आर्यन मल्होत्रा? जो करोड़ों की फीस लेता है, वह एक गरीब सिलाई वाली का केस लड़ेगा? बिल्डर के वकील के पसीने छूट गए।……….
कोर्ट रूम के बाहर सन्नाटा पसरा था, लेकिन अंदर वकीलों की बहस का शोर दीवारों से टकरा रहा था। शहर के सबसे नामचीन वकील, आर्यन मल्होत्रा, आज अपनी सीट पर बैठे फाइलों को नहीं, बल्कि सामने कटघरे में खड़ी उस महिला को देख रहे थे, जिसके चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं।
उसका नाम सुधा था। साधारण सी सूती साड़ी, आँखों में नमी और हाथों में एक पुराना सा बैग थामे वह किसी अपराधी की तरह खड़ी थी, जबकि उसका कसूर सिर्फ इतना था कि उसने अपने ही घर को बचाने के लिए एक रसूखदार बिल्डर के खिलाफ आवाज़ उठाई थी।
बिल्डर के वकील ने चिल्लाते हुए कहा, “योर ऑनर, यह महिला झूठ बोल रही है। इसने अपनी ज़मीन मेरे क्लाइंट को बेची थी, और अब और पैसे ऐंठने के लिए यह नाटक कर रही है।”
सुधा रो पड़ी। “नहीं जज साहब, मैंने अंगूठा नहीं लगाया था। उन्होंने धोखे से कोरे कागज़ पर…” उसकी आवाज़ रुंध गई।
आर्यन मल्होत्रा, जो अपनी फीस के लिए जाने जाते थे और जिनके पास खड़े होने का मतलब ही लाखों का खर्च था, आज चुपचाप यह तमाशा देख रहे थे। वह इस केस के वकील नहीं थे, वह तो बस अपने एक क्लाइंट का इंतज़ार कर रहे थे। लेकिन सुधा की वह रुंआसी आवाज़ और उसका वह पुराना बैग… आर्यन के दिमाग में एक बिजली सी कौंध गई।
उसने अपने जूनियर को इशारा किया, “पता करो, यह महिला कौन है और कहाँ से आई है?”
जूनियर ने थोड़ी देर बाद आकर कान में फुसफुसाया, “सर, यह शहर के पुराने इलाके ‘रामपुर बस्ती’ की रहने वाली है। नाम सुधा है, पति नहीं हैं, सिलाई करके घर चलाती है।”
‘रामपुर बस्ती’… यह नाम सुनते ही आर्यन के ज़हन में बीस साल पुराना एक मंज़र ताज़ा हो गया। एसी कमरों और लग्जरी गाड़ियों में घूमने वाला आर्यन आज अचानक अतीत की उस धूल भरी गली में पहुँच गया।
बीस साल पहले…
आर्यन तब ‘छोटू’ हुआ करता था। अनाथ था, उसका कोई अपना नहीं था। रामपुर बस्ती के एक छोटे से ढाबे पर वह बर्तन मांजने का काम करता था। दिन भर की मेहनत के बदले उसे दो वक्त की रूखी-सूखी रोटी और ढाबे वाले की गालियां मिलती थीं। वह अक्सर भूखा सोता था।
उसी बस्ती में एक छोटी सी दुकान थी, जहाँ एक हलवाई बैठता था। उस हलवाई की बेटी थी—सुधा। तब वह मुश्किल से दस साल की रही होगी। छोटू अक्सर उस दुकान के पास से गुज़रता और वहां कड़ाही में तलती जलेबियों और समोसों की खुशबू से अपना पेट भरने की कोशिश करता।
एक दिन दिवाली का त्यौहार था। पूरी बस्ती में दीये जल रहे थे, सब खुश थे। लेकिन ढाबे वाले ने छोटू को उस दिन काम से निकाल दिया था क्योंकि उसने गलती से एक कांच का गिलास तोड़ दिया था। न रहने का ठिकाना था, न खाने को कुछ।
भूख से बिलखता छोटू, हलवाई की दुकान के पीछे वाले चबूतरे पर बैठकर घुटनों में सिर दिए रो रहा था। उसे अपनी किस्मत पर रोना आ रहा था। तभी उसे अपने कंधे पर किसी का हाथ महसूस हुआ।
उसने सिर उठाया। सामने सुधा खड़ी थी। उसके हाथों में एक दोने में दो बड़े-बड़े गरम समोसे और जलेबी थी।
“ए… क्यों रो रहा है?” सुधा ने अपनी तोतली आवाज़ में पूछा।
छोटू ने आंसू पोंछे और अकड़कर बोला, “मैं नहीं रो रहा। आँख में धुआं चला गया है।”
“झूठ मत बोल। तुझे भूख लगी है ना?” सुधा ने सीधे पूछा।
छोटू चुप रहा। उसका पेट गवाही दे रहा था।
सुधा ने वह दोना उसकी तरफ बढ़ा दिया। “ले खा ले।”
छोटू ने ललचाई नज़रों से देखा, पर स्वाभिमान आड़े आ गया। “मेरे पास पैसे नहीं हैं।”
“पैसे कौन मांग रहा है? यह मेरी तरफ से है। आज दिवाली है ना।”
छोटू ने हाथ बढ़ाया ही था कि दुकान के अंदर से सुधा के बाऊजी की कड़क आवाज़ आई, “सुधा! कहाँ गई? और वो समोसे कहाँ हैं जो मैंने तुझे खाने को दिए थे?”
छोटू का हाथ ठिठक गया। अगर बाऊजी को पता चला तो सुधा की पिटाई होगी। वह भागने ही वाला था कि सुधा ने उसका हाथ पकड़ लिया और उसे जबरदस्ती दोना थमा दिया।
सुधा ने पलटकर बाऊजी से जोर से कहा, “बाऊजी, वो… वो समोसे गिर गए। मिटटी लग गई थी, इसलिए मैंने फेंक दिए।”
“फेंक दिए? अरे पगली, ध्यान से नहीं रख सकती थी? चल अब और नहीं मिलेंगे, सब खत्म हो गए हैं,” बाऊजी ने डांटते हुए कहा।
सुधा ने चुपचाप डांट सुन ली। छोटू हैरान था। सुधा को वो समोसे बहुत पसंद थे, उसने खुद देखा था कि वह कब से उनके बनने का इंतज़ार कर रही थी। लेकिन उसने छोटू के लिए झूठ बोला। उसने अपना हिस्सा छोटू को दे दिया और खुद भूखी रह गई।
छोटू ने कांपते हाथों से समोसा खाया। उस दिन उस समोसे का स्वाद उसे दुनिया के किसी भी पकवान से ज्यादा लजीज लगा था। वह सिर्फ खाना नहीं था, वह एक अनजान बच्ची का त्याग था।
खाने के बाद छोटू ने सुधा से पूछा, “तूने झूठ क्यों बोला? तुझे भूख नहीं लगी थी?”
सुधा ने मुस्कुराते हुए कहा, “लगी तो थी। पर मेरी भूख तेरे आंसुओं से बड़ी नहीं थी। और वैसे भी, बाऊजी कहते हैं कि त्योहार पर कोई भूखा नहीं रहना चाहिए। आज से तू मेरा दोस्त है, ठीक है?”
उस एक झूठ ने, उस एक त्याग ने छोटू के दिल में एक ऐसी जगह बना ली थी जो कभी नहीं भरी। कुछ दिनों बाद एक एनजीओ वाले आए और छोटू को वहां से ले गए। उसे अनाथालय में डाल दिया गया, जहाँ से उसने पढ़ाई की और आज वह शहर का सबसे बड़ा वकील आर्यन मल्होत्रा बन गया। लेकिन वह उस ‘समोसे वाले झूठ’ को कभी नहीं भूला था।
आर्यन अपनी कुर्सी से उठा। उसने जज साहब से कहा, “योर ऑनर, मैं इस केस में सुधा जी की तरफ से वकालत करना चाहता हूँ।”
पूरा कोर्ट सन्न रह गया। आर्यन मल्होत्रा? जो करोड़ों की फीस लेता है, वह एक गरीब सिलाई वाली का केस लड़ेगा? बिल्डर के वकील के पसीने छूट गए।
आर्यन ने केस की फाइल हाथ में भी नहीं ली थी, बस अपनी जिरह शुरू की। उसने ऐसे-ऐसे सवाल दागे और ऐसे सबूत पेश करवाए (जो उसने अपने संपर्कों से तुरंत मंगवाए थे) कि आधे घंटे के अंदर ही दूध का दूध और पानी का पानी हो गया। साबित हो गया कि बिल्डर ने धोखे से सुधा के घर के कागज़ हथियाए थे।
जज ने फैसला सुधा के हक़ में सुनाया और बिल्डर पर भारी जुर्माना भी लगाया। सुधा को उसका घर वापस मिल गया।
सुधा को यकीन नहीं हो रहा था। वह कांपते हाथों से आर्यन के पास आई।
“वकील साहब… मैं… मैं आपका शुक्रिया कैसे अदा करूँ? मेरे पास आपको देने के लिए तो कुछ भी नहीं है। आप तो बहुत बड़े वकील हैं, आपकी फीस…” सुधा ने अपनी पोटली टटोलनी चाही।
आर्यन ने मुस्कुराते हुए उसका हाथ रोक दिया। उसने सुधा की आँखों में देखा और कहा, “मेरी फीस तो मुझे बीस साल पहले ही मिल चुकी है सुधा जी।”
सुधा हैरान थी। “बीस साल पहले? पर मैं तो आपसे आज पहली बार मिल रही हूँ।”
आर्यन ने अपनी जेब से रुमाल निकालकर पसीना पोंछा और कहा, “याद कीजिये, रामपुर बस्ती… हलवाई की दुकान… दिवाली की रात… और वो दो समोसे जो ‘गिर’ गए थे।”
सुधा की आँखें फटी की फटी रह गईं। वह स्मृतियों के सागर में गोते लगाने लगी। एक पल बाद उसकी आँखों में पहचान की चमक आ गई। “तुम… तुम वो बर्तन मांजने वाले छोटू हो?”
आर्यन ने सिर हिलाया। “हाँ दीदी। उस दिन आपने अपने हिस्से का खाना मुझे देकर बाऊजी से झूठ बोला था कि समोसे गिर गए। उस दिन उस झूठ ने एक भूखे बच्चे की जान बचाई थी और उसे इंसानियत पर भरोसा करना सिखाया था। आज मैंने बस उस ‘झूठ’ का छोटा सा कर्ज़ चुकाया है।”
सुधा की आँखों से झर-झर आंसू बहने लगे। उसने आर्यन के सिर पर हाथ रख दिया। “पगले… वो कर्ज़ नहीं था, वो तो एक बहन का फर्ज़ था। तूने तो आज मेरी छत बचा ली।”
आर्यन ने सुधा का हाथ थाम लिया। “छत तो आपने उस दिन बचाई थी दीदी, जब मुझे लगा था कि इस दुनिया में मेरा कोई नहीं है। आपने मुझे एहसास दिलाया था कि रिश्ते खून के नहीं, एहसास के होते हैं। आज से यह बड़ा वकील आपका भाई है। जब भी ज़रूरत हो, हक से आना।”
उस दिन कोर्ट के बाहर निकलते हुए आर्यन को वैसी ही तृप्ति महसूस हो रही थी जैसी बीस साल पहले वो समोसे खाकर हुई थी। उसने करोड़ों के केस जीते थे, लेकिन आज की जीत सबसे अनमोल थी। क्योंकि आज उसने फीस नहीं, ‘दुआ’ कमाई थी।
साभार : पूजा मिश्रा जी






