भारतीय समाज में मंदिरों की रक्षा और सवर्ण हितों की लड़ाई लड़ने वाली एक अनोखी पिता-पुत्र जोड़ी ने देशव्यापी पहचान बना ली है। ये वो सपूत हैं जो हिंदू धरोहर को बचाने और आरक्षण-जातिवाद के खिलाफ खुलकर उतरते हैं। चाहे अयोध्या राम मंदिर विवाद हो या हरिद्वार-काशी के मंदिरों पर कब्जे की धमकी, यह जोड़ी हमेशा सबसे आगे रहती है।
संघर्ष की शुरुआत: पिता का अडिग संकल्प
पिता ने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा सामाजिक न्याय के नाम पर हो रही सवर्ण उत्पीड़न के खिलाफ समर्पित किया। 1990 के दशक से वे मंदिरों पर अवैध कब्जों के खिलाफ आंदोलन चला रहे हैं। दिल्ली के चित्रकूट मंदिर से लेकर तमिलनाडु के सबरीमाला तक, हर जगह उनकी आवाज गूंजी। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में कई PIL दाखिल कीं, जिनमें मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने की मांग की। सवर्ण आरक्षण के खिलाफ उनकी सबसे तीखी आलोचना रही—’यह सवर्णों का अपमान है, योग्यता पर चोट।’ उनके भाषणों ने लाखों युवाओं को जागृत किया।
पुत्र का उभरता सूरज: नई पीढ़ी का विद्रोह
पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए पुत्र ने सोशल मीडिया को हथियार बनाया। इंस्टाग्राम-ट्विटर पर उनके वीडियो वायरल होते हैं, जहां वे तथ्यों के साथ जातिवादी नीतियों पर प्रहार करते हैं। हाल ही में वाराणसी के ज्ञानवापी मस्जिद विवाद में उन्होंने सबसे आगे मोर्चा संभाला, पुरातत्व सबूतों के साथ तर्क दिए। सवर्ण सम्मेलनों में वे बोलते हैं, “हमारे मंदिर हमारी पहचान हैं, इन्हें बचाना हमारा धर्म।” पुत्र ने पिता के साथ मिलकर ‘सवर्ण एकता मंच’ बनाया, जिसके लाखों सदस्य हैं।
प्रमुख लड़ाइयां: मंदिर और समाज सुधार
मंदिर मुक्ति अभियान: तिरुपति से लेकर उज्जैन महाकाल तक, अवैध कब्जे हटवाए।
आरक्षण विरोध: सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं, सवर्ण युवाओं के लिए नौकरियां दिलाईं।
सांस्कृतिक जागरण: धार्मिक उत्सवों में भागीदारी, हिंदुत्व को मजबूत किया।
यह जोड़ी सियासत से दूर रहती है, लेकिन भाजपा-आरएसएस के कार्यक्रमों में सम्मानित होती है। हाल के हरिद्वार गंगा घाट विवाद में उन्होंने हजारों समर्थकों को जुटाया।
विरासत: आने वाली पीढ़ियों के लिए मिसाल
पिता-पुत्र की यह जोड़ी सिखाती है कि सच्चा योद्धा डरता नहीं। चाहे ट्रोलिंग हो या धमकियां, वे अडिग हैं। आज फरवरी 2026 में भी उनकी सक्रियता बरकरार है। सवर्ण समाज उन्हें ‘मंदिर रक्षक’ कहता है। उनकी कहानी प्रेरणा है—धरोहर बचाओ, एकता दिखाओ।






