एक पुरानी कहावत है—सफलता के 100 बाप होते हैं, लेकिन असफलता हमेशा अनाथ रहती है। राजनीति में यह कहावत और भी ज़्यादा सटीक बैठती है। बहुत कम लोग होते हैं जो जीत का जश्न सबके साथ मनाते हैं और हार की ज़िम्मेदारी अकेले अपने कंधों पर लेते हैं। महाराष्ट्र की राजनीति में ऐसा ही एक नाम है—देवेंद्र फडणवीस।
देवेंद्र फडणवीस वह नेता हैं जिन्होंने बार-बार नेतृत्व का असली अर्थ दिखाया। एक समय मुख्यमंत्री रह चुके व्यक्ति का उपमुख्यमंत्री पद स्वीकार करना आसान नहीं होता, लेकिन उन्होंने किया। उससे पहले भी वही नेता थे जिन्होंने दशकों से सोई हुई बीजेपी को महाराष्ट्र में फिर से खड़ा किया, जहाँ पार्टी हमेशा शिवसेना की दूसरी पंक्ति में खड़ी रहती थी—वह भी उस राज्य में जहाँ RSS का मुख्यालय है। मोदी युग से पहले यह लगभग स्वीकार कर लिया गया था कि महाराष्ट्र में बीजेपी कभी अकेले दम पर सत्ता में नहीं आएगी। 2014 में जब बीजेपी-शिवसेना गठबंधन टूटा, तब ज़्यादातर विश्लेषकों ने बीजेपी के सफ़ाए की भविष्यवाणी कर दी थी। लेकिन उसी दौर में, कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन के भाव के साथ, देवेंद्र फडणवीस ने पार्टी को सत्ता तक पहुँचाया और मुख्यमंत्री बने।
2019 में जब सत्ता हाथ से गई, तो कुछ दिनों का मुख्यमंत्री बनना राजनीतिक मज़ाक का विषय बना दिया गया। वर्षों तक वे आलोचना, तंज और ट्रोलिंग का निशाना बने। लेकिन संघ की परंपरा में पले नेता की तरह उन्होंने शोर नहीं मचाया, शिकायत नहीं की, बल्कि नेता प्रतिपक्ष के रूप में चुपचाप काम करते रहे। उसी दौरान उन्होंने वह नींव रखी जिससे शिवसेना और NCP—दोनों की राजनीति धीरे-धीरे बिखरती चली गई। जिन ताक़तों ने कभी उन्हें सत्ता से दूर किया था, वही उनकी रणनीति से अप्रासंगिक होती चली गईं। और जब समय आया, तो वे फिर सत्ता के केंद्र में थे—लेकिन एक बार फिर पीछे की पंक्ति में खड़े होकर, उपमुख्यमंत्री की भूमिका में, आलोचनाओं को सहते हुए।
2024 में तस्वीर बदली। बीजेपी अपने दम पर सत्ता में आई—वह सपना जो वर्षों से देखा जा रहा था। यह देवेंद्र फडणवीस की सबसे बड़ी राजनीतिक जीतों में से एक थी। कोई और होता तो यहीं रुक जाता, लेकिन फडणवीस नहीं। उन्होंने आख़िरी और सबसे अहम क़िला साधा—BMC का मेयर पद, जो दशकों से शिवसेना की सत्ता, पहचान और संसाधनों का केंद्र रहा है। जहाँ विरोधियों का अभियान विभाजन और डर पर टिका था, वहीं बीजेपी का अभियान उपलब्धियों और विश्वसनीयता पर लड़ा गया—जो भारतीय राजनीति में बहुत कम देखने को मिलता है। नतीजा इतिहास बन गया। पहली बार BMC को बीजेपी का मेयर मिला। मुंबई में अब सिर्फ़ डबल नहीं, ट्रिपल इंजन सरकार है।
आलोचक कुछ भी कहें, समर्थक कुछ भी कहें—इस पूरी यात्रा में अगर किसी एक व्यक्ति ने हार में सबसे ज़्यादा सहा और जीत में सबसे कम शोर मचाया, तो वह देवेंद्र फडणवीस हैं। जब-जब पार्टी गिरी, वे सामने खड़े रहे; जब-जब पार्टी जीती, वे पीछे हट गए। आज जब सफलता उनके नाम लिखी जा रही है, तो यह सिर्फ़ सत्ता की नहीं, धैर्य और निरंतरता की जीत है। सच ही कहा गया है—दुनिया चढ़ते सूरज को सलाम करती है, और आज का चढ़ता सूरज है फडणवीस।






