बेटा गिन रहा अंतिम सांसे,
भाजपा ने पिता को भेज दिया हजारों किलोमीटर दूर ..!
साल 1996…
स्थान – एम्स नई दिल्ली
एम्स अस्पताल का एक कमरा…
जहां मशीनों की बीप-बीप के बीच
मध्यप्रदेश भाजपा के अध्यक्ष और मंदसौर के वरिष्ठ सांसद डॉ लक्ष्मीनारायण पाण्डेय (बाबूजी ) के सबसे बड़े पुत्र
पवन पांडेय मौत से जंग लड़ रहे थे।
किडनी ट्रांसप्लांट के बाद भी उनकी हालत बिगड़ती जा रही थी। उनकी मां चंदावली ने ही उन्हें किडनी दान की थी।
पास में खड़े थे छोटे भाई राजेंद्र पांडेय, सुरेंद्र पांडेय , परिवार जैसे साथी प्रकाश सेठिया।
तीनों की आंखों में चिंता थी… लेकिन दिल में उम्मीद अभी बाकी थी।
उसी कमरे के एक कोने में बैठे थे, बाबूजी (डॉ. पांडेय)।
एक पिता… जो हर सांस के साथ अपने बेटे को टूटते हुए देख रहा था। दोपहर करीब 3 बजे… अस्पताल के दरवाजे पर एक व्यक्ति आया।
वह था व्यक्ति था भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी का ड्राइवर।
उसने एक कागज बाबूजी के हाथ में दिया।
लिखा था…“शाम 6 बजे फ्लाइट है, आपको तुरंत कोचीन पहुंचना है।”
कमरे में सन्नाटा छा गया…एक तरफ बेटा ,जो जिंदगी की आखिरी डोर पकड़े था… दूसरी तरफ संगठन..
जिसने उन्हें कर्तव्य के लिए बुलाया था। बाबूजी ने पवन की ओर देखा… आंखों में हजारों सवाल… लेकिन होंठ खामोश।
उन्होंने धीरे से नजरें झुका लीं… और बिना कुछ कहे उठ खड़े हुए।
जैसे ही अस्पताल के बाहर पहुंचे, आंसू छलक पड़े।
पर अगले ही पल… उन्होंने उन्हें पोंछ दिया।
क्योंकि अब वो सिर्फ पिता नहीं थे
वो कर्तव्य के पथ पर चलने वाले व्यक्ति थे।
कोचीन पहुंचकर बाबूजी ने खुद को पार्टी द्वारा सौंपे गए काम में पूरी तरह झोंक दिया।
किसी को अंदाजा भी नहीं था कि इस शांत चेहरे के पीछे एक तूफान छिपा है।
उधर… दिल्ली में बढ़ती बेचैनी…
एम्स में पवन की हालत बिगड़ती जा रही थी।
भाजपा मुख्यालय पर संदेश भिजवाया गया।
“स्थिति बहुत गंभीर है…”
आडवाणी जी को खबर हुई । आडवाणी जी ने तुरंत डॉ. पांडेय को दिल्ली वापस बुलवाया खुद भी एम्स पहुंचे।
स्नेह भरी डांट लगाते हुए कहा, पांडेय जी , आप कोचीन क्यों गए ? आपको अपने बेटे के साथ होना चाहिए था।’
डॉ पाण्डेय ने कहा ‘व्यक्तिगत जीवन का दुख, जिसके भाग्य में हो, उसे ही सहना पड़ता है। पार्टी, समाज या संगठन का कार्य किसी एक व्यक्ति के दुख से नहीं रुकना चाहिए।’
यह शब्द, एक पिता के दिल से नहीं, बल्कि एक ऐसे कर्तव्यवीर के मुंह से निकले थे जिसने समाज के लिए अपना सब कुछ न्योछावर करने का संकल्प लिया था।
लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।
22 दिन की जंग के बाद…
पवन पांडेय ने दुनिया को अलविदा कह दिया।
अस्पताल में सन्नाटा छा गया… हर आंख नम थी…
पर सबसे कठिन काम अभी बाकी था बाबूजी को यह खबर देना।
उस समय बाबूजी सांसद साथी फूलचंद वर्मा के साथ राष्ट्रपति भवन में थे।
वहीं मौजूद थीं उमा भारती भी। जब खबर पहुंची तो कुछ पल के लिए सब स्तब्ध रह गए।
किसी के पास शब्द नहीं थे… जब बाबूजी अस्पताल पहुंचे,
तो रात के करीब 11 बज चुके थे। उनके सामने था.. उनके बेटे पवन का शांत चेहरा।
न आंखों में आंसू… न कोई आवाज…
बस एक गहरी खामोशी…
जो शायद जिंदगी भर उनके साथ रही।
यह सिर्फ एक राजनैतिक किस्सा नहीं…
यह कर्तव्य, त्याग और आत्मबल की जीवित मिसाल है।
भाजपा की नींव में पड़े ये वो पत्थर है, जिनके बल पर आज भाजपा विश्व के सबसे बड़े राजनैतिक दल के रूप में स्थापित है।
ये किस्सा पगडंडी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक”युगपुरुष बाबूजी” में विस्तार से मौजूद है।



