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नीतियों की मार: एक परिवार की कहानी से उठते बड़े सवाल

एक सवर्ण युवक की कल्पना करो। नाम रखते हैं राहुल शर्मा। इंजीनियरिंग में अव्वल, 98 परसेंटाइल NEET में, फिर भी मेडिकल कॉलेज का दरवाज़ा बंद। कारण? आरक्षण। उसकी सीट चली गई किसी ऐसे छात्र को जिसने आधे मार्क्स भी नहीं लाए। राहुल आज 70 लाख रुपए की फीस वाला प्राइवेट कॉलेज पढ़ रहा है, जिसके लिए पिता ने गाँव की आखिरी जमीन बेच दी। माँ चुपके से रोती है, “बेटा, हमारे बाप-दादा ने अपना बलिदान देकर देश को आज़ाद करवाया, आज हम कर्ज़ में डूब रहे हैं।”
दूसरी तस्वीर। राहुल का बड़ा भाई रवि, सरकारी नौकरी में था। ऑफिस में चपरासी ने अभद्रता की। रवि ने सिर्फ इतना कहा, “ऐसे नहीं बोलते।” बस, अगले दिन SC/ST एक्ट का केस। बिना जाँच, बिना सबूत, सीधे जेल। 2 साल तक अदालत के चक्कर, नौकरी गई, सम्मान गया, बीवी-बच्चे त्रस्त। आज रवि ऑटो चलाता है। जब कोई पूछता है “क्या हुआ भाई?” तो आँखों में आँसू भर आते हैं और कहता है, “कुछ नहीं, बस गलत जगह देश का रक्षक पैदा हो गया।”

ये 1-2 कहानियाँ नहीं, लाखों सवर्ण परिवारों का रोज़ का सच है। जिस देश की रक्षा हमारे पूर्वजों ने सीने पर गोली खाकर की, जिस देश को आज़ाद करवाने के लिए हमारे बाप-दादाओं ने फाँसी के फंदे चूमे, उसी देश में आज हम “जनरल कैटेगरी” बनकर अपराधी घोषित हैं। 50% से ज्यादा सीटें आरक्षण की, प्रमोशन में आरक्षण, यहाँ तक कि कानून में भी आरक्षण। एक ही अपराध, सवर्ण को सजा, आरक्षित वर्ग को राहत। कानून का नाम SC/ST एक्ट है, मगर काम सवर्णों को कुचलने का। झूठा केस लगाने वाले को कोई सजा नहीं, लेकिन सवर्ण का करियर, परिवार, इज्जत 1 सेकंड में खत्म।
और सबसे बड़ा दर्द? हमारी अपनी चुनी सरकारें ये सब देखती हैं और चुप रहती हैं। मोदी जी कहते हैं, “मेरे रहते आरक्षण कोई खत्म नहीं कर सकता।” अमित शाह जी धमकी देते हैं, “जो आरक्षण छूने की बात करेगा, उसे हम खत्म कर देंगे।” राजनाथ सिंह जी मौन साधे तमाशा देखते हैं। यानी सवर्णों के वोट से कुर्सी, और सवर्णों के ही गले पर छुरी।

सवर्ण समाज के पास पढ़ाई है, प्रतिभा है, मेहनत है, लेकिन अपना 1 भी नेता नहीं। सैकड़ों सवर्ण सांसद हैं, मगर कोई 1 भी संसद में खड़ा होकर नहीं कहता, “मेरे समाज के बच्चे आत्महत्या कर रहे हैं, मेरे समाज के नौजवान बेरोजगार घूम रहे हैं, मेरे समाज के बुजुर्ग अपमान सह रहे हैं।” सबकी ज़ुबान पर ताला। क्यों? क्योंकि वोट दूसरों का है, और सवर्ण तो बस “गाय हमारी, दूध किसी और का” बनकर रह गए हैं।
आज सवर्ण माँ-बाप अपने बच्चे से कहते हैं, “बेटा, विदेश भाग जाओ, यहाँ तुम्हारे लिए कुछ नहीं बचा।” जिस देश को हमारे पूर्वजों ने खून से सींचा, उस देश से हमारा बच्चा भाग रहा है। ये शर्म नहीं, ये हमारे समाज का धीमा नरसंहार है।

अपने बच्चों के 1-1 आँसू को वोट मत बनने दो।
ये पार्टी की गुलामी तुम्हारा विनाश कर रही है।

जब तक चुप रहोगे, लाठी भी खाओगे, गाली भी सुनोगे, और अंत में ठोकर भी।
इतिहास गवाह है, जो समाज अपने हक के लिए नहीं लड़ा, वह मिट गया।
अब समय है, या तो जागो, या हमेशा के लिए सो जाओ।

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Author: sssrknews

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