यह कोई साधारण राजनीतिक किरदार नहीं है, बल्कि वह धुरी है जिसके इर्द-गिर्द दक्षिण की राजनीति ने इस चुनाव में करवट ली। आज अगर केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार बनाने की स्थिति में पहुँचे हैं, तो उसके पीछे इस व्यक्ति की रणनीतिक समझ और त्यागपूर्ण भूमिका को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
इस नेता ने सबसे पहले आंध्र प्रदेश में दो अलग-अलग धाराओं—भाजपा और टीडीपी—को एक मंच पर लाने का साहसिक काम किया। जिन दलों के बीच दूरी थी, उन्हें साझा उद्देश्य के लिए साथ खड़ा करना आसान नहीं होता, लेकिन इस व्यक्ति ने वह कर दिखाया।
दूसरा और उससे भी बड़ा काम यह रहा कि तेलंगाना और आंध्र—दोनों राज्यों में कांग्रेस के खिलाफ एक स्पष्ट संदेश के साथ जनता के बीच पहुँचे। “कांग्रेस हटाओ, देश बचाओ” का नारा सिर्फ शब्द नहीं था, बल्कि एक राजनीतिक दिशा थी, जिसने मतदाताओं को सोचने पर मजबूर किया।
इसका असर कितना गहरा रहा, इसका अंदाज़ा आँकड़ों से लगाया जा सकता है। तेलंगाना की 17 लोकसभा सीटों में से 8 पर भाजपा की जीत, और आंध्र प्रदेश में भाजपा की 3 सीटें—यह सब उस ज़मीन पर हुआ जहाँ पहले भाजपा की मौजूदगी सीमित मानी जाती थी। वहीं टीडीपी को 16 सीटों तक पहुँचाने में भी इसी व्यक्ति की भूमिका निर्णायक रही।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह नेता न तो भाजपा का है, न टीडीपी का। उसका अपना अलग राजनीतिक दल है—जनसेना। इसके बावजूद उसने अपने संकीर्ण हितों से ऊपर उठकर दक्षिण भारत में कांग्रेस को रोकने के लिए पूरी ताकत झोंक दी।
सोचिए, एक ऐसा नेता जिसकी अपनी पार्टी है, अपनी पहचान है, लेकिन उसने व्यक्तिगत लाभ से ज़्यादा देश की राजनीतिक दिशा को प्राथमिकता दी। तेलंगाना जैसे राज्य में भाजपा के लिए माहौल बनाना, और आंध्र प्रदेश में गठबंधन को मज़बूती देना—यह साधारण राजनीतिक सूझबूझ नहीं, बल्कि दूरदर्शिता है।
इसी का नतीजा रहा कि आंध्र प्रदेश के विधानसभा चुनावों में गठबंधन को ऐतिहासिक सफलता मिली। 175 सीटों में टीडीपी को 135, भाजपा को 8 और जनसेना को 21 सीटें—यह आंकड़े खुद कहानी बयान करते हैं।
अगर यह संतुलन, यह समझ और यह सहयोग न होता, तो शायद आज लोकसभा में भाजपा 240 के आँकड़े तक भी नहीं पहुँच पाती।
इस पूरी राजनीतिक बिसात पर जिस एक नाम की छाप सबसे साफ़ दिखती है, वह है—
पवन कल्याण।
यह नाम सिर्फ एक नेता का नहीं, बल्कि उस व्यक्ति का है जिसने बिना शोर मचाए, बिना श्रेय की माँग किए, देश की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाई।
अगर आपको भी लगता है कि ऐसी भूमिका की सराहना होनी चाहिए, तो इस बात को आगे बढ़ाइए—क्योंकि सच को आवाज़ मिलनी ही चाहिए।






