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ISRO की नौकरी छोड़ी, 8 साल में रच दिया इतिहास! दो दोस्तों ने भारत को अमेरिका-चीन की बराबरी पर पहुंचाया

दो दोस्त। दोनों इसरो के वैज्ञानिक।
दोनों ने एक दिन सरकारी नौकरी छोड़ दी।
आज उन्हीं दो दोस्तों ने भारत को अमेरिका और चीन के बराबर खड़ा कर दिया।

आज, 18 जुलाई 2026 की सुबह, श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर पर उलटी गिनती चल रही थी।
टी-माइनस 5 मिनट पर, एक तकनीकी खराबी मिली। पूरा लॉन्च रोक दिया गया।
35 मिनट का इंतजार शायद उस कमरे में मौजूद हर इंजीनियर के लिए सबसे लंबे 35 मिनट।
फिर उलटी गिनती दोबारा शुरू हुई। दोपहर 12:05 बजे, एक रॉकेट ने उड़ान भरी नाम विक्रम-1, मिशन का नाम ‘आगमन’।
महज 15 मिनट में, यह रॉकेट पृथ्वी की निचली कक्षा 450 किलोमीटर ऊपर में सफलतापूर्वक स्थापित हो गया।

इस एक उड़ान के साथ, भारत अमेरिका और चीन के बाद, दुनिया का तीसरा देश बन गया
जिसके पास किसी प्राइवेट कंपनी की बनाई ऑर्बिटल-क्लास रॉकेट, अंतरिक्ष तक पहुंचाने की क्षमता है।
यह रॉकेट किसी सरकारी एजेंसी ने नहीं बनाया। इसे बनाया उन्हीं दो दोस्तों ने,
जिनका जिक्र ऊपर हुआ पवन कुमार चंदना और नागा भरत डाका।
और यह कहानी शुरू होती है, आठ साल पहले, एक साधारण से फैसले से

पवन कुमार चंदना ने IIT खड़गपुर से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की।
2012 में कैंपस प्लेसमेंट के जरिए ISRO में वैज्ञानिक की नौकरी शुरू की विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर में,
देश के सबसे प्रतिष्ठित वैज्ञानिक संस्थानों में से एक में।
छह साल तक वे वहां अहम परियोजनाओं पर काम करते रहे।

नागा भरत डाका, IIT बॉम्बे से पढ़े, वे भी वर्षों तक ISRO में वैज्ञानिक रहे।
ISRO की नौकरी सुरक्षित, सम्मानित, देश-सेवा से जुड़ी।
ज्यादातर लोगों के लिए यह सपनों की मंजिल होती।

2018 में, पवन ने वह सुरक्षित नौकरी छोड़ दी।
मन में एक सवाल कुलबुला रहा था क्या भारत में कोई प्राइवेट कंपनी भी रॉकेट बना सकती है?
उन्होंने नागा भरत से संपर्क किया। दोनों ने मिलकर एक फैसला लिया एक बिल्कुल नई, अनिश्चित राह पर निकलने का।

पैसे की सबसे बड़ी दिक्कत थी।
दोनों ने मुकेश बंसल Myntra के संस्थापक, खुद IIT खड़गपुर के पूर्व छात्र को सीधे संदेश भेजा।
पवन के विजन पर भरोसा जताते हुए, मुकेश ने शुरुआती 15 लाख डॉलर का निवेश किया।

हैदराबाद में शुरू हुई स्काईरूट एयरोस्पेस।
18 नवंबर 2022 पहली बड़ी कामयाबी।
स्काईरूट ने भारत का पहला प्राइवेट रॉकेट, विक्रम-एस, सफलतापूर्वक लॉन्च किया मिशन ‘प्रारंभ’ के तहत, 89.5 किलोमीटर ऊंचाई तक।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद इसे ‘ऐतिहासिक क्षण’ कहा।

पर यह सिर्फ शुरुआत थी। असली चुनौती ऑर्बिट तक पहुंचना अभी बाकी थी।
अगले चार साल, टीम ने कड़ी मेहनत की।
नवंबर 2021 में देश का पहला प्राइवेट क्रायोजेनिक इंजन ‘धवन-1’ टेस्ट हुआ।
मार्च 2024 में रॉकेट के दूसरे स्टेज ‘कलाम-250’ का टेस्ट।
अप्रैल 2025 में ‘कलाम-100’ और ‘कलाम-1200’ कंपनी का अब तक का सबसे ताकतवर स्टेज।

नवंबर 2025 में, खुद प्रधानमंत्री मोदी ने हैदराबाद में स्काईरूट के नए ‘इन्फिनिटी कैंपस’ का उद्घाटन किया
करीब 2 लाख वर्गफ़ुट का यह परिसर, हर महीने एक ऑर्बिटल रॉकेट बनाने की क्षमता रखता है।
कुल मिलाकर, स्काईरूट ने अब तक ₹800 करोड़ (करीब 95.5 मिलियन डॉलर) से भी ज्यादा जुटाए हैं GIC, टेमासेक, ब्लैकरॉक जैसे बड़े वैश्विक निवेशकों से।
कंपनी भारत की पहली स्पेस-टेक यूनिकॉर्न बन चुकी है। टीम में आज 350 से ज्यादा वैज्ञानिक-इंजीनियर हैं औसत उम्र सिर्फ़ 28 साल।
विक्रम-1 की तकनीकी बनावट भी उतनी ही दिलचस्प है:
23 मीटर ऊंचा (करीब सात मंजिला इमारत जितना),
1.7 मीटर व्यास, पूरी तरह कार्बन-कंपोजिट ढांचे से बना स्टील से पांच गुना हल्का पर उतना ही मजबूत।
350 किलोग्राम तक पेलोड ले जाने की क्षमता।

आज इस उड़ान में रॉकेट अपने साथ ले गया स्काईरूट का अपना SCOPE सैटेलाइट, ग्रह स्पेस, कॉस्मोसर्व और डीक्यूब्ड की टेक्नोलॉजी पेलोड्स
जिनमें अंतरिक्ष-मलबा हटाने वाली रोबोटिक-आर्म तकनीक का परीक्षण भी शामिल था।
साथ ही दो बेहद प्रतीकात्मक चीजें भी कलाकार अजय कुमार मट्टेवाड़ा की बनाई 18-कैरेट सोने की एक सूक्ष्म कलाकृति,
जिस पर विक्रम साराभाई, डॉ. कलाम और सीवी रमन की छोटी मूर्तियां उकेरी गई थीं,
और प्रधानमंत्री मोदी का खुद के हाथ से लिखा एक पोस्टकार्ड ‘वंदे मातरम्।’

जब रॉकेट ने कक्षा हासिल कर ली, पवन और नागा भरत को खुद प्रधानमंत्री मोदी का फोन आया, बधाई देने के लिए।
चंदना ने कहा ‘मेरे पास शब्द नहीं हैं। यह सिर्फ़ स्काईरूट के लिए नहीं,
पूरे भारत और वैश्विक स्पेस सेक्टर के लिए एक ऐतिहासिक पल है।
पहले ही प्रयास में कक्षा हासिल कर लेंगे,
यह मैंने सोचा भी नहीं था पर हमारी टीम ने इसे मुमकिन कर दिखाया।’

प्रधानमंत्री मोदी ने 2030 तक भारत से सालाना 50 रॉकेट लॉन्च का लक्ष्य रखा है आज की यह कामयाबी, उसी दिशा में पहला बड़ा कदम मानी जा रही है।

मनोवैज्ञानिक अल्बर्ट बंडुरा की ‘सेल्फ-एफिकेसी’ थ्योरी कहती है कि जब कोई पहली बार असंभव लगने वाला काम कर दिखाता है,
तो वह सिर्फ अपने लिए नहीं, बाद में आने वाले हजारों लोगों के लिए भी यह विश्वास खोल देता है कि ‘यह मुमकिन है।’
2014 में भारत में सिर्फ़ एक प्राइवेट स्पेस स्टार्टअप था। आज यह संख्या 400 से ज्यादा है।

पीटर थील अपनी किताब Zero to One में लिखते हैं कि असली प्रगति हमेशा उस अनदेखे सवाल से आती है,
जो कोई और पूछने की हिम्मत नहीं करता।
पवन और नागा ने ISRO की सुरक्षित दुनिया में यह सवाल पूछने की जगह,
बाहर निकलकर पूछा ‘क्या भारत का प्राइवेट सेक्टर भी सितारों तक पहुंच सकता है?’ आज का जवाब हां।

मेरी बेटी ज्ञानवी सिर्फ 7 साल की है। आज शाम उसे यह खबर बताऊंगा कि भारत ने आज अंतरिक्ष में इतिहास रचा,
और यह इतिहास किसी सरकारी दफ्तर में नहीं, दो दोस्तों के एक साहसी फैसले से शुरू हुआ था।
शायद उसकी पीढ़ी के लिए, सितारों तक पहुंचना उतना ही सामान्य हो जाएगा,
जितना आज हवाई जहाज में सफ़र करना है।

भारत अब अमेरिका और चीन के बाद, दुनिया का सिर्फ तीसरा देश है,
जिसके पास किसी प्राइवेट कंपनी की बनाई ऑर्बिटल रॉकेट को अंतरिक्ष में भेजने की क्षमता है
और यह कंपनी सिर्फ आठ साल पुरानी है,
जिसे शुरू करने वाले दो दोस्त कभी सरकारी वैज्ञानिक हुआ करते थे।

क्या आपके पास भी कभी कोई ऐसा ‘असंभव’ सवाल आया,
जिसे पूछने की हिम्मत आपने या किसी और ने जुटाई और आज वह हकीकत बन चुका है?

लेख साभार राहुल मिश्रा

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