ग्राहक दिवस : मुंडन महोत्सव की शुभकामनाएँ!
आज राष्ट्रीय ग्राहक दिवस है। ठीक आज ही के दिन, 1986 में संसद ने एक कानून बनाया था—काग़ज़ पर ग्राहक को राजा घोषित करने के लिए। व्यवहार में यह राजा वही है, जिसे रोज़ बाज़ार के चौक पर खड़ा कर नियमित रूप से मुंडा जाता है, और वह भी पूरे सम्मान के साथ।
आज ग्राहक को हर जगह विशेष सुविधा मिली हुई है—
दूध मिले तो सिंथेटिक,
घी मिले तो संदेहास्पद,
दवा मिले तो एक्सपायरी के आसपास,
और शुद्धता मिले तो केवल विज्ञापन में।
सुप्रीम कोर्ट भी सिंथेटिक दूध पर चिंता जता चुका है, पर राहत की बात यह है कि मिलावटखोर बिल्कुल निश्चिंत हैं। उन्हें पता है—ग्राहक शिकायत करेगा तो फॉर्म भरेगा, तारीख लेगा, और अंततः चाय पीकर घर लौट आएगा। न्याय का स्वाद भी शायद मिलावटी ही होगा।
खाद्य पदार्थों में अकार्बनिक रसायनों की भरमार ने ज़िंदगी को रोमांचक बना दिया है—अब हर निवाला रिस्क फैक्टर के साथ आता है। किसान के लिए नकली बीज, नकली खाद और नकली पेस्टीसाइड उपलब्ध हैं, ताकि वह पहले कर्ज़ में जाए और फिर आँकड़ों में समा जाए। उधर शहर का ग्राहक सोचता है—आज पेट में दर्द क्यों है, और डॉक्टर सोचता है—आज फीस कितनी बढ़ाई जाए।
दवा और पढ़ाई इतनी महँगी हो चुकी हैं कि बीमार होने से पहले आदमी दस बार सोचता है—“रहने दो, शायद ठीक हो जाए।” और बच्चा पढ़ने से पहले पूछता है—“पापा, लोन मिलेगा या सपना बदल लें?”
ग्राहक आज अभिमन्यु है—चक्रव्यूह में घुसना उसे आता है, निकलना कोई नहीं सिखाता। और लूटने वाले कौरव पूरी रणनीति, नेटवर्क के साथ मैदान में हैं।
फिर भी आशा की एक किरण है। कहा जाता है कि जागरूक और संगठित ग्राहक बदलाव ला सकता है। बिल्कुल ला सकता है—
बशर्ते ग्राहक पहले जाग जाए,
फिर बोले,
और अंत में डरे नहीं।
क्योंकि अंतिम सत्य यही है—
ग्राहक, तू रहेगा मौन, तो तेरी सुनेगा कौन?






