इतिहास का सबसे बड़ा विश्वासघात: जब भारत की स्वतंत्रता और अस्मिता का सौदा हुआ….
कभी आपने सोचा है कि जिस भारत को ‘सोने की चिड़िया’ कहा जाता था और जिसकी सीमाओं से दुश्मन कांपते थे, वह आजादी मिलने के बाद भी दशकों तक लाचार, पिछड़ा और अपनी सुरक्षा के लिए दूसरों पर निर्भर क्यों बना रहा? क्यों हमारे वीरों के पराक्रम पर हमेशा दिल्ली के गलियारों से ब्रेक लगा दिया जाता था? क्यों सेना जीतती रही और मेज़ पर बैठी सरकार हारती रही?
इन सवालों का जवाब किसी बाहरी दुश्मन के पास नहीं, बल्कि इतिहास के उस ढके हुए पन्ने में छिपा है जिसे ‘नेहरूवादी सोच’ और ‘शाही तुष्टिकरण’ कहा जाता है। यह कहानी है उस सोच की, जिसने भारत की वीरता, अखंडता और स्वाभिमान का सौदा अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के लिए किया।
आजाद हिंद फौज और नेताजी के साथ गद्दारी
1947 में अंग्रेजों के जाने का असली कारण अहिंसा का छलावा नहीं, बल्कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस और उनकी ‘आज़ाद हिंद फ़ौज’ का वह खौफ था जिसने भारतीय सैनिकों के भीतर बगावत की ज्वाला भड़का दी थी। लेकिन सत्ता की कुर्सी पर बैठते ही गांधी-नेहरू तंत्र ने सबसे पहला काम नेताजी के अस्तित्व को मिटाने का किया।
आजादी के बाद दशकों तक नेताजी के परिवार की जासूसी करवाई गई। उनकी फाइलों को गुप्त रखा गया ताकि देश कभी यह न जान सके कि उनके महानायक के साथ क्या हुआ था।
जो ब्रिटिश सरकार नेताजी को ‘युद्ध बंदी’ (War Criminal) मानती थी, उसी व्यवस्था के साथ सांठगांठ करके नेताजी के योगदान को पाठ्यपुस्तकों के एक छोटे से कोने में समेट दिया गया।
1962 का युद्ध: सेना को नीचा दिखाने का अक्षम्य अपराध
1962 में चीन के साथ हुए युद्ध में भारतीय सेना की पराजय देश की हार नहीं, बल्कि जवाहरलाल नेहरू और उनके रक्षा मंत्री वी.के. कृष्ण मेनन की नीतियों की हार थी।
’हिंदी-चीनी भाई-भाई’ के खोखले नारों में मस्त सरकार ने भारतीय सैनिकों को बिना गर्म कपड़ों, बिना जूतों और पुरानी बंदूकों के साथ बर्फ़ीली चोटियों पर चीन की आधुनिक सेना से लड़ने भेज दिया। जब सेना ने संसाधन मांगे, तो कहा गया कि “भारत को सेना की जरूरत ही क्या है, हमें तो पुलिस से काम चला लेना चाहिए।”
1962 में भारत की भूमि चीनी कब्जे में गई, और संसद में खड़े होकर नेहरू ने निर्लज्जता से कहा— “वहाँ तो घास का एक तिनका भी नहीं उगता, वह ज़मीन हमारे किस काम की!” यह भारतीय वीरों के बलिदान का सीधा अपमान था।
लाल बहादुर शास्त्री की संदिग्ध मृत्यु और ताशकंद का रहस्य
1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में जब प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के नेतृत्व में भारतीय सेना ने लाहौर के दरवाजे तक दस्तक दे दी थी, तब पूरा देश एक नए गौरव का अनुभव कर रहा था। भारतीय सेना ने रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण ‘हाजी पीर दर्रा’ जीत लिया था।
लेकिन ताशकंद समझौते के दौरान ऐसा क्या हुआ कि जीता हुआ हाजी पीर दर्रा पाकिस्तान को वापस सौंप दिया गया? और उसी रात लाल बहादुर शास्त्री जी की रहस्यमयी परिस्थितियों में मृत्यु हो गई। उनके शरीर का पोस्टमार्टम तक नहीं होने दिया गया। आखिर उस रात ताशकंद में क्या छिपाया गया? देश के सबसे लोकप्रिय और ईमानदार प्रधानमंत्री की मौत की जांच फाइलों के ढेर में क्यों दबा दी गई?
इमरजेंसी का तांडव: लोकतंत्र का सबसे काला अध्याय
जब-जब इस परिवार की सत्ता पर आंच आई, इन्होंने देश के संविधान और लोकतंत्र को रौंदने में एक सेकंड का समय नहीं लगाया। 1975 में जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी के चुनाव को रद्द कर दिया, तो अपनी कुर्सी बचाने के लिए पूरी देश की जनता को ‘इमरजेंसी’ (आपातकाल) की जेल में ढकेल दिया गया।
अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, जॉर्ज फर्नांडिस समेत विपक्ष के हर नेता को जेल में ठूंस दिया गया। प्रेस पर ताला लगा दिया गया, न्यायपालिका के अधिकार छीन लिए गए, और जबरन नसबंदी जैसे बर्बर अभियान चलाए गए। जो आज संविधान बचाने का ढोंग रचते हैं, वे उसी विचारधारा के वाहक हैं जिसने भारतीय संविधान की आत्मा की हत्या की थी।
सिख कत्लेआम और ‘बड़ा पेड़’ वाला अहंकार 1984 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली और देश के कोने-कोने में हजारों निर्दोष सिखों को जिंदा जला दिया गया, उनकी संपत्तियों को लूट लिया गया।
यह कोई अचानक भड़का दंगा नहीं था, बल्कि सत्ता द्वारा प्रायोजित नरसंहार था।
जब देश जल रहा था और सिख सड़कों पर अपनी जान की भीख मांग रहे थे, तब राजीव गांधी ने बेशर्मी से अपने अहंकार को सही ठहराते हुए कहा था— “जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है, तो धरती थोड़ी हिलती ही है।” नरसंहार के मुख्य आरोपियों को सजा देने के बजाय उन्हें कांग्रेस सरकार में बड़े-बड़े मंत्री पद देकर नवाजा गया।
गुलामी के प्रतीक से मुक्ति का समय दशकों तक इस देश की चेतना को यह विश्वास दिलाने की कोशिश की गई कि भारत की पहचान सिर्फ एक परिवार से है।
हमारे महापुरुषों—सरदार पटेल, वीर सावरकर, डॉ. आंबेडकर, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और भगत सिंह के योगदान को सिर्फ इसलिए छोटा किया गया ताकि एक परिवार का आभामंडल चमकता रहे।
लेकिन आज का भारत उस वैचारिक गुलामी की जंजीरों को तोड़ चुका है। आज जब केदारनाथ से लेकर काशी और राम मंदिर तक भारत के गौरव का पुनर्जागरण हो रहा है, तो इस परिवार की बची-कुची जमीन खिसक रही है।
यह नया भारत है—जो इतिहास के हर उस काले पन्ने का हिसाब मांग रहा है जहाँ देश के स्वाभिमान का सौदा किया गया था।
गंभीर समस्या है.
साभार: सोशल मीडिया
Diclaimer : इसका हमारी The भारत SSSRK News24x7 समाचार और राष्ट्र दर्शन (सबसे तेज़, सबसे आगे…),
यह एक आंकलन मात्र है…





