यात्रियों से भरी बस टूटे पुल से गिरने वाली थी, तभी महाकाल बन कर आए, सभी भक्तों का काल हरने।
यही बात थी जो उज्जैन के महाकाल लोक के पास वाले बस अड्डे पर आज भी सुनाई जाती है। सावन का पहला सोमवार, 22 जुलाई 2024। ओंकारेश्वर जा रही बस, नर्मदा पर बना पुराना हंडिया पुल, और एक पल जो काल बन कर आया था, पर महाकाल बन कर टल गया।
अध्याय 1: सावन की बस
22 जुलाई 2024। सावन का पहला सोमवार।
उज्जैन। महाकाल मंदिर में सुबह 3 बजे से भीड़।
नानाखेड़ा बस स्टैंड से, सुबह 5 बजे, एक प्राइवेट बस निकली। ओंकारेश्वर। 52 सीटर। पूरी भरी। ऊपर छत पर भी 4 कावड़िये।
ड्राइवर रघुवीर यादव। उम्र 47 साल। 20 साल से इसी रूट पर। कंधे पर महाकाल का गमछा। डैशबोर्ड पर छोटा सा शिवलिंग। रोज़ चलने से पहले, एक बार घंटी बजाता, बोलता, चलो बाबा।
उस दिन भी वही किया।
बस में कौन कौन था?
सीट 1 पर, कमला ताई, 68 साल। हर सावन ओंकारेश्वर जाती हैं। 31 साल से।
सीट 12 पर, अंजलि और उसका 4 साल का बेटा आरव। पति का ऑपरेशन था, मन्नत माँगी थी।
सीट 23 पर, तीन कॉलेज के लड़के, शिवम, आयुष, मोहित। पहली बार कावड़ लेने जा रहे थे।
सीट 40 पर, इस्माइल चाचा, 72 साल। फल बेचते हैं। हर साल सावन में ओंकारेश्वर के बाहर भंडारा लगाते हैं। कहते हैं, महाकाल सबके हैं।
आखिरी सीट पर, एक साधु। मौनी। आँखें बंद। हाथ में रुद्राक्ष।
52 यात्री। 52 कहानियाँ। 52 मन्नतें।
बस इंदौर होते हुए, खंडवा रोड पर। बारिश तेज़। सावन की झड़ी।
दोपहर 1 बज कर 14 मिनट। बस हंडिया पुल पर पहुँची। नर्मदा। पानी उफान पर। लाल मटमैला।
पुल पुराना था। अंग्रेजों के समय का। लोहे का। नीचे से जंग खाया हुआ। बोर्ड लगा था, भारी वाहन निषेध। मरम्मत चल रही थी। एक लेन बंद।
रघुवीर धीरे चला रहा था। 20 की स्पीड। वाइपर तेज़।
पुल के बीचों बीच पहुँचे, तभी आवाज़ आई।
कड़ाक।
जैसे लोहा टूटा हो।
बस का पिछला बायाँ पहिया धँसा। पुल का एक जॉइंट टूट गया था। पूरा स्लैब नीचे झुक गया।
बस तिरछी। यात्री चीखे। बच्चे रोए।
रघुवीर ने ब्रेक दबाया। ब्रेक फेल। बारिश में स्लिप।
बस धीरे धीरे, पीछे की ओर, टूटे हुए हिस्से की तरफ खिसकने लगी।
नीचे, 80 फुट नीचे, उफनती नर्मदा।
एक मिनट। बस आधा फुट खिसकी।
दूसरा मिनट। एक फुट और।
लोहे की चरचराहट। पुल कराह रहा था।
यात्री कूदना चाहते थे, पर दरवाज़ा जाम। पीछे का शीशा टूटा, पर नीचे नदी।
कमला ताई चिल्लाईं, “महाकाल! बचा लो!”
अंजलि ने आरव को सीने से चिपका लिया।
शिवम, आयुष, मोहित, तीनों, एक साथ, “ॐ नमः शिवाय” बोलने लगे। काँपती आवाज़ में।
इस्माइल चाचा बोले, “अल्लाह के साथ महाकाल भी सुन लेगा। डरो मत बच्चों।”
साधु ने आँखें खोलीं। पहली बार।
वह उठा। बस के बीच में आया। बोला, सिर्फ एक वाक्य।
“आँखें बंद करो। नाम लो। काल आया है, पर महाकाल भी यहीं है।”
सबने आँखें बंद कर लीं।
बस एक और फुट खिसकी। अब पिछला टायर हवा में था। आगे के दो टायर ही पुल पर थे। बस का पिछला हिस्सा नदी के ऊपर झूल रहा था।
रघुवीर ने स्टीयरिंग छोड़ दिया। हाथ जोड़ लिए। “बाबा, 52 जानें हैं। मैं अकेला होता तो कूद जाता। इन्हें बचा लो।”
तभी हुआ।
अध्याय 2: महाकाल
एकदम सन्नाटा।
बारिश की आवाज़ बंद। नदी की गर्जना बंद। यात्रियों की चीख बंद।
जैसे समय रुक गया हो।
फिर एक आवाज़। भारी। गहरी। जैसे डमरू।
डम। डम। डम।
बस हिलनी बंद हो गई।
अंजलि ने आँखें खोलीं। चीख निकलते निकलते रह गई।
बस के पीछे, टूटे हुए पुल के नीचे, हवा में, एक आकृति।
नीला कंठ। जटा में गंगा। माथे पर चंद्र। हाथ में त्रिशूल। आँखें अग्नि सी। पर दृष्टि करुणा से भरी।
महाकाल।
उन्होंने त्रिशूल, बस के पिछले हिस्से के नीचे लगा रखा था। जैसे हथेली पर रोक रखा हो।
52 यात्री देख रहे थे। कोई बेहोश, कोई रो रहा, कोई हाथ जोड़े।
साधु मुस्कुरा रहा था। बोला, “कहा था न। काल आया है, पर महाकाल भी यहीं है।”
महाकाल ने एक बार देखा। सबकी ओर। हर एक की आँखों में।
फिर त्रिशूल उठाया। बस को धीरे से, आगे की ओर, पुल पर धकेल दिया।
बस के चारों पहिये, पक्की सड़क पर।
फिर एक गर्जना। “तथास्तु।”
और वह लुप्त।
बारिश फिर शुरू। नदी फिर गर्जी। यात्री फिर चीखे, पर इस बार बच जाने की चीख।
रघुवीर ने काँपते हाथों से गियर डाला। बस को, रेंगते हुए, पुल पार कराया।
पुल के उस पार पहुँचते ही, पीछे, धड़ाम।
पूरा स्लैब, नदी में।
अगर 30 सेकंड और लगते, तो बस नदी में होती।
बस रुकी। सब उतरे। बारिश में, कीचड़ में, नर्मदा किनारे, 52 लोग, दंडवत।
कमला ताई बोलीं, “देख लिया। महाकाल ने काल हर लिया।”
अंजलि का बेटा आरव बोला, “मम्मी, नीले वाले अंकल कहाँ गए? जिनके हाथ में चमक वाला चम्मच था?”
सब रो पड़े।
साधु कहीं नहीं था। बस में भी नहीं, घाट पर भी नहीं।
इस्माइल चाचा बोले, “वो ही तो थे। वही ले कर आए थे, वही बचा कर गए।”
उस दिन बस ओंकारेश्वर नहीं गई। वापस उज्जैन लौटी।
सब सीधे महाकाल मंदिर गए। भीगे हुए, नंगे पैर।
गर्भगृह में, शिवलिंग पर, ताज़ा बेलपत्र। गीले। नर्मदा के पानी की बूंदें।
जबकि उस दिन, मंदिर में नर्मदा जल चढ़ाना बंद था। सावन की भीड़ के कारण।
पुजारी बोले, “यह बेलपत्र हमने नहीं चढ़ाया।”
रघुवीर ने शिवलिंग को देखा। आँखों में आँसू। बोला, “बाबा, थैंक यू।”
शिवलिंग से, हल्की सी डमरू की आवाज़ आई।
डम। डम।
सिर्फ रघुवीर को सुनाई दी।
अध्याय 3: काल हरा
उस घटना को एक साल हो गया।
बस नंबर MP 13 P 2247 अब नहीं चलती। रघुवीर ने उसे मंदिर के पास खड़ा कर दिया है। लोग आते हैं, माथा टेकते हैं।
उस बस के 52 यात्री, हर सावन के पहले सोमवार को, ओंकारेश्वर नहीं, हंडिया पुल जाते हैं। वहाँ दिया जलाते हैं। नर्मदा को प्रणाम करते हैं।
कमला ताई कहती हैं, “काल तो सबका आता है। पर अगर मन में महाकाल हो, तो काल भी प्रणाम कर के लौट जाता है।”
अंजलि का बेटा आरव अब 5 साल का है। वह कहता है, “नीले अंकल मेरे सपने में आते हैं। कहते हैं, डरना मत।”
शिवम, आयुष, मोहित, तीनों ने कावड़ यात्रा कभी नहीं छोड़ी। हर साल, पैदल।
इस्माइल चाचा अब भी भंडारा लगाते हैं। बोर्ड पर लिखवाया है, “महाकाल का भंडारा, सबके लिए।”
रघुवीर अब भी बस चलाता है। नई बस। डैशबोर्ड पर वही शिवलिंग। पर अब वह चलने से पहले, सवारियों से कहता है।
“आँखें बंद करो। एक बार नाम लो। ॐ नमः शिवाय।”
सब लेते हैं। हँसते हुए, मानते हुए।
क्योंकि उस दिन, 52 लोगों ने देख लिया था।
काल आता है। पर अगर भक्त पुकारे, तो महाकाल पहले आता है।
काल हरने।





