संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान लोकसभा और राज्यसभा दोनों ने ‘सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया’ (SHANTI) बिल 2025 को मंजूरी दे दी है। इस विधेयक के तहत परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी को अनुमति देने का प्रावधान किया गया है। सत्ता पक्ष ने इसे ऐतिहासिक कदम बताते हुए भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में अहम बताया है, जबकि विपक्ष का आरोप है कि यह बिल निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए लाया गया है। वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने SHANTI बिल के पारित होने को देश के लिए एक परिवर्तनकारी क्षण करार दिया है।
पीएम मोदी ने क्या कहा?
SHANTI बिल के संसद से पारित होने पर प्रधानमंत्री मोदी ने कहा,
“संसद के दोनों सदनों द्वारा SHANTI विधेयक का पारित होना हमारे तकनीकी परिदृश्य के लिए एक परिवर्तनकारी क्षण है। इसे समर्थन देने वाले सभी सांसदों का मैं आभार व्यक्त करता हूं। सुरक्षित रूप से एआई को सशक्त बनाने से लेकर ग्रीन मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने तक, यह विधेयक देश और दुनिया के लिए स्वच्छ ऊर्जा भविष्य को निर्णायक गति देता है। इससे निजी क्षेत्र और युवाओं के लिए नए अवसर खुलेंगे। भारत में निवेश, नवाचार और निर्माण के लिए यह बेहतरीन समय है।”
सरकार ने क्या दलील दी?
सरकार ने सदन में SHANTI बिल को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि यह 2047 तक भारत को विकसित देश बनाने के लक्ष्य को हासिल करने में अहम भूमिका निभाएगा। केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत की वैश्विक भूमिका लगातार बढ़ रही है और ऐसे में अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप कदम उठाना जरूरी है। उन्होंने कहा, “यदि हमने 2047 तक 100 गीगावाट स्वच्छ ऊर्जा का लक्ष्य रखा है, तो उसे हासिल करने में परमाणु ऊर्जा की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होगी।” साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि यह विधेयक देश की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को मजबूत करेगा।
विरोध करने वालों का क्या कहना है?
SHANTI बिल के पारित होने को लेकर विरोध भी सामने आया है। ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन (AIPEF) ने घोषणा की है कि वह 23 दिसंबर को केंद्रीय श्रमिक संगठनों और संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) के साथ मिलकर देशभर में इस बिल के खिलाफ प्रदर्शन करेगा। संगठन का आरोप है कि यह विधेयक भारत के नागरिक परमाणु क्षेत्र को निजी और विदेशी भागीदारी के लिए खोलता है, जिससे परमाणु सुरक्षा और जवाबदेही की मौजूदा व्यवस्था कमजोर हो सकती है।






