नहीं,
बल्कि उस इंसान को मिलती है जो असफलता और मजाक के बावजूद डटा रहे।
ऋषु के पास न पैसा था, न समर्थन
पर उसके पास वो जिद थी, जिसे डकवर्थ ‘पैशन’ और ‘पर्सीविअरन्स’ कहती हैं। यानी ‘लगन’ और ‘दृढ़ता’।
और एक और सिद्धांत याद आता है कैरल ड्वेक का ‘ग्रोथ माइंडसेट’।
ड्वेक कहती हैं,
‘जो लोग मानते हैं कि क्षमताएं मेहनत से बढ़ती हैं, न कि जन्म से तय होती हैं
वही असफलता को रुकावट नहीं, सीढ़ी मानते हैं।’
ऋषु के लिए ‘फूड डिलीवरी बॉय’ का ताना कोई हार नहीं था, एक चुनौती थी।
मुझे यह कहानी पढ़कर अपने उन दिनों की याद आई,
जब मैंने पहली बार पत्रकारिता में कदम रखा था।
तब मुझे एक रिश्तेदार ने बहुत शर्मिंदगी महसूस करवाई थी
उन्होंने इंजीनियरिंग कर रहे अपने भांजे से मेरी तुलना करते हुए
कहा था ‘न्यूजपेपर का रिपोर्टर बनना को कोई करियर है?’
टीवी पर एक एंकर को दिखा कर कहा- कम से कम उसकी तरह टीवी पर दिखते तो मानते।
कई रिश्तेदार सार्वजनिक तौर पर सैलरी पूछ कर नीचा दिखा देते थे।
ऋषु ने ऐसे रिश्तेदार झेले। आपने भी झेले होंगे।
हर पीढ़ी में, कुछ लोग ऐसे होते हैं जो पुराने रास्ते से हटकर चलते हैं, और शुरुआत में सिर्फ मजाक ही मिलता है।
हम सबकी जिंदगी में कोई न कोई ऐसा पल आता है
जब कोई हमारा सपना देखकर हंसता है।
लेकिन सवाल यह है, हम उस हंसी के बाद रुके, या आगे बढ़े।
कभी-कभी सबसे बड़ी क्रांति, किसी छोटे से गांव की गली से शुरू होती है
एक मोबाइल फोन, एक जिद, और एक सवाल के साथ
‘अगर शहर में हो सकता है, तो यहां क्यों नहीं?’
आपकी जिंदगी में भी कभी किसी ने आपके सपने पर हंसी उड़ाई होगी
फिर आपने क्या किया?
मैं चाहता हूं कि आपके किस्से से भी बाकियों को उड़ने का हौसला मिले।
स्रोत : स्टार्टअपपीडिया






