यह समाचार मिलते ही कि अरुणासुर के वध का रहस्य अब ज्ञात हो चुका है, कैलाश पर एक नई उलझन खड़ी हो गई। देवर्षियों ने स्पष्ट बताया कि ब्रह्मा के वरदान के कारण उस महादैत्य का वध किसी देव, दानव, मनुष्य या अस्त्र-शस्त्र से नहीं हो सकता। उसका अंत केवल एक भ्रमरी, अर्थात भौंरे के समान गुंजन करने वाले दिव्य कीट के द्वारा ही संभव था। यह सुनकर कार्तिकेय और गणेश दोनों एक-दूसरे का मुख देखने लगे। समस्या यह नहीं थी कि उपाय मिल गया था, बल्कि समस्या यह थी कि अब माता आदिशक्ति से कौन कहे कि उन्हें स्वयं एक छोटे से कीट का रूप धारण करना होगा। दोनों पुत्र जानते थे कि माता समस्त सृष्टि की जननी हैं। ऐसे में उनसे यह कहना कि वे एक साधारण भ्रमर का रूप धारण करें, सहज बात नहीं थी।
कार्तिकेय ने मुस्कुराते हुए कहा, “गणेश, तुम बुद्धि के देवता हो। यह समाचार माता तक पहुंचाने का कार्य भी तुम्हीं करो।” गणेश ने तुरंत उत्तर दिया, “भैया, आप बड़े हैं। बड़े पुत्र का धर्म है कि वह महत्वपूर्ण समाचार माता तक पहुंचाए। मैं कैसे अपनी मां से कह सकता हूं कि वे कीट का रूप धारण करें?” दोनों के बीच हंसी-मजाक चलता रहा, पर समाधान किसी के पास नहीं था। तभी गणेश के मन में एक अद्भुत योजना जन्मी। उन्होंने निश्चय किया कि माता को कुछ कहने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। ऐसा वातावरण बनाया जाएगा कि माता स्वयं भ्रमरी रूप धारण करने के लिए प्रेरित हो जाएंगी।
इधर माता आदिशक्ति स्वर्गलोक में अत्यंत व्याकुल होकर गणेश और कार्तिकेय की प्रतीक्षा कर रही थीं। उन्होंने कार्तिकेय से पूछा, “पुत्र, क्या गणेश को अरुणासुर के वध का उपाय मिल गया?” कार्तिकेय ने विनम्रता से उत्तर दिया, “माता, उपाय तो मिल गया है। किंतु गणेश ने कहा है कि जैसे ही वह आएगा, आपको स्वयं सब कुछ ज्ञात हो जाएगा।” यह सुनकर माता आश्चर्य में पड़ गईं। वे सोचने लगीं कि ऐसा कौन-सा रहस्य है जो बिना बताए स्वयं प्रकट हो जाएगा।
उधर गणेश सीधे भगवान शिव के पास पहुंचे। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, “पिताश्री, आज मुझे आपकी सहायता चाहिए। यदि जगत का कल्याण करना है और माता के मुख पर मुस्कान लानी है, तो आपको एक विशेष रूप धारण करना होगा।” भगवान शिव ने स्नेहपूर्वक पूछा, “पुत्र, कैसा रूप?” गणेश ने उत्तर दिया, “आपको सहस्रदल कमल बनना होगा।” महादेव कुछ क्षण मौन रहे। उन्होंने कहा, “पुत्र, यदि मैं पुष्प का रूप धारण करूंगा तो सभी देवता इसे देखकर आश्चर्य करेंगे।” गणेश ने मुस्कुराकर उत्तर दिया, “पिताश्री, आपने ही तो सिखाया है कि लोककल्याण के लिए मान और अपमान का विचार नहीं करना चाहिए। आज वही शिक्षा आपको स्वयं निभानी होगी।”
भगवान शिव अपने प्रिय पुत्र की बात सुनकर प्रसन्न हो गए। अगले ही क्षण उन्होंने अपना दिव्य स्वरूप त्यागकर एक अद्भुत सहस्रदल कमल का रूप धारण कर लिया। वह कमल ऐसा था जिसका तेज हजारों सूर्यों के समान प्रकाशित हो रहा था। गणेश ने श्रद्धापूर्वक उस दिव्य कमल को अपने हाथों में उठाया और स्वर्गलोक की ओर चल पड़े। उसी समय भगवान विष्णु ने निर्मल जल का रूप धारण किया और ब्रह्मा ने ज्ञानमयी भूमि का। जब शुद्धता, ज्ञान और शिव का कमल एक साथ प्रकट हुए, तब वहां ऐसा दिव्य सरोवर बन गया जिसकी शोभा का वर्णन स्वयं देवता भी नहीं कर सकते थे।
स्वर्गलोक में माता आदिशक्ति को अचानक एक अलौकिक सुगंध का अनुभव हुआ। उन्हें लगा मानो स्वयं महादेव उनके निकट उपस्थित हों। वे उस दिव्य कमल की ओर आकर्षित होने लगीं। उनके हृदय में अपने आराध्य के प्रति प्रेम उमड़ पड़ा। बिना किसी के कुछ कहे उन्होंने सहसा भ्रमर का रूप धारण कर लिया और मधुर गुंजन करती हुई उस दिव्य कमल के चारों ओर मंडराने लगीं। उसी क्षण गणेश और कार्तिकेय ने एक-दूसरे की ओर देखा और मुस्कुरा उठे। जिस बात को कहने में वे संकोच कर रहे थे, वही कार्य माता ने स्वयं अपने प्रेमवश कर दिया था।
जब माता पुनः अपने दिव्य स्वरूप में लौटीं तो गणेश ने विनम्रता से कहा, “माता, यही आपका भ्रमरी अवतार है। ब्रह्मा के वरदान के कारण अरुणासुर का वध केवल इसी रूप से संभव है।” माता ने स्नेहपूर्वक अपने पुत्रों को देखा और बोलीं, “मैं तो समस्त जीवों की जननी हूं। मेरे लिए कोई भी रूप छोटा या बड़ा नहीं। यदि एक छोटे से भ्रमर का रूप धारण करके भी धर्म की रक्षा हो सकती है, तो यह मेरा सौभाग्य है।”
इधर दूसरी ओर अरुणासुर अपने विशाल महल में बैठा अपने वरदान पर गर्व कर रहा था। वह बार-बार कहता, “मुझे कोई देवता नहीं मार सकता। कोई मनुष्य नहीं मार सकता। कोई अस्त्र-शस्त्र मेरा अंत नहीं कर सकता। और एक तुच्छ भ्रमर? वह मेरा क्या बिगाड़ लेगा?” उसने अपने महल के चारों ओर कई परतों वाली सुरक्षा व्यवस्था बना रखी थी। सबसे बाहर कीटभक्षी सैनिक थे। उनके भीतर विशाल चमगादड़ों की सेना थी। फिर विषैले द्रव्य छोड़ने वाले राक्षस तैनात थे। सबसे भीतर अग्नि और धुएं का ऐसा घेरा था जिसे पार करना असंभव प्रतीत होता था। अरुणासुर हंसते हुए बोला, “यदि कोई भ्रमर यहां तक पहुंच भी गया तो मेरी एक छोटी-सी छिपकली उसे निगल जाएगी।”
तभी अचानक आकाश में एक विचित्र गुंजन सुनाई देने लगी। पहले वह बहुत मंद थी, फिर धीरे-धीरे इतनी तीव्र हो गई कि पूरा वातावरण कांप उठा। अरुणासुर ने अपने सैनिकों से पूछा, “क्या तुम्हें यह आवाज सुनाई दे रही है?” सैनिकों ने कहा, “महाराज, हमें तो कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा।” किंतु वह गुंजन केवल अरुणासुर के कानों में गूंज रही थी। उसे ऐसा लगने लगा मानो हजारों भ्रमर उसकी ओर बढ़ रहे हों। वह क्रोधित होकर चिल्लाया, “कौन है वहां? सामने आओ!”
उसी समय माता आदिशक्ति अपने दिव्य भ्रमरी स्वरूप में प्रकट हुईं। उनके शरीर से असंख्य दिव्य भ्रमर उत्पन्न होने लगे। देखते ही देखते पूरा आकाश काले बादलों की भांति भ्रमरों से भर गया। उनके पंखों की गुंजन इतनी प्रचंड थी कि पर्वत तक कांप उठे। माता ने कहा, “अरुणासुर, तुमने अपने अहंकार में एक छोटे से जीव को तुच्छ समझा। आज वही तुम्हारे अंत का कारण बनेगा।”
अरुणासुर ने अपने सैनिकों को आदेश दिया, “आक्रमण करो। इन कीटों को तुरंत नष्ट कर दो।” अग्निबाण छोड़े गए, पर भ्रमरों ने वर्षा उत्पन्न कर अग्नि को शांत कर दिया। चमगादड़ों की सेना उड़कर आई, किंतु भ्रमर चारों दिशाओं में बिखर गए। चमगादड़ आपस में ही टकराकर नीचे गिरने लगे। विषैले सैनिकों ने अपना विष छोड़ा, पर भ्रमरों के विशाल समूह ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया। देखते ही देखते सारी सुरक्षा व्यवस्था ध्वस्त हो गई।
अब अरुणासुर स्वयं रणभूमि में उतरा। उसने गर्जना करते हुए कहा, “मुझे कोई नहीं मार सकता।” माता ने उत्तर दिया, “अहंकार सदैव अपने विनाश का कारण स्वयं बनता है।” अगले ही क्षण करोड़ों भ्रमर एक साथ अरुणासुर पर टूट पड़े। वे उसकी आंखों, कानों, नासिका और शरीर के प्रत्येक भाग पर छा गए। वह उन्हें हटाने का प्रयास करता रहा, पर प्रत्येक भ्रमर के स्थान पर हजारों नए भ्रमर उत्पन्न हो जाते। उसकी गर्जना धीरे-धीरे चीखों में बदल गई। उसका अपार बल, उसका वरदान और उसका अभिमान सब व्यर्थ सिद्ध होने लगे।
अंततः माता भ्रमरी ने दिव्य तेज के साथ अंतिम आक्रमण किया। असंख्य भ्रमरों ने एक साथ अरुणासुर को चारों ओर से घेर लिया। कुछ ही क्षणों में उसका प्राणांत हो गया। उसका विशाल शरीर धरती पर गिर पड़ा और तीनों लोकों में विजय के शंख बज उठे। देवताओं ने पुष्पवर्षा की। ऋषि-मुनियों ने माता की स्तुति की। समस्त दिशाओं में एक ही जयघोष गूंजने लगा—”जय माता भ्रमरी! जय आदिशक्ति! जय जगदंबा!”
माता ने देवताओं की ओर देखकर कहा, “स्मरण रखो, किसी भी जीव को उसके आकार से कभी तुच्छ मत समझो। शक्ति बाहरी रूप में नहीं, उसके उद्देश्य और धर्म में होती है। जब अधर्म अपनी सीमा पार कर देता है, तब मैं किसी भी रूप में प्रकट होकर धर्म की रक्षा अवश्य करती हूं।”
यही है माता के दिव्य भ्रमरी अवतार की अद्भुत कथा, जो हमें सिखाती है कि अहंकार चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो, धर्म और सत्य के सामने उसका अंत निश्चित होता है। संसार का सबसे छोटा जीव भी ईश्वर की इच्छा से सबसे बड़े अत्याचारी का विनाश कर सकता है, क्योंकि सच्ची शक्ति आकार में नहीं, बल्कि दिव्य संकल्प और धर्म की रक्षा में निहित होती है।
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