मुझे 10 दिन के लिए राम चाहिए दशरथ और कुछ भी नही… विश्वामित्र ने कहा… और तुम्हे यह भी कह दूं, मैं तुम्हारे राम के माध्यम से विश्वयुद्ध ही नही ब्रह्मण्ड युद्ध छेड़ने जा रहा हूँ… यह ताड़का का वध करने निकल रहा है…
ताड़का में 1000 हाथियों का बल है, इसी ताड़का ने मारीच नाम के प्रसिद्ध दुर्जय योद्धा को जन्म दिया है, जो अगत्स्य ऋषि के श्राप के कारण राक्षस धर्म मे परिवर्तित हो चुका है। महर्षि अगत्स्य ने ताड़का के पति श्रीसुन्द को मार डाला, क्रोधित होकर देवपुत्र मारीच नव अगत्स्य ऋषि पर आक्रमण किया, अगत्स्य ऋषि में श्राप देकर कहा, तू राक्षस बन जा… साथ ही ताड़का को भी श्राप दिया, कि तू नरभक्षिणी हो जा…
इसी कारण यह दोनो मा बेटे अब ओर अधिक दुर्जय हो गए है, ऋषि अगत्स्य जहां जहां रहते है, यह उस प्रत्येक स्थान को उजाड़ देते है। ब्राह्मणो का हित चाहने वाले राजा दशरथ… इसी ताड़का के वध के लिए मैं राम को लेने आया हूँ… वरना वह नरभक्षिणी पूरी पृथ्वी को निगल जाएगी…
दसरथ एकदम सन्नाटा खा गए!! राम?? ताड़का तो रावण की सहयोगी है, ताड़का वध का सीधा अर्थ है रावण को भी चुनोती??
मेरा 25 वर्ष का राम राक्षसो से लड़ने जायेगा? इन राक्षसो से लड़ने का साहस आज मैं भी नही जुटा पाता, मेरा कोमल सा राम कैसे लड़ेगा?
और सहसा दशरथ को लगा कि वे अपने प्रति ही अपरिचित होते जा रहे हैं। इस दशरथ को उन्होंने पहले तो कभी नहीं देखा, जिसे राम के प्रति इतना मोह हो। राम के प्रति मोह, कौशल्या के बेटे के प्रति।
उसके बेटे राम के प्रति इतना मोह! इस मोह को उन्होंने पहले तो कभी नहीं जाना।… पर अब वे साफ साफ देख रहे थे, राम कौशल्या का ही पुत्र नहीं था, राम उनका अपना बेटा था।
वरन् राम के रूप में वे स्वयं ही युवावस्था की ओर बढ़ रहे थे।… अपनी आरंभिक युवावस्था में दशरथ का भी कुछ ऐसा ही रूप था। लगभग इतनी ही लंबाई। ऐसे ही चौड़े, भरे हुए कंधे। ऐसा ही स्फीत, बलशाली वक्ष। ऐसी ही तीखी नाक और बड़ी बड़ी गुलाबी आँखें। हाँ, दशरथ का वर्ण ऐसा श्यामल नहीं था, यह राम को कौशल्या से मिला था। और दशरथ में ऐसा कठिन आत्मविश्वास भी नहीं था, जैसा राम में है… राम को देखकर, उन्हें कहीं लगता कि वे क्षीण, दुर्बल और वृद्ध हो रहे हैं।
दशरथ को लगता है कि राम के रूप में वे स्वयं प्रशासन की देखभाल कर रहे हैं। राम, दशरथ के व्यक्तित्व के अंतरंग तत्त्व हो गए हैं…। दशरथ की आँखें डबडबा आईं। अत्यंत दीन स्वर में बोले, “ऋषिवर! जिस रावण से मैं जीवन भर डरता रहा, जिसके भय से मैंने रघुवंश की पराजय के प्रतिशोध की बात कभी नहीं सोची, उसके विरुद्ध मैं अपने पुत्र को कैसे भेज दूं? मेरा राम अभी कुल पचीस वर्षों का है। मैं तो उसके विवाह की बात सोच…”
विश्वामित्र ने बात पूरी नहीं होने दी, “दशरथ! आर्य सम्राट् अब क्या छोटी बालिकाओं के समान गुड्डे गुड़िया का ही खेल खेलते रहेंगे! उनकी महत्त्वाकांक्षाएँ पुत्र उत्पन्न कर उनके विवाहों तक ही रह जाएँगी! इस आर्यावर्त के भविष्य के विषय में सोचने का दायित्व किसे सौंप दिया है तुम लोगों ने…!”
दशरथ की आँखों से दो आँसू चू पड़े, “मेरे पुत्र की रक्षा करो, ऋषि श्रेष्ठ! उसे असमय काल के मुख में मत धकेलो।…
सहयोग: वाल्मीकि रामायण
“राष्ट्रहित सर्वोपरि” ????????






