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रोहिंग्या संकट पर एक विवादित दृष्टिकोण: बर्मा, बौद्ध और हिंसा की पृष्ठभूमि

दुनिया का हर मुसलमान दूसरे मुसलमान के बारे में भरपूर जानकारी रखता है। अरब का शेख भारत और पाकिस्तान के मुसलमान को नकली और घटिया मानता हैं। ईरान का शिया जानता है कि एशिया के सुन्नी मुसलमान उन्हें मिटाने के लिए वेचैन हैं। फिर रोहिंग्याओं के घटियापन को कौन मुस्लिम देश बर्दास्त करेगा?

वास्तव में बर्मा के मामले में रोहिंग्या मुसलमानों का गणित धोखा दे गया। बर्मा में ये सुनियोजित तरीके से हत्यायें कर रहे थे। अकेले किसी बौद्ध को देखकर चुपके से आक्रमण कर मारकर जमीन में गाड़ देना। अकेले को मारने का लाभ ये मिलता था कि कोई गवाह होता ही नहीं था, कानून सजा किसको देगा? इन लोगों की सोच ये थी कि जिस तरह भारत सरकार कश्मीरी या बांग्लादेशी मुल्लों के आतंकवाद पर असली अपराधी को खोजने निकल पड़ती है, वैसा ही कुछ इनके साथ भी होगा। जिस तरह भारत सरकार अपराधियों के खिलाफ सबूत जुटाती है, अदालत में पेश करती है और पुख्ता सबूत के अभाव में इनके मुस्लिम भाईजान बाइज्जत बरी हो जाते हैं, वैसा ही कुछ बौद्ध भी करेंगे और इस तरह एक दिन पूरे बर्मा के बौद्धों को मारकर ऐश करेंगे। बर्मा पर एक दिन इस्लाम का झंडा लहरायेगा।

इन रोहिंग्याओं से बौद्धों की मानसिकता पढ़ने में भारी गलती हुई। बौद्ध अपराधियों को खोजने के चक्कर में पड़े ही नहीं। सेना के लोग और बौद्धों ने स्वयं हथियार उठाकर इनका सामूहिक नरसंहार प्रारम्भ कर दिया और ऐसी मार लगाई कि सीमा पार भागकर ही रोहिंग्याओं की जान बची। अगर रोहिंग्याओं को जरा भी अंदेशा होता कि बौद्ध इतना खतरनाक स्टेप ले सकते हैं तो वो सपने में भी ऐसा न करते। महात्मा बुद्ध ने बौद्धों को शांति का पाठ जरूर पढ़ाया लेकिन कायरता कभी नही सिखाई।

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Author: sssrknews

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