यह घटना 1987 के सियाचिन ग्लेशियर की है, जिसे दुनिया का सबसे ऊँचा और सबसे निर्दयी युद्ध क्षेत्र माना जाता है। यहाँ तापमान माइनस 50 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है और साँस लेना तक एक जंग बन जाता है। इसी सियाचिन में पाकिस्तान ने एक बेहद रणनीतिक ऊँचाई पर कब्जा कर लिया था, जिसे भारतीय सेना क़ायद पोस्ट कहती थी।
यह पोस्ट लगभग 21,153 फीट की ऊँचाई पर थी और इसकी बर्फीली चट्टान लगभग 90 डिग्री सीधी खड़ी दीवार जैसी थी। सैन्य विशेषज्ञों का मानना था कि इस दीवार को पार करना लगभग असंभव है और यहाँ तक कि हेलिकॉप्टर से हमला भी कारगर नहीं हो पा रहा था।
इसी असंभव को संभव करने की जिम्मेदारी मिली 8 जम्मू कश्मीर लाइट इन्फैंट्री के जवान नायब सूबेदार बाना सिंह को। भारी हथियार, ऑक्सीजन की कमी और शरीर को चीरती ठंड के बीच बाना सिंह और उनके साथियों ने रात के अंधेरे में उस खड़ी बर्फीली दीवार पर चढ़ाई शुरू की। कई घंटे की मूक चढ़ाई के बाद जब वे दुश्मन की पोस्ट तक पहुँचे तो आमने सामने की लड़ाई हुई। बाना सिंह ने हाथों हाथ युद्ध करते हुए दुश्मन के सैनिकों को मार गिराया और उस पोस्ट पर भारतीय तिरंगा फहरा दिया।
यह जीत सिर्फ एक पोस्ट जीतने की नहीं थी, यह उस सोच पर जीत थी जो मानती थी कि कुछ ऊँचाइयाँ इंसान के बस की नहीं होतीं। इस असाधारण वीरता के सम्मान में भारत सरकार ने क़ायद पोस्ट का नाम बदलकर बाना टॉप रख दिया। नायब सूबेदार बाना सिंह को भारत के सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता सम्मान परम वीर चक्र से नवाजा गया। वे यह सम्मान पाने वाले जम्मू कश्मीर लाइट इन्फैंट्री के पहले सैनिक बने।






