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मुज़फ्फरनगर की बारिश और विकास का कैंसर: हर बरसात में डूबती शहर की सच्चाई

मुज़फ्फरनगर की बारिश और विकास का कैंसर

मुज़फ्फरनगर में बारिश अब मौसम नहीं, सरकारी प्रेस नोट है। बादल गरजते कम हैं, नगर की योजनाओं पर हँसते ज़्यादा हैं। पहली अच्छी बारिश होते ही शहर यह घोषणा कर देता है कि उसका मास्टर प्लान अब पानी में बह चुका है।

कहते हैं, पानी हमेशा अपना रास्ता खोज लेता है। हमारे शहर में बेचारा पानी भी असमंजस में पड़ जाता है। जिस नाले से उसे गुजरना था, वहाँ अब कॉम्प्लेक्स है। जहाँ पोखर था, वहाँ कॉलोनी है। जहाँ बरसाती पानी रुकना था, वहाँ प्लॉट काट दिए गए। पानी सोचता होगा—”जब इंसानों ने मेरा पता बदल दिया, तो अब मैं भी इनके ड्रॉइंग रूम का पता पूछ लेता हूँ।”

नगर नियोजन का हाल ऐसा है कि नक्शा देखकर लगता है शहर इंजीनियर ने बनाया है, और ज़मीन देखकर लगता है इंजीनियर छुट्टी पर था।

बारिश की पहली फुहार के साथ प्रशासन सक्रिय हो जाता है। अधिकारी बूट पहनकर जलभराव का निरीक्षण करते हैं। कैमरे तस्वीरें लेते हैं। अगले दिन अख़बार में छपता है—”स्थिति नियंत्रण में है।” सचमुच नियंत्रण में होती है—बस पानी ही सड़क पर नियंत्रित होकर खड़ा रहता है।

हर साल करोड़ों रुपये नालों की सफाई पर खर्च होते हैं। जनता हर साल यही खोजती रह जाती है कि नाले गए कहाँ? लगता है सफाई इतनी गहरी हुई कि नाले भी सफाई के साथ ही विदा हो गए।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि शहर में जलभराव किसी एक वार्ड की समस्या नहीं, लोकतंत्र की तरह सबको समान अवसर देता है। अमीर की एसयूवी भी उसी पानी में बंद होती है, जिसमें गरीब की साइकिल डूबती है। पानी कम-से-कम भेदभाव नहीं करता।

हम विकास पर बहुत गर्व करते हैं। सड़क ऊँची कर दी जाती है, मगर नाले नहीं। नतीजा यह कि सड़कें ऊँची होती जाती हैं और घर नीचे। फिर लोग अपने ही घर में प्रवेश करने के लिए सीढ़ियाँ नहीं, नाव तलाशने लगते हैं।

किसी ने ठीक ही कहा है कि अनियोजित विकास शहर का कैंसर है। फर्क सिर्फ इतना है कि कैंसर धीरे-धीरे मारता है, जबकि अनियोजित विकास हर बरसात में याद दिला देता है कि बीमारी अंतिम अवस्था में पहुँच चुकी है।

अब आवश्यकता स्मार्ट सिटी के नए बोर्ड लगाने की नहीं, बल्कि पुराने नालों का रास्ता वापस देने की है। वरना वह दिन दूर नहीं जब नगर निगम को सड़क निर्माण विभाग से अधिक नाव खरीद विभाग की आवश्यकता पड़ेगी।

और तब शायद शहर का नया परिचय यही होगा—

“मुज़फ्फरनगर—जहाँ बरसात के मौसम में सड़क और नदी के बीच का अंतर केवल सरकारी फाइलों में दिखाई देता है।”

सभार भाई अरुण खंडेलवाल जी की वाल से

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Author: sssrknews

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