Home » ताजा खबर » महाभारत की सीख: पैरेंटिंग भविष्य गढ़ती है, भाग्य नहीं

महाभारत की सीख: पैरेंटिंग भविष्य गढ़ती है, भाग्य नहीं

महाभारत में एक गहरा प्रसंग आता है—पांडु की मृत्यु के बाद कुंती और माद्री दोनों सती होना चाहती थीं, पर माद्री ने कहा कि “यदि आप सती हो गईं और मैं रह गई, तो मैं आपके तीनों बच्चों का पालन वैसे नहीं कर पाऊँगी जैसे आप कर सकती हैं। और अगर मैं सती हो जाऊँ और आप रहें, तो आप मेरे दोनों बच्चों—नकुल और सहदेव—को भी अपने ही बच्चों की तरह पाल लेंगी। दुनिया यही मानेगी कि कुंती के पाँच पुत्र हैं।” और हुआ भी यही। एक स्त्री, अभाव, जंगल, संघर्ष और विधवापन—इन सभी परिस्थितियों में पाँच ऐसे पुत्र तैयार करती है जो आगे चलकर ‘धर्म के स्तंभ’ कहलाते हैं। जिस दिन भगवान को यह निर्णय करना पड़ा कि वे किसके पक्ष में खड़े होंगे, भगवान ने पांडवों का पक्ष चुना—क्योंकि एक स्त्री ने कठिनाइयों में भी सही ‘लालन–पालन’ किया था। दूसरी ओर हस्तिनापुर में धृतराष्ट्र जन्मांध थे, और गांधारी ने भी अपने पति की परिस्थिति देखकर अपनी आँखों पर स्वेच्छा से पट्टी बाँध ली। और जब घर में पिता पहले से अंधा हो और माँ भी अंधी होने का निर्णय ले ले, तो उस घर में 100 कौरव पैदा होते हैं—यह भी लालन–पालन का ही परिणाम है। महाभारत यह सिखाती है कि पालन-पोषण केवल शरीर पालना नहीं, बल्कि चरित्र, विवेक और भविष्य बनाना है।

यही बात आज हमें समझ नहीं आती। कुछ समय पहले मैं एक पेरेंट से यही समझा रहा था। मैंने उसे बताया कि जब मैं क्लास 3–4 में था, हमें सिर्फ एक पेंसिल दी जाती थी। दूसरी पेंसिल तभी मिलती जब पहली पूरी खत्म हो जाए और उसका फिज़िकल प्रूफ दिखाना पड़े। अगर पेंसिल खो जाए—तो नई पेंसिल नहीं मिलती, उल्टा डाँट मिलती। इसी से हमने कम में मैनेज करना, पेंसिल बचाकर चलाना, दोस्तों से शेयर करना और हर चीज़ का मूल्य समझना सीखा। हम धीरे-धीरे रिसोर्सफुल बनते गए।

और आज? बच्चे रोज़ पेंसिल खो देते हैं और माता-पिता बिना पूछे रोज़ नई पेंसिल थमा देते हैं। बच्चे को न यह पता है कि चीज़ कहाँ से आती है, न इसका मूल्य क्या है, न जिम्मेदारी क्या होती है। अगर एक दिन पेरेंट कह दे—“आज नई पेंसिल नहीं मिलेगी”—तो बच्चा स्कूल जाने से मना कर देगा। वो इसलिए नहीं कि बच्चा गलत है—बल्कि इसलिए कि उसे कभी संसाधनों की कद्र सिखाई ही नहीं गई। फिर वही पेरेंट कहते हैं—“मेरा बच्चा मूडी है।” बच्चा मूडी नहीं है—पैरेंटिंग कमजोर है। ओवर-पैम्परिंग, हर जरूरत तुरंत पूरी कर देना, हर नुकसान को इग्नोर करना, हर गलती को ढक देना—ये सब बच्चों का आत्मनिर्भरता, संघर्ष क्षमता और संसाधनशीलता छीन लेते हैं।

महाभारत आज भी यही सिखाती है—पैरेंटिंग भविष्य बनाती है।
कुंती ने अभावों में भी पाँच धर्म–पुत्र बनाए।
गांधारी ने आँखें बंद कर लीं और सौ कौरवों का जन्म हुआ।

आज हम क्या कर रहे हैं?
हम बच्चों को हर मुश्किल से बचा रहे हैं, और इसी में उन्हें कमजोर बनाते जा रहे हैं।
पैरेंटिंग का मतलब सुविधाएँ देना नहीं—संस्कार, जिम्मेदारी और संघर्ष–क्षमता देना है।????????????

sssrknews
Author: sssrknews

इस खबर पर अपनी प्रतिक्रिया जारी करें

Leave a Comment

Share This