ब्राह्मण कायस्थों के घर पानी क्यों नहीं पीते हैं
कल एक कायस्थ समूह मे एक सम्मानीय कायस्थ ने तन्ज या उलाहना या कायस्थों को नीचा बताने के लिए (ब्राह्मणों की नजरो) ये कहा कि ब्राह्मण कायस्थ के घर का पानी भी नहीं पीते हैं
आज हम ये जानकारी देगे कि ब्राह्मण कायस्थों के घर पानी क्यों नहीं पीते हैं.
हमारी भारतीय सनातन संस्कृति, सभ्यता और संस्कृति मे एक रीति है कि हम अपनी कन्या के घर का पानी भी नहीं पीते हैं और कन्या के घर को छोड़िए हम उस गाँव के किसी भी घर में पानी नहीं पीते हैं, और ये परंपरा आज भी गांवों में है,
धीरे धीरे ये परंपराएं खत्म हो रही है, शहरो मे दम तोड़ चुकी है लेकिन गावों में जिंदा है..
अगर किसी ने भी कन्या के घर कुछ भी खाया पिया होता था तब उसके पैसे देते थे (शगुन के रूप में)
अक्सर आप सभी ने देखा होगा कि जब कोई बेटी अपने मायके आती थी या आती है और जब बेटी अपने मायके से विदा लेती है और विदा के समय जब वो रोती है तब बेटी की भतीजी या छोटी बहन उसको पानी पीने को देते हैं और बेटी पानी पीने के बाद उस पानी के गिलास में कुछ पैसे जरूर डालती है इसका मुख्य कारण है कि भतीजी या छोटी बहन दोनों ही उस शादीशुदा के लिए बेटी के समान होती है और बेटी के घर या हाथ का पानी नहीं पीते हैं
जब तक बेटी मायके में कुछ भी खाती पीती है तब वो अपने पिता का दिया हुआ खाती है लेकिन जब विदा होती है तब जो पानी छोटी बहन या भतीजी के द्वारा दिया गया होता है वो बेटी के द्वारा दिया हुआ पानी माना जाता है
हम सभी कायस्थ भगवान चित्रगुप्त जी के वंशज है, सभी जानते हैं कि चित्रगुप्त जी की दो धर्म पत्नियाँ है जिनमे से एक ब्राह्मण कन्या है (सूर्य दक्षिणा या नंदिनी) इसी वजह से ब्राह्मण कायस्थों के घर का पानी ,भोजन नही करते हैं क्योंकि पुत्री के घर का खाना पीना सनातन समाज में कोई नही खाता।
हम लोग तो शादी की रस्म के बाद उस ब्राह्मण के पांव भी नही छूते जो हमारी शादी करवाता है
असली वेदों को जानने वाला ज्ञानी ब्राह्मण कायस्थों को अपने पांव भी छूने भी नही देते हैं, कायस्थों के घर ब्राह्मणों के द्वारा पानी न पीना कोई छुआछूत नहीं है बल्कि उनको मालूम है कि कायस्थ एक तरह से उनके पूजनीय और माननीय है (चित्रगुप्त जी उनके दामाद है)
हम सभी सनातन धर्म में एक परंपरा और है कि जब कोई शादी शुदा बेटी(हमारी बेटी या दूसरे की बेटी) हमारे घर आती है तब हम (बेटी की माँ, भाभी या पिता) बेटी की गोद डालते हैं (हमारे यहां बहू की गोद भी डालते हैं) कभी सोचा है कि बेटी की गोद क्यो डालते हैं
बेटी की गोद में पांच चीजे डाली जाती है चावल, मूंग दाल, हल्दी की गाँठ, मिठाई और रोली या सिंदूर,
चावल इसलिए डालते हैं क्योंकि हम लोग बेटी के घर का कुछ भी नहीं खाते हैं इसलिए पहले से ही हम चावल दे देते शगुन के रूप में कि हमने अपने खाने का अनाज दे दिया है दूसरा चावल को शिव रूप भी माना गया है और शांति का प्रतीक भी.. मतलब ससुराल में शांति बनाकर रखना चाहिए
हल्दी डालने का मतलब है कि बेटी और बेटी का घर निरोगी रहे, मिठाई डालने का अर्थ है कि बेटी की वाणी हमेशा मीठी रहे जिससे ससुराल में सभी को जीत सके..
मूंग दाल हरी होती है और इसका मतलब है कि बेटी की गोद और घर हमेशा हरा भरा रहे
रोली इसलिए डालते हैं कि बेटी का सिंदूर (सुहाग) हमेशा बना रहे और लाल रंग की तरह हमेशा दमकती रहे चहकती रहे
मुझे पूर्ण विश्वास है कि आप सभी की ये आशंका दूर हो गई होगी कि ब्राह्मण कायस्थों के घर पानी क्यों नहीं पीते हैं
आधुनिक युग मे अब परंपराएं दम तोड़ रही है
जय श्री चित्रगुप्त जी भगवान की
आप सभी बड़ो से आशीर्वाद चाहिए और छोटे नटखट लोगों से प्यार
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