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“साउथ एशिया ब्लैकआउट: श्रीलंका से बांग्लादेश तक पतन की कहानी”

साउथ एशिया: द ग्लोबल मास्टरप्लान डिकोडेड

​भाग 2: ‘ब्लैकआउट’ – श्रीलंका और बांग्लादेश का पतन

​पहली पोस्ट में हमने देखा कि कैसे ‘मसीहा’ तैयार किए जाते हैं, लेकिन आज हम उस कड़वी हकीकत की बात करेंगे कि जब ये मसीहा अपना काम पूरा कर लेते हैं, तो देशों का हश्र क्या होता है।

श्रीलंका और बांग्लादेश—दो ऐसे देश जिन्हें हाल के वर्षों में लोकतंत्र की ‘मिसाल’ या ‘उभरती अर्थव्यवस्था’ कहा जा रहा था, वे अचानक ताश के पत्तों की तरह क्यों ढह गए?

क्या यह सिर्फ आर्थिक कुप्रबंधन था, या एक सुनियोजित ‘ब्लैकआउट’ जिसने करोड़ों लोगों की आज़ादी को हमेशा के लिए एक क्यूआर (QR) कोड में कैद कर दिया?

​सबसे पहले बात करते हैं श्रीलंका की। साल 2022 का वो दृश्य याद कीजिए—सड़कें सूनी थीं, पेट्रोल पंपों पर मीलों लंबी कतारें थीं और लोग एक-एक दाने के लिए तरस रहे थे।

लेकिन क्या आपने गौर किया कि इस ‘संकट’ के बीच समाधान क्या पेश किया गया? सरकार ने “नेशनल फ्यूल पास” लागू किया और ईंधन पाने के लिए डिजिटल क्यूआर कोड अनिवार्य कर दिया।

यह दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा और सबसे क्रूर ‘डिजिटल ट्रायल’ था। जिस जनता के पास खाने के पैसे नहीं थे, उसे मजबूर किया गया कि वह अपनी हर गतिविधि को डिजिटल ग्रिड से जोड़े।

देखते ही देखते, श्रीलंका एक ऐसा देश बन गया जहाँ आपकी आज़ादी इस बात पर निर्भर थी कि आपका ‘डिजिटल वॉलेट’ या ‘कोड’ एक्टिव है या नहीं।

आज श्रीलंका आईएमएफ (IMF) की उन शर्तों की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है, जहाँ हर नीति वाशिंगटन से तय होती है और वहां का नया नेतृत्व केवल उन फाइलों पर हस्ताक्षर करने वाला एक क्लर्क बनकर रह गया है।

​ठीक यही पैटर्न हमें बांग्लादेश में देखने को मिला। वहां ‘कोटा आंदोलन’ के नाम पर जो अराजकता फैलाई गई, वह अचानक नहीं थी। सालों से वहां की लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर उन विदेशी संस्थाओं और एनजीओ (NGO) ने पैठ जमा ली थी, जिनका काम ही ‘सत्ता परिवर्तन’ की जमीन तैयार करना होता है।

शेख हसीना का रातों-रात देश छोड़कर भागना और उसके तुरंत बाद एक ऐसे शख्स (डॉ. मोहम्मद यूनुस) का सत्ता संभालना जो अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग लॉबी के सबसे चहेते रहे हैं, क्या यह सिर्फ एक इत्तेफाक है?

बांग्लादेश को आज एक ऐसी ‘ओपन जेल’ में बदला जा रहा है जहाँ विकास के नाम पर विदेशी कर्ज थोपा जा रहा है और जनता की आवाज़ को ‘सुधारों’ के शोर में दबाया जा रहा है।

​असल में, श्रीलंका और बांग्लादेश उस ‘ग्रैंड प्लान’ के दो अलग-अलग अध्याय हैं। श्रीलंका में ‘आर्थिक तबाही’ को हथियार बनाया गया, तो बांग्लादेश में ‘छात्र असंतोष’ को। लेकिन दोनों का अंत एक ही है—देश की संप्रभुता को उन अंतरराष्ट्रीय ताकतों के हाथों में सौंप देना जो अब आपके संसाधनों पर कब्ज़ा करना चाहती हैं।

यह वही स्क्रिप्ट है जो अब नेपाल की दहलीज पर दस्तक दे रही है। वहां भी जनता को पुराने भ्रष्ट नेताओं से नफरत करना सिखाया गया, ताकि वे नए ‘डिजिटल हीरोज’ की आगोश में खुद को खुशी-खुशी सौंप दें।

​ये ‘ब्लैकआउट’ दरअसल आपकी आंखों पर पट्टी बांधने की कोशिश है। जब आप अपने मोबाइल स्क्रीन पर अगले डिजिटल डिस्काउंट या ‘स्मार्ट’ सुविधा को देख रहे होते हैं, तब परदे के पीछे आपकी नेशनल एसेट्स (राष्ट्रीय संपत्तियां) नीलाम की जा रही होती हैं।

श्रीलंका की जनता आज जाग चुकी है, लेकिन बहुत देर हो चुकी है। क्या हम भी तभी जागेंगे जब हमारा पूरा जीवन एक बटन के क्लिक पर किसी विदेशी सर्वर द्वारा नियंत्रित होने लगेगा?

​अगली कड़ी में हम उस देश के ‘खजाने’ की बात करेंगे जिस पर दुनिया की सबसे शक्तिशाली खुफिया एजेंसी की नज़रें गड़ी हैं और कैसे एक ‘रैपर मसीहा’ उस खजाने की चाबी सौंपने की तैयारी कर चुका है।

​अगली पोस्ट में देखिए : ‘नेपाल का नया चेहरा’ – रैप, रील और यूरेनियम की वो डील जो नेपाल को हमेशा के लिए अमेरिका की ‘रणनीतिक कॉलोनी’ बना देगी।

बहुत गंभीर समस्या है.

साभार : सोशल मीडिया

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Author: sssrknews

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