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बीजेपी ने संगठन में फेरबदल कर लिया, अब निगाहें संघ की ओर हैं।

औपचारिक रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ खुद को गैर-राजनीतिक संगठन बताता है, लेकिन व्यवहारिक सच्चाई इससे अलग नजर आती है। भाजपा के गठन से लेकर आज तक प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री और राज्यों के बड़े संगठनात्मक पदों पर वही चेहरे आगे बढ़ते दिखे हैं, जिनकी पृष्ठभूमि संघ से जुड़ी रही हो। यहां तक कि दूसरे दलों से आए नेताओं को भी तब ही बड़ा अवसर मिला, जब उनका संघ से सामंजस्य बैठा। असम के वर्तमान मुख्यमंत्री इसका उदाहरण माने जाते हैं, जो कांग्रेस छोड़ते ही सीधे शीर्ष पद तक पहुंचे।
इसी पृष्ठभूमि में भाजपा ने आगामी विधानसभा चुनावों से पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष के चयन को लेकर एक अलग ही रास्ता चुना। सीधे चुनाव कराने के बजाय कार्यकारी अध्यक्ष की व्यवस्था की गई और नितिन नवीन को यह जिम्मेदारी सौंपी गई। जबकि जेपी नड्डा के मंत्री बनने के बाद ही ‘एक व्यक्ति-एक पद’ को लेकर नए अध्यक्ष की अटकलें तेज हो गई थीं, जो अंततः मीडिया की कल्पना बनकर रह गईं।

दिल्ली, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, महाराष्ट्र और बिहार जैसे राज्यों के चुनावों से पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष पद को लेकर कई नाम हवा में तैरते रहे, लेकिन वे केवल सुर्खियों तक सीमित रहे। चुनावों में मिली उल्लेखनीय सफलता के बाद भाजपा नेतृत्व ने किसी भी तरह के असमंजस को खत्म करते हुए कार्यकारी अध्यक्ष की नियुक्ति कर दी और बहस पर विराम लगा दिया।
लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश से मिले झटके के बाद भाजपा नेतृत्व ने संकेत दिए थे कि प्रदेश संगठन में बदलाव होगा। प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी और संगठन महामंत्री धर्मपाल सिंह ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पद छोड़ने की इच्छा जताई, लेकिन उस समय नेतृत्व ने त्यागपत्र स्वीकार नहीं किया। फैसला टाल दिया गया, समय को ही जवाब देने दिया गया।
इसके बाद यूपी प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव की पूरी प्रक्रिया एक औपचारिकता बनकर रह गई। महाराजगंज से सांसद और केंद्र में राज्यमंत्री पंकज चौधरी को लखनऊ बुलाकर नामांकन कराया गया। उनके मुकाबले किसी अन्य नाम को आगे आने ही नहीं दिया गया। चुनाव हुआ जरूर, लेकिन प्रतिस्पर्धा के बिना। यह संगठनात्मक लोकतंत्र से ज्यादा प्रबंधकीय निर्णय जैसा दिखा।

इस तरह भाजपा ने अपने संगठनात्मक ढांचे में बदलाव की प्रक्रिया पूरी कर ली। अब सवाल संघ के भीतर बदलाव का है। संघ को भी आत्ममंथन करना होगा कि क्या वर्षों से एक ही क्षेत्र में जमे कुछ प्रचारक अपने मूल उद्देश्य से भटक तो नहीं गए हैं। प्रांत, क्षेत्र और जिला स्तर पर बैठे कुछ पदाधिकारी संगठन विस्तार से ज्यादा अपनी व्यक्तिगत पकड़ मजबूत करने में लगे हुए प्रतीत होते हैं।

संघ का मूल दर्शन सेवा, त्याग और संगठन निर्माण रहा है। नानाजी देशमुख और रज्जू भैया जैसे नाम इसकी मिसाल हैं। लेकिन आज स्थिति यह है कि कुछ प्रचारकों के बारे में आम फीडबैक यही है कि वे सत्ता के इतने नजदीक आ चुके हैं कि दूरी का भाव ही खत्म हो गया है।

संघ को चाहिए कि ऐसे वरिष्ठ क्षेत्र प्रचारकों को केरल और तमिलनाडु जैसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में कार्य करने का अवसर दे, जहां संगठन विस्तार की वास्तविक जरूरत है। उत्तर प्रदेश जैसे अपेक्षाकृत मजबूत क्षेत्रों में लंबे समय से जमे रहना न संगठन के लिए हितकारी है और न ही विचार के लिए।
अगर संघ उत्तर प्रदेश में ईमानदार फीडबैक प्रणाली लागू करे, तो परिणाम चौंकाने वाले हो सकते हैं। क्योंकि जिस शुचिता और अनुशासन की अपेक्षा समाज से की जाती है, वही कसौटी संगठन के भीतर भी लागू होनी चाहिए।

संघ को भी यह स्वीकार करना होगा कि समय के साथ-साथ भीतर सफाई जरूरी है। जहां लंबे समय तक बदलाव नहीं होता, वहां जड़ता आती है। जब तक अंदरूनी ढांचे को साफ नहीं किया जाएगा, तब तक असहजता बनी रहेगी। संगठन का उद्देश्य सेवा है, न कि टिकटार्थियों के इर्द-गिर्द दरबारदारी।
भाजपा की तरह संघ को भी आत्मसुधार की प्रक्रिया से गुजरना चाहिए। क्योंकि विचारधारा तभी मजबूत रहती है, जब संगठन भीतर से स्वच्छ और पारदर्शी हो।

साभार : भाई शरद राय जी की वाल से

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Author: sssrknews

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