Home » ताजा खबर » 14 बार असफल, 15वीं कोशिश में बनीं SDM: आस्था दमेले की प्रेरक कहानी

14 बार असफल, 15वीं कोशिश में बनीं SDM: आस्था दमेले की प्रेरक कहानी

चौदह बार नाम नहीं आया। चौदह बार। पिता हर बार वही एक बात कहते रहे, जो भी भर्ती परीक्षा आए, बैठो। किसी न किसी में नाम आएगा। फिर एक दिन, 3,28,990 लोगों वाली एक परीक्षा में उसका नंबर आया। तेईसवां।
यह कहानी सफलता की नहीं है।
यह उस पंद्रहवें फॉर्म की कहानी है, जो चौदह बार ‘नहीं’ सुनने के बाद भी भरा गया था।
20 जून 2026। पटना। बिहार लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष रवि मनुभाई परमार ने 70वीं संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा का अंतिम नतीजा पढ़ा।
2,035 पदों के लिए 2,027 नाम। आयोग के इतिहास की एक बड़ी भर्ती।
उस सूची में तेईसवें नंबर पर एक नाम था।
आस्था दमेले।
मध्य प्रदेश। टीकमगढ़ जिला। पलेरा।
बुंदेलखंड का एक कस्बा, जिसका नाम बिहार में शायद किसी ने न सुना हो।
अब उसी कस्बे की बेटी बिहार में एसडीएम बनेगी।
पहले पलेरा की बात।
2011 की जनगणना के आंकड़े कहते हैं, पलेरा तहसील की साक्षरता 51 प्रतिशत थी।
औरतों की, सिर्फ 40.75 प्रतिशत। यानी सौ में इकतालीस।
बाकी उनसठ के लिए कागज पर अपना नाम लिखना भी एक इम्तिहान था।
उसी कस्बे के एक घर में पिता छोटे-छोटे मौसमी धंधे करते थे।
सीजन आया तो काम। सीजन गया तो इंतजार।
इस घर की एक लड़की सातवीं में पढ़ती थी।
और सातवीं के बाद उसे घर छोड़ना पड़ा।
वजह कोई झगड़ा नहीं थी, कोई मजबूरी की कहानी नहीं।
पलेरा में आगे पढ़ने का ठीक इंतजाम ही नहीं था। बस इतना।
बारह-तेरह साल की उमर। एक बैग। और छतरपुर का पता।
आठवीं से बारहवीं, वहीं।
फिर दिल्ली। रामजस कॉलेज से ग्रेजुएशन। इग्नू से पोस्ट-ग्रेजुएशन।
दिल्ली ने उसे एक सपना देकर बुलाया था-यूपीएससी।
उसे यकीन था, पहले ही प्रयास में आईएएस।
दो प्रयास बीते।
दोनों में नाम नहीं आया।
प्रभात खबर से बातचीत में आस्था ने माना कि वह धक्का बहुत गहरा था।
फिर उसने एक के बाद एक फॉर्म भरे।
एमपीपीएससी। यूपीपीएससी। राजस्थान पीएससी। सीएसआईआर और कुछ और भर्तियां।
गिनती जोड़िए, इक्कीस परीक्षाएं।
सफलता सिर्फ सात में।
और चौदह बार वही सन्नाटा, सूची में नाम नहीं।
मनोविज्ञान में इस सन्नाटे का एक नाम है।
मनोवैज्ञानिक मार्टिन सेलिगमैन ने इसे ‘सीखी हुई बेबसी’ कहा।
बार-बार असफल होने पर इंसान कोशिश करना छोड़ देता है।
लेकिन हर कोई ऐसा नहीं करता। फर्क इस बात से पड़ता है कि वह असफलता को क्या नाम देता है।
‘मैं कभी नहीं कर पाऊंगा’
या ‘इस बार नहीं हुआ।‘
और बड़े भाई ने एक दूसरी बात कही, जो और बड़ी थी।
कि सफलता सिर्फ नतीजा नहीं है। जो पढ़ाई हम कर रहे हैं, वह भी अपने आप में हासिल है।
छोटी बहन के लिए तो आस्था स्कूल के दिनों से ही मिसाल थी।
एक घर, जिसमें कोई अफसर नहीं था
पर हर आदमी को पता था कि हारे हुए इंसान से क्या कहना है।
एंजेला डकवर्थ ने इसे एक शब्द दिया, Grit।
उन्होंने अमेरिका की वेस्ट पॉइंट मिलिटरी अकादमी में हजारों कैडेटों को परखा।
नतीजा यह निकला कि कौन टिकेगा, यह उनके टेस्ट-स्कोर, क्लास-रैंक या शारीरिक ताकत से तय नहीं होता था। तय करती थी जिद। लंबी, ऊबाऊ, रोज की जिद।
यानी रोज-रोज की वही जिद, जो किसी बड़े टैलेंट से भी ज़्यादा दूर तक ले जाती है। आस्था का इक्कीस फॉर्म भरने वाला हाथ उसी जिद का सबूत है।
अब उस परीक्षा की बात, जिसने उसे अफसर बनाया।
13 दिसंबर 2024। प्रीलिम्स। 3,28,990 अभ्यर्थी।
पर्चा लीक होने के आरोप लगे। पटना में विरोध हुआ। मामला हाईकोर्ट तक गया। एक केंद्र की परीक्षा दोबारा करानी पड़ी।
अप्रैल 2025 में मुख्य परीक्षा, पटना के 32 केंद्रों पर।
इंटरव्यू जनवरी से फरवरी 2026 तक चले, 5,401 अभ्यर्थियों के।
और नतीजा आया 20 जून 2026 को।
गिनिए – डेढ़ साल।
यह उसका पहला प्रयास था। और पहला प्रयास डेढ़ साल लंबा था।
जो कहते हैं कि तैयारी सबसे मुश्किल होती है, उन्होंने कभी नतीजे का इंतजार नहीं किया होगा।
उसकी तैयारी में कोई जादू नहीं था। चार आदतें थीं, जो कोई भी उठा सकता है।
अगर घर में कोई प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा है, तो यह हिस्सा Save कर लीजिए।
1. अपने हाथ से नोट्स
2. हर उत्तर के साथ डायग्राम
3. रोज अखबार का विश्लेषण
4. रोज एक घंटा योग और ध्यान
कभी-कभी सफलता पूरी किताब नहीं, सिर्फ चार आदतों पर टिकी होती है।
20 जून की शाम, जब नतीजा आया, पिता को रैंक से मतलब नहीं था।
उन्हें एक ही बात जाननी थी, बेटी को कौन सा पद मिला।
और जब पता चला कि एसडीएम, तो उनका सीना चौड़ा हो गया।
पिता ने कभी यह नहीं कहा-‘अब छोड़ दो।‘
उन्होंने सिर्फ इतना कहा, ‘जो भी भर्ती परीक्षा आए, बैठो।
किसी न किसी में नाम जरूर आएगा।‘
कभी-कभी पूरी जिंदगी सिर्फ एक वाक्य के सहारे खड़ी रहती है।
मां का हाल दूसरा था।
प्रभात खबर के मुताबिक, वे अब तक इस नतीजे को कबूल ही नहीं कर पाई हैं।
आस्था खुद भी नहीं। जब कोई बधाई देता है, तब लगता है -हां, कुछ हुआ है।
मेरी मां गृहिणी हैं।
मैंने उन्हें बुरी खबर बहुत जल्दी मान लेते देखा है।
और अच्छी खबर पर हमेशा एक ही सवाल सच में?
मुझे लगता है, जो मांएं बरसों तक बच्चे की नाकामी अपने भीतर सहेजती रहती हैं, उनके दिल में उम्मीद के लिए जगह कम बच जाती है।
इसलिए अच्छा होने पर वे उसे तुरंत उठाती नहीं। पहले छूकर देखती हैं, कि टूट न जाए।
हम सब किसी एक चिट्ठी के इंतजार में बैठे हैं। कोई रैंक की, कोई नौकरी की, कोई सिर्फ एक ‘हां’ की।
जिंदगी में सबसे कठिन काम पहला फॉर्म भरना नहीं होता।
सबसे कठिन काम होता है, चौदह ‘नहीं’ के बाद -पंद्रहवां फॉर्म भरना।
अगर आपके घर में, या आपके दोस्तों में कोई ऐसा है जो इन दिनों बार-बार नाकाम हो रहा है, तो यह कहानी उसकी दीवार तक पहुंचनी चाहिए।
मुमकिन है, आज उसे किसी भाषण की नहीं, बस पलेरा के उस पिता की एक लाइन की जरूरत हो।
मैं राहुल हूं। मैं उन लोगों की खबरें ढ़ूंढ़ता हूं जिनका नाम सूची में देर से आता है, पर आता है। ऐसी सच्ची कहानियां यहां मिलती रहेंगी-साथ चलिए।

Diclaimer : इसका हमारी The भारत SSSRK News24x7 समाचार और राष्ट्र दर्शन (सबसे तेज़, सबसे आगे…),
यह एक आंकलन मात्र है…

sssrknews
Author: sssrknews

इस खबर पर अपनी प्रतिक्रिया जारी करें

Leave a Comment

Share This