बीजेपी का अध्यक्ष होना मतलब लिखित रूप से भारत का सबसे शक्तिशाली गैर संवैधानिक पद और मौखिक रूप से संघ प्रमुख के बाद दूसरा। नीतिन नबीन सिन्हा का अध्यक्ष बनना इसलिए भी खास है कि 1966 के बाद ये पहले बीजेपी प्रमुख है जो सीधे RSS से नहीं आते।
ये जरूरी भी नहीं है क्योंकि…
1951 मे बीजेपी की स्थापना हुई थी तब इसका नाम जनसंघ था, उस समय यह निर्धारित हुआ था कि अध्यक्ष कोई भी बने लेकिन सचिव RSS से ही होगा। लेकिन आगे चलकर 1966 मे ये रीत बदल गयी और RSS के पंडित दीनदयाल उपाध्याय बीजेपी के अध्यक्ष बने। तब से जेपी नड्डा तक जितने भी अध्यक्ष आये वे सभी RSS की शाखाओ के स्वयंसेवक रहे थे।
1980 मे अब जनसंघ को बीजेपी के नाम से स्थापित किया गया तो उस समय के लोग जानते होंगे जैसे आज कमल के फूल के दाए और बाये मुखर्जी और उपाध्याय की तस्वीर लगी होती है वैसे ही तब इसमें जेपी नारायण की भी फोटो होती थी जो कि हिंदूवादी तो नहीं थे।
ये वाजपेयी की जबरदस्ती थी जिसे आडवाणी के अध्यक्ष बनते ही हटा दिया गया। RSS के स्वयंसेवक इतने अधिक सतर्क थे लेकिन आज 2025 मे नीतिन नबीन को अध्यक्ष बनाना खुद RSS के ही प्रस्ताव से स्वीकृत हुआ।
संभव है कि 1940-50 के दशक मे जन्मे ज्यादातर संघियों के पास RSS और जनसंघ के अतिरिक्त ज्यादा विकल्प नहीं थे लेकिन उसके बाद जो आये उन्हे अपनी युवावस्था मे VHP, ABVP और किसान संघ जैसी ईकाई मिलती गयी। जो व्यक्ति RSS की शाखा मे नहीं गया लेकिन यदि उसकी पढ़ाई सरस्वती शिशु मंदिर मे हुई हो तो वह भी तो कही ना कही विचारधारा से संघी हुआ।
अब संघी कहलाने के लिए RSS की शाखा मे होना अनिवार्य नहीं है क्योंकि RSS संगठन से कही अधिक एक विचार है। ज्योतिरादित्य सिंधिया ज़ब कांग्रेस मे थे तो हिन्दू विरोध पर मौन समर्थन देते थे मगर ज़ब से बीजेपी मे आये वो मराठा बन गए है और महादजी सिंधिया तथा दत्ताजी सिंधिया जैसे हिन्दू शिरोमणियों को सिर पर धारण करने लगे है।
यही बात हिमांता बिश्वशर्मा के लिए है, ये RSS का विस्तार है जिसके आप साक्षी बन रहे है। RSS ने कड़ी मेहनत से अब शहर के पार्को से बाहर निकलकर अपनी विचारधारा जमा ली है। नीतिन नबीन का बीजेपी अध्यक्ष बनना RSS की एक बहुत बड़ी सफलता है।
अब समय आ भी गया है कि देश के इतिहास को फिर से लिखा जाए, 1990 तक 2% की हिन्दू प्रतिशत की ग्रोथ से बढ़ने वाला भारत ज़ब हिंदुत्व को अपनाता है तो 8% से बढ़ने लगता है। 1947 के बाद इतिहास को पुनः समीक्षा की आवश्यकता है, सरकार ने ये काम बहुत अच्छा किया कि कई नाम बदले।
PMO का नाम सेवातीर्थ हुआ और रेस कोर्स रोड का लोक कल्याण मार्ग, ज्ञातव्य हो क़ुतुबमीनार का भी असली नाम विष्णु स्तम्भ है जो कि एक दिगम्बर जैन मंदिर का हिस्सा है। लेकिन इतिहास को लिखा ऐसे गया कि कांग्रेस यदि 5 साल और टिक जाती तो शायद बच्चे ये पढ़ते कि भारत की स्थापना ही क़ुतुबद्दीन ऐबक ने की थी।
सारा खेल नैरेटिव का है, ऐसे मे कोई बुराई नहीं है कि बीजेपी या RSS भी अपना नैरेटिव चलाये, कांग्रेस ने मुस्लिम आक्रांताओ को महिमामंडित किया बीजेपी यदि उसी को पलट रही है तो क्या गलत है? ये बात सही है कि इससे RSS की ही विचारधारा का विस्तार होगा, हो सकता है आने वाली पीढ़ी इतनी ज्यादा कट्टर हिन्दू हो जाये कि वह RSS को सॉफ्ट समझें।
लेकिन 2025 की स्थिति के अनुसार तो यही सही है कि RSS इसी तरह अपने विचार फैलाती रहे, अब तो ईश्वर कृपा से सत्ता भी हाथ मे है।
✍️ साभार परख सक्सेना जी✍️






