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सुबह-शाम भगवान की आरती क्यों की जाती है? जानिए पंचतत्त्व और पूजा का रहस्य

सुबह शाम भगवान की आरती क्यों करते हैं एवं पंचमुखी हनुमान जी के पाँच मुखों की कथा क्या है आओ जानें

जगत पांच तत्त्वों से निर्मित है – वही पांच तत्त्व हर रुप में समाये हैं – फिर वे चाहे पांच कर्मेन्द्रिय हों – या पांच ज्ञानेन्द्रिय- या अंतःकरण पंचक – तन्मात्रा पंचक – या ईश्वर कोटि रुप पांच देव आदि — वहीं आरती भी उन पांच तत्त्वों से अछूती नहीं —

जगत निर्माण में आत्मा से आकाश – आकाश से वायु से अग्नि – अग्नि से जल – और जल से पृथ्वी की व्युत्पत्ति का क्रम है – यही क्रम ईश्वर आराधन रुप आरती का भी है —

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आरती में पर्दा खुलते ही सर्वप्रथम आत्मस्वरूप ईश्वर को देखते हैं — उसके पश्चात् आत्मा से प्रथम उत्पन्न आकाश के शब्द गुण रूप शंख को फूंका जाता है — फिर दूसरे तत्त्व वायु का प्रतीक चंवर ढुलता है या वस्त्र से इस क्रिया का प्रदर्शन होता है — पुनः तीसरे तत्त्व अग्नि व धूप से आरती होती है — इसके अनन्तर चौथा तत्त्व जल का प्रदर्शन कुंभारती व जल युक्त शंख के रूप में होता है — अंत में पांचवें तत्त्व पृथ्वी का प्रदर्शन अर्चक अपनी अंगुली अंगुष्ठादि अंगों द्वारा मुद्राऐं दिखाता हुआ करता है या उसके स्थान पर हाथ जोडता है — पश्चात् इस प्रक्रिया का विलोम है —

अब प्रश्न है कि आरती को कैसे और कितनी बार घुमाएं —

जिस देवता की आरती करने चलें — उसी देवता का बीजमंत्र- स्नान स्थाली – नीराजन स्थाली – घण्टिका – और जल कमण्डलु आदि पात्रों पर चन्दन आदि से लिखना चाहिए– फिर आरती के द्वारा भी उसी बीजमंत्र को देव प्रतिमा के सामने बनाना चाहिए– यदि कोई व्यक्ति तत्तद देवताओं के विभिन्न बीजमंत्रों का ज्ञान न रखता हो तो सर्व वेदों के बीजभूत प्रणव ऊँकार को ही लिखना चाहिए अर्थात् आरती को ऐसे घुमाना चाहिए कि ऊँ वर्ण की आकृति उस दीपक द्वारा बन जाये —-

शास्त्र में जिस देवता की जितनी संख्या लिखी हो – उतनी बार ही आरती घुमानी चाहिए – जैसे भगवान विष्णु आदित्यों में परिगणित होने के कारण द्वादशात्मा माने गये हैं – इसलिए उनकी तिथि भी द्वादशी है और मंत्र भी द्वादशाक्षर है अतः विष्णु की आरती में बारह आवर्तन आवश्यक है —

सूर्य सप्त रश्मि है – सात रंग कि विभिन्न किरणों वाले – सात घोडों से युक्त रथ में सवार – सप्तमी तिथि का अधिष्ठाता हैं — सूर्य आरती में सात बार बीजमंत्र उद्धार करना आवश्यक है —

दुर्गा की नव संख्या प्रसिद्ध है – नवमी तिथि है – नवाक्षर मंत्र है अतः नौ बार आरती का आवर्तन होना चाहिए– एकादश रुद्र हैं अथवा शिव जी चतुर्थी तिथि के अधिष्ठाता है – अतः ११ या १४ आवर्तन आवश्यक हैं — गणेश जी चतुर्थी तिथि के अधिष्ठाता हैं – इसलिए चार आवर्तन होना चाहिए —

इसी प्रकार मंत्र संख्या या तिथि आदि के अनुरोध से अन्यान्य देवताओं के लिए भी कल्पना कर लेनी चाहिए —

अथवा सभी देवताओ के लिए सात बार भी साधारणतया किया जाता है – जिस में चरणों में चार बार – नाभी में दो बार और मुख पर एक बार फिर सर्वांग पर सात बार आरती करें —

॥ नारायण ॥

पंचमुखी हनुमान जी के पाँच मुखों की कथा

यह कथा रामायण के युद्धकाल से जुड़ी है, जब हनुमान जी ने अपना पंचमुखी (पाँच मुखों वाला) रूप धारण किया।

लंका युद्ध के समय रावण के भाई अहिरावण ने मायावी विद्या से
राम और लक्ष्मण को पाताल लोक में बंदी बना लिया।
अहिरावण का वध तभी संभव था, जब पाँच दिशाओं में स्थित पाँच दीपक
एक ही क्षण में बुझाए जाएँ।

यह कार्य साधारण रूप में असंभव था।

तब हनुमान जी ने अपना पंचमुखी रूप धारण किया—
पाँच मुख, पाँच दिशाएँ, पाँच शक्तियाँ।

पाँच मुख और उनका अर्थ
1. हनुमान मुख (पूर्व)
👉 साहस, बल और भक्ति का प्रतीक
2. नरसिंह मुख (दक्षिण)
👉 अन्याय और अहंकार के संहार का स्वरूप
3. गरुड़ मुख (पश्चिम)
👉 विष, भय और बंधनों से मुक्ति
4. वराह मुख (उत्तर)
👉 पृथ्वी, धर्म और स्थिरता की रक्षा
5. हयग्रीव मुख (ऊर्ध्व / आकाश)
👉 ज्ञान, विवेक और दिव्य चेतना

इन पाँचों मुखों से हनुमान जी ने
एक ही क्षण में पाँचों दीपकों को बुझाया
और अहिरावण का अंत किया।

आध्यात्मिक अर्थ

पंचमुखी हनुमान केवल युद्धकथा नहीं हैं—
वे यह दर्शाते हैं कि:
• बल बिना विवेक के अधूरा है
• भक्ति बिना ज्ञान के अस्थिर है
• और धर्म की रक्षा के लिए अनेक शक्तियों का संतुलन आवश्यक है

संदेश

जब अधर्म अनेक रूपों में आए,
तब धर्म भी अनेक रूप धारण करता है।

इसी कारण पंचमुखी हनुमान
संकट, भय, बाधा और अज्ञान—सबके नाशक माने जाते हैं।

मंत्र:

ॐ नमो भगवते पंचमुखाय हनुमते नमः॥

यह मंत्र
• साहस बढ़ाता है, नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा करता है और संकट के समय मन को स्थिर करता है
:- श्रद्धा ही इसका वास्तविक बल है।
!! जय बजरंगबली !!

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