पुरुष जब पत्नी को बेइंतहा चाहने लगता है और पत्नी मायके जाने पर बेचैन हो जाता है…
बस उसी दिन से पत्नी उसे बकलोल समझने लगती है..!
ऐसे ही बकलोल आए दिन पत्नी वियोग में आत्महत्या कर बैठते हैं..!
कुछ दिनों के रोने-धोने के बाद स्त्री की जिंदगी में कोई और पुरुष आ जाता है..और ये कोई और पुरुष अक्सर पुराने मित्र ही होते हैं..!!
जो पुरुष पत्नी वियोग बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं, समाज उन्हें ही मेहरा, पिछलग्गू, जोरू का गुलाम इत्यादि नामों से चिढ़ाता है..!!
पति को प्यार करने वाली संस्कारी पत्नियों की भी कुछ पहचान होती है…
जब पति परेशान होता है, तब उसकी नींद उड़ जाती है। जब पति खाना नही खाता, उसकी भूख मर जाती है। पति की लम्बी उम्र के लिए पता नही वह कितने व्रत करती है।
मंदिरों मे जाकर प्रार्थनाएं करती है और मन्नतें मांगती है। पति बीमार पड़ जाता है, तब बेहद घबरा जाती है और सेवा करती है।
जब पति की जेब खाली होती है तब अपनी सारी संचित पूंजी उसके हवाले कर देती है।
अपनी सबसे प्यारी चीज अपने गहने तक गिरवी या बेच देती है ❗
पति को प्रेम करने वाली स्त्रियां, पति से दूर रह ही नहीं सकती,
किसी तीज त्यौहार को, या किसी बच्चे के जन्मदिन या किसी की एनिवर्सरी को यदि मायके जाना पड़ जाए तो वह पति संग जाती हैं और पति संग लौट आती हैं…
वो सभी मायके जाने की बस औपचारिकता निभाती हैं…बस ।।
मां-बहनें भले ही मिन्नतें करें मगर वो नहीं रूकती हैं…
कुछ सास/ससुर की तबीयत खराब और उनकी देखभाल का बहाना बनाती हैं,
तो कुछ “इनकी भी तबीयत ठीक नहीं चल रही है” कहकर निकल लेती हैं..
बच्चों वाली तो बच्चों के स्कूल और पढ़ाई का हवाला देते हुए, वापसी कर लेती हैं..!!
यदि मायके में कुछ दिन रुकने की बात आ जाए और ससुराल लोकल हो तो कुछ पत्नियां अपने पति से यह कह देती हैं
शाम का खाना यही खाने आ जाया करिए और फिर खाना खिलाते खिलाते हो जाती है रात…और पति का बिस्तर लगा दिया जाता है..????
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— देखिए चाहने वाले हजार बहाने करके भी मिल ही लेते हैं, जुदा तो बिल्कुल नहीं होते..!!
जो लोग एक दूसरे से ऊब जाते हैं या कोई तीसरा जिंदगी में आ जाता है तो फिर हजार कमियां नजर आ जाती है जीवनसाथी में..!






