मेरठ की डीसीपी सौम्या अग्रवाल महोदया के ताज़ा फरमान ने एक बात तो साफ कर दी है—थाना अब केवल न्याय का मंदिर नहीं, बल्कि एक ‘अति-गोपनीय परमाणु केंद्र’ है। जैसे ही आप हाथ में कैमरा लेकर थाने की दहलीज पार करते हैं, माहौल ऐसा हो जाता है मानो आपने किसी देश के सुरक्षा कोड चुरा लिए हों।
’नो कैमरा ज़ोन’ या सच का नो-एंट्री ज़ोन?
मैडम का यह डर देखकर तो लगता है कि थानों के बाहर अब बोर्ड बदल देने चाहिए। “पुलिस आपकी मित्र है” के बजाय वहां लिखा होना चाहिए:
”चेतावनी: यहाँ केवल सरकारी फिल्टर वाले कैमरे मान्य हैं। सच्चाई दिखाने वाले लेंस का प्रवेश वर्जित है, क्योंकि उससे चेहरे के दाग दिख जाते हैं।”
अजीब विडंबना है! जब पुलिस किसी अपराधी को पकड़ती है (या कम से कम उसकी नुमाइश करती है), तो कैमरे बुलाने के लिए पीआरओ की फौज लगा दी जाती है। तब कैमरा ‘लोकतंत्र का चौथा स्तंभ’ होता है। लेकिन वही कैमरा अगर बिना बुलाए किसी कोने में हो रही ‘सेवा’ या फाइल की धूल को कैद कर ले, तो वह अचानक कानून-व्यवस्था के लिए खतरा बन जाता है।
फुर्ती की नई परिभाषा
पत्रकारों पर मुकदमा लिखने में जो फुर्ती दिखाई जा रही है, काश उसका 10\% हिस्सा भी उन फाइलों पर दिखाया जाता जो थानों में दीमक चाट रही हैं।
अपराधी फरार हो? “जांच चल रही है।”
पत्रकार वीडियो बना ले? “फौरन एफआईआर दर्ज करो, यह राष्ट्रीय अखंडता पर हमला है!”
वाह! क्या गजब का प्रायरिटी सेट है। शायद प्रशासन को लगता है कि अगर वीडियो नहीं बनेगा, तो थाने के भीतर सब ‘ऑल इज वेल’ हो जाएगा। जैसे आंखें बंद कर लेने से रात नहीं हो जाती, वैसे ही कैमरे पर पाबंदी लगाने से थानों की कार्यशैली दूध की धुली नहीं हो जाएगी।
आईना और चेहरा
डीसीपी साहिबा, लोकतंत्र में कैमरा दुश्मन नहीं, आईना होता है। और आईने से वही डरता है जिसे अपना अक्स बिगड़ा हुआ दिखने का खौफ हो। आप मुकदमे की तलवार लटकाकर खामोशी तो खरीद सकती हैं, लेकिन साख (Respect) नहीं।
साख प्रेस नोट वाले फोटो से नहीं, बल्कि उस समय बनती है जब कैमरा सामने होने पर भी पुलिसकर्मी गर्व से कह सके
“बनाओ वीडियो, हम नियम के मुताबिक ही काम कर रहे हैं।”
अगली बार जब आप थाने जाएं, तो अपना फोन घर छोड़ जाएं, क्योंकि मेरठ पुलिस की नज़र में एक पत्रकार का मोबाइल, अपराधी के कट्टे से ज्यादा घातक हथियार है!
साभार : पुष्पेन्द्र तिवारी, छतरपुर की वाल से





