पति की सेक्रेटरी का मैसेज…
‘#मैं_प्रेग्नेंट_हूं… और पत्नी ने जवाब दिया: ‘आज रात मेरे घर आ जाओ, मेरी बीवी घर पर नहीं है!’
अब देखो आगे क्या होता है 🔥
अरुण शर्मा अभी नहा रहे थे। बाथरूम से पानी की तेज़ आवाज़ आ रही थी, जो बाहर की दुनिया से पूरी तरह अलग कर देती थी। उनका फोन लिविंग रूम की कॉफी टेबल पर रखा था, स्क्रीन अचानक चमक उठी। मैंने झुककर देखा, एक नया मैसेज आया था। भेजने वाला: “लक्ष्मी” (उनकी सेक्रेटरी)।
#संदेश: “#मैं_प्रेग्नेंट_हूँ।”
#मेरा पेट मरोड़ उठा, जैसे कोई चाकू अंदर घुसा हो। आठ साल की शादी, पांच साल से मैं बच्चा पैदा करने की कोशिश में लगी रही—कितनी दवाइयां खाईं, कितनी बार डॉक्टरों के पास गई, कितनी ताने सुने रिश्तेदारों से, सास-ससुर से भी। और अब… ये चार शब्द। चार शब्द, जो उनकी सेक्रेटरी की तरफ से आए थे। कमरे में सन्नाटा था, सिर्फ़ बाथरूम का पानी का शोर। मैंने उस मैसेज को घूरते हुए देखा। तीन सेकंड… फिर पांच सेकंड…
फिर मैं हंसी।
कोई आवाज़ नहीं, बस होंठों का एक कोना ऊपर उठा। मैंने उनका फोन उठाया, अपनी उंगली से अनलॉक किया। हां, मेरी उंगली का निशान। अरुण ने कभी कहा था कि उनको कुछ छिपाने की ज़रूरत नहीं, फोन मैं कभी भी इस्तेमाल कर सकती हूं। अब सोचकर हंसी आती है। मैंने चैट खोली, तेज़ी से टाइप किया। उनकी जगह जवाब भेजा: “आज रात मेरे घर आ जाओ, मेरी पत्नी घर पर नहीं है।” मैसेज सेंड हो गया। फिर मैंने अपना फोन उठाया। फैमिली ग्रुप में सास-ससुर को मैसेज:
#पापा-मम्मी जी.. जल्दी घर आइए, बहुत बड़ी खुशखबरी है जो बतानी है!” सेंड कर दिया… और फिर मैंने अलमारी से वो काली सिल्क वाली साड़ी निकाली, मेकअप किया, लाल लिपस्टिक लगाई… अरुण बाहर आए, मुझे देखकर ठिठक गए..
“ये क्या कर रही हो?”
उन्होंने पूछा… मैंने मुस्कुराकर कहा: “किसी का इंतज़ार कर रही हूं।” और तभी डोरबेल बजी… क्या होगा आगे?
सास-ससुर आ गए हैं, लक्ष्मी रास्ते में है… और अरुण अब तक कुछ नहीं जानता है
डोरबेल की आवाज ऐसे गूंजी जैसे किसी अदालत मे हथौडा पडा हो।
अरुण आश्चर्य से बोले…
“इतनी रात को कौन…?”
मैंने उसकी बात काट दी—
“जिन्हें सच जानना चाहिए।”
मैंने दरवाज़ा खोला।
सामने सास-ससुर खड़े थे। सासू मां के हाथ में मिठाई का डिब्बा था, चेहरे पर उम्मीद की चमक।
“खुशखबरी?” उन्होंने पूछा।
मैंने मुस्कुराकर कहा,
“हां… बहुत बड़ी।”
अरुण कुछ समझ नहीं पाया। वह बस कभी मुझे देखता, कभी अपने मां-बाप को।
तभी नीचे से फिर से डोरबेल की आवाज़ आई—इस बार लंबी, बेचैन…
मैंने अरुण की तरफ देखा।
“जाओ… दरवाज़ा तुम ही खोलो।”
उसके हाथ कांप रहे थे।
दरवाज़ा खुला…लक्ष्मी सामने खड़ी थी। सुट सलवार, आंखों में डर, हाथ में एक फाइल।
अरुण के मुंह से शब्द निकले ही नहीं।
सास-ससुर की नज़रें अब सवाल बन चुकी थीं।
मैंने शांति से कहा,
“आ जाइए लक्ष्मी जी, आप ही का इंतज़ार था।”
लक्ष्मी अंदर आई।
सन्नाटा इतना गहरा था कि सांसों की आवाज़ भी चुभ रही थी।
सासू मां ने धीरे से पूछा..
“बेटा… ये सब क्या है?”
मैंने टेबल पर अरुण का फोन रखा।
स्क्रीन ऑन की।
वही मैसेज।
“मैं प्रेग्नेंट हूं।”
सास-ससुर ने पढ़ा…
अरुण बैठ गया। जैसे किसी ने उसकी रीढ़ निकाल ली हो।
लेकिन…
यहीं कहानी ने करवट ली।
मैंने लक्ष्मी की तरफ देखा और कहा,
“अब तुम बताओ।” फोन टेबल पर रख दिया…
कमरे में कोई चीख नहीं थी, कोई आरोप नहीं—
बस एक औरत की टूटी हुई सांसें थीं।
मैंने लक्ष्मी की तरफ देखा।
वो कांप रही थी… लेकिन डर से नहीं, शर्म से।
धीरे-धीरे मैं उसके सामने गई।
उसके पेट पर नज़र पड़ी—
बहुत हल्का सा उभार… लेकिन मेरे लिए वो पहाड़ जैसा था।
मैंने एक पल के लिए आंखें बंद की।
पांच साल…
हर महीने की उम्मीद,
हर बार की रिपोर्ट,
हर बार का खालीपन।
मैंने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—
“बच्चा… गिराना मत।”
सब चौंक गए।
अरुण ने मेरी तरफ देखा,
“तुम… क्या कह रही हो?”
मैंने उसकी तरफ देखा भी नहीं।
मेरी आंखें सिर्फ़ लक्ष्मी पर थीं।
मैंने आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ा।
मेरी आवाज़ कांप रही थी, पर शब्द साफ़ थे—
“मुझे दे दो ये बच्चा।”
कमरे में जैसे समय रुक गया।
लक्ष्मी की आंखें भर आईं।
“मैडम… आप समझ नहीं रहीं—”
मैंने उसकी बात काट दी।
“मैं सब समझती हूं।”
“मैं ये भी जानती हूं कि तुम डर रही हो…
और ये भी कि समाज क्या कहेगा।”
फिर मैंने अपना सीना थपथपाया।
“मैं मां बनने को तरस रही हूं।”
सासू मां की आंखों से आंसू बह निकले।
ससुर जी की आवाज़ टूट गई—
“बहू…”
मैंने अरुण की तरफ देखा।
पहली बार नहीं, आख़िरी बार।
“मैं सोचना नहीं चाहती….
“मैं बदला नहीं चाहती….
“मैं सिर्फ़ ये चाहती हूं कि ये बच्चा ज़िंदा रहे।”
मैंने लक्ष्मी से कहा—
“मैं इसकी मां ना सही…”
“लेकिन अरुण तो पिता है ना?”
अरुण का सिर झुक गया।
उसके पास कहने को कुछ नहीं था।
मैंने आगे कहा—
“मुझे पता है…
“तो तुम दोनों इसे बोझ समझ कर गिरा दोगे…
“पर मेरे लिए… ये भगवान की आख़िरी दया है।”
लक्ष्मी फूट-फूट कर रोने लगी।
वो मेरे पैरों में बैठ गई—
“मैडम… अगर आप इसे अपनाएंगी…”
“तो ये बच्चा सबसे सुरक्षित रहेगा।”
मैंने उसे उठाया..गले लगाया…उस पल…
मैं पत्नी नहीं थी,
मैं औरत नहीं थी—
मैं मां थी।
मैंने सबके सामने कहा—
“अरुण, तुम मेरे पति रहो या ना रहो…”
“लेकिन ये बच्चा मेरा होगा।”
“इज़्ज़त से, क़ानून से, सच के साथ।”
डोरबेल फिर बजी …पुलिस नहीं थी।
डॉक्टर थी..और उस रात…
एक रिश्ता टूटा…एक सच उजागर हुआ..
लेकिन एक सूनी गोद भर गई।
धन्यवाद 🙏🏼
साभार मंजू नागपाल जी के वाल से






