रात मैं पत्नी के साथ होटल में रुका था। सुबह दस बजे मैं नीचे नाश्ता करने गया। लेकिन जैसे ही रेस्टोरेंट के काँच के दरवाज़े पर पहुँचा, मेरी नज़र होटल के रिसेप्शन पर खड़े दो पुलिसवालों पर पड़ी। वे किसी का नाम पूछ रहे थे—कमरा 209… वही कमरा, जिसमें हम दोनों ठहरे थे।
एक पल को लगा जैसे मेरा दिल किसी ने मुट्ठी में कस लिया हो।
मैंने आगे बढ़कर सुनना चाहा, पर तभी एक होटल स्टाफ ने मुझे रोकते हुए कहा—
“सर, कृपया इधर से आइए…”
उसकी आवाज़ में अजीब-सी घबराहट थी।
मुझे कुछ समझ नहीं आया, पर मन में एक ही सवाल था—मेरी पत्नी? क्या हुआ उसे?
मैं दौड़कर लिफ्ट की ओर बढ़ा और अंदर घुसते ही उँगलियाँ काँपते हुए 2nd फ्लोर का बटन दबा दिया। लिफ्ट के शीशे में अपना चेहरा देखा—पसीने की बूंदें जिद की तरह जकड़ी हुई थीं।
जैसे-जैसे लिफ्ट ऊपर जा रही थी, एक अनजाना डर दिल को भारी करता जा रहा था।
दस मिनट पहले…
रात काफी देर तक हम बातें करते रहे थे। वह हमेशा की तरह मुस्कुरा रही थी, लेकिन उसकी आँखों में कुछ अनकहा था, जो वह बोलना चाहती लेकिन बोल नहीं पा रही थी।
कितनी बार पूछा—
“सब ठीक है, न?”
वह बस इतना कहती—
“हाँ, तुम हो न… सब ठीक है।”
सवेरे जब मैं नाश्ते के लिए निकला तो वह अभी सो रही थी। मैंने उसे कंबल ठीक से ओढ़ाया और धीरे से दरवाज़ा बंद कर दिया।
मुझे क्या पता था कि बस यही मेरा आखिरी स्पर्श होगा…
लिफ्ट खुलते ही मेरे कदम लड़खड़ाए
कमरा 209 के बाहर तीन लोग खड़े थे—एक डॉक्टर, एक होटल मैनेजर और एक पुलिस अधिकारी।
उनके चेहरे पर उतनी ही गंभीरता थी जितनी मेरे अंदर बेचैनी।
मैं उनके पास पहुँचा और आवाज़ गले में अटकते-अटकते निकली—
“मेरी… मेरी पत्नी कहाँ है?”
पुलिसवाले ने मेरी ओर देखा, जैसे कोई कठोर सच्चाई बताने की हिम्मत जुटा रहा हो।
“सर… अंदर आइए।”
कमरे का दरवाज़ा खुला।
मैं अंदर गया और मेरा पूरा शरीर जैसे किसी ने सुन्न कर दिया।
मेरी पत्नी बिस्तर पर पड़ी थी, बिल्कुल शांत… जैसे सो रही हो…
लेकिन उसकी साँसें नहीं चल रही थीं।
डॉक्टर ने धीरे से कहा—
“हमें अफसोस है… इन्हें कार्डियक अरेस्ट हुआ था। जब स्टाफ ऊपर आया, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।”
मैं वहीं ज़मीन पर बैठ गया।
मेरे हाथ काँप रहे थे।
मेरी आँखें सूख चुकी थीं, फिर भी उनमें से आँसू फूटते गए।
पर सस्पेंस यहीं खत्म नहीं होता…
मैंने अपनी पत्नी को कभी हार्ट की कोई समस्या बताई नहीं सुनी।
वह बिल्कुल स्वस्थ थी।
फिर यह सब अचानक कैसे?
मैंने पुलिस से पूछा, “यह कैसे हुआ? क्यों हुआ?”
उसने कमरे की ओर इशारा किया—
“लगता है आपकी पत्नी रात में काफी देर तक जागी थीं… शायद किसी बात का तनाव था। उन्होंने होटल की डायरी में कुछ लिखा भी है…”
“डायरी?”
मेरी साँसें जैसे उलझ गईं।
पुलिसवाले ने एक छोटी-सी नोटबुक मेरी तरफ बढ़ाई।
मैंने उसे खोला।
पहला पन्ना खाली था।
दूसरा भी।
पर तीसरे पन्ने पर उसने कुछ लिखा था—धीरे-धीरे, हिचक-हिचककर…
“शायद यह मेरी आखिरी रात है…”
“मैं तुमसे बहुत कुछ कहना चाहती थी…”
“मेरी हालत को मैं कई महीनों से छुपा रही थी…”
मैंने पढ़कर पन्ना पकड़ते-पकड़ते गिरा दिया।
क्या?
उसने मुझसे कुछ छुपाया था?
डायरी आगे सच बयां करती गई…
“डॉक्टर ने कहा था कि मेरा दिल बहुत कमजोर है… कभी भी रुक सकता है।”
“मैं चाहती थी तुम्हें न बताऊँ… क्योंकि तुम्हें देखकर मुझे जीने का हौसला मिलता था।”
“मैं नहीं चाहती थी कि तुम मेरी बीमारी के बोझ में दब जाओ।”
मेरी आँखें धुँधली हो गईं।
मैं पन्ना बदल भी नहीं पा रहा था।
लेकिन अगले शब्दों ने मुझे तोड़ दिया—
“कल रात तुमने मुझसे पूछा था कि ‘सब ठीक है न?’
मैं झूठ बोली थी।”
मुझे लगा जैसे कमरे की सारी हवा गायब हो गई।
सबसे आखिरी पन्ना… सबसे बड़ा झटका
मैंने काँपते हुए आखिरी पन्ना खोला—
“अगर सुबह मेरी आँख न खुले, तो कृपया मुझे दोष मत देना।”
“मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जाना चाहती, पर मेरी साँसें मेरे बस में नहीं हैं।”
“बस एक वादा—जिस प्यार से तुमने मुझे जिया है, उसी प्यार को अपने अंदर जिंदा रखना।”
“तुम टूटना मत… क्योंकि मैं तुमसे दूर नहीं जा रही… मैं बस दिख नहीं पाऊँगी।”
मेरा पूरा वजूद जैसे बिखर गया।
मैं बिस्तर के पास बैठ गया, उसके ठंडे हाथ पकड़कर रोता रहा।
कितना कुछ उसने अकेले सहा…
कितना कुछ छुपाया…
और मैं कुछ जान भी नहीं पाया।
पुलिस ने कागज़ात पूरे किए और सब चले गए
कमरा खाली हो गया।
सिर्फ मैं और वह…
और वह डायरी…
मैंने सिर झुकाकर उसके माथे पर हाथ फेरा।
फिर याद आया—
मैं सुबह जल्दी-जल्दी निकल आया था, उसे देख भी नहीं पाया था ठीक से।
अगर पाँच मिनट और रुक जाता?
अगर उसे जगा देता?
अगर उसके पास ही रहता?
क्या वह बच जाती?
ये सवाल हमेशा मेरे साथ रहेंगे…
अंतिम दृश्य — प्यार का मौन वादा
अगले दिन जब मैं उसकी अंतिम यात्रा के लिए सब तैयार कर रहा था, तो उसकी डायरी का आखिरी संदेश पढ़ते-पढ़ते मेरी रूह कांप उठी—
“????जब भी अकेलापन लगे, उस सुबह को याद कर लेना जब तुमने मेरा कंबल ठीक किया था।
वो एहसास मैं लेकर जा रही हूँ।
मुझे वहीं मिलना… किसी दूसरी दुनिया में… वही स्पर्श लिए हुए।”
मेरी आँखों से आँसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे।
मैंने डायरी सीने से लगाई और आसमान की ओर देखा—
“तुम कहीं नहीं गई… तुम यहीं हो। बस मैं तुम्हें देख नहीं पा रहा।”
होटल का कमरा, वह बिखरी-सी चादर, और उसका आखिरी लिखा शब्द…
सब मेरे अंदर हमेशा के लिए बंद हो गए????????????????????






