बहुत ही विचारणीय प्रश्न…
हम सभी अपने-अपने धर्म, संस्कृति और परंपराओं से भावनात्मक रूप से जुड़े हुए हैं। हमारे धार्मिक और पारिवारिक आयोजन केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और संस्कारों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का अवसर भी होते हैं।
आज हमें स्वयं से एक प्रश्न पूछने की आवश्यकता है—क्या हमारे धार्मिक एवं पारिवारिक आयोजनों का स्वरूप हमारी अपनी संस्कृति और परंपराओं के अनुरूप है?
दुर्भाग्य से कई बार धार्मिक आयोजनों, विवाह समारोहों और त्योहारों में अत्यधिक तेज डीजे, अश्लील या फूहड़ गीत, नशे और असंयमित नृत्य को उत्सव का हिस्सा बना दिया जाता है। जिस अवसर पर भक्ति, संस्कार और पारिवारिक एकता दिखाई देनी चाहिए, वहां कई बार दिखावा और फूहड़ मनोरंजन हावी हो जाता है।
हमारे त्योहार उत्साह और उमंग के साथ अवश्य मनाए जाने चाहिए, लेकिन उनकी अपनी सांस्कृतिक पहचान भी दिखाई देनी चाहिए।
क्यों न डीजे के फूहड़ गीतों के स्थान पर भक्ति गीत, भजन, हरि धुन, श्लोक, संस्कृत स्तोत्र और पारंपरिक संगीत को प्राथमिकता दी जाए?
क्यों न विवाह और पारिवारिक समारोहों में जस मंडली, भजन मंडली, फाग मंडली, महिला मंडली, लोक कलाकारों और पारंपरिक वाद्य यंत्र बजाने वाले कलाकारों को आमंत्रित किया जाए?
ढोल, मंजीरे और अन्य पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुनों के साथ पारंपरिक परिधान और लोक संस्कृति को उत्सवों का हिस्सा बनाया जाए। इससे समारोह भी आनंदमय रहेगा और हमारी सांस्कृतिक विरासत भी जीवंत रहेगी।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम आधुनिक शिक्षा और आधुनिक जीवनशैली को अपनाते हुए भी अपने बच्चों को परिवार, संस्कार, संस्कृति, परंपरा और अपनी जड़ों से जोड़कर रखें।
आधुनिकता का अर्थ अपनी संस्कृति को भूल जाना नहीं है। समय के साथ आगे बढ़ते हुए अपनी पहचान को सुरक्षित रखना भी हमारी जिम्मेदारी है।
आने वाले नवरात्रि, गणेशोत्सव, दशहरा और अन्य त्योहारों में हम संकल्प लें कि उत्सव को केवल शोर और दिखावे तक सीमित नहीं रखेंगे, बल्कि उसमें भक्ति, संस्कृति, अनुशासन और पारिवारिक मूल्यों को भी स्थान देंगे।
हमारे सामाजिक संगठन, परिवार और समाज के जिम्मेदार लोग भी सकारात्मक तरीके से लोगों को प्रेरित कर सकते हैं कि धार्मिक एवं पारिवारिक आयोजनों में मर्यादा और सांस्कृतिक गरिमा बनी रहे।
हमारी संस्कृति तभी जीवित रहेगी, जब हम उसे केवल किताबों में नहीं, बल्कि अपने जीवन और उत्सवों में भी स्थान देंगे।
आइए, अपने बच्चों को आधुनिकता के साथ अपनी जड़ों की पहचान भी दें।
अपनी संस्कृति का सम्मान करें, अपनी परंपराओं को जीवित रखें और आने वाली पीढ़ी तक अपने संस्कार पहुंचाएं।
आप स्वयं विचार करें और दूसरों को भी विचार करने के लिए प्रेरित करें।
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