वो 71 की उम्र में फिर से NEET परीक्षा देने पहुंचे। हॉल में अकेले नहीं थे। उनके साथ- उनकी मां थी।
जो 25 साल पहले चली गई थीं।
3 मई 2026।
लखनऊ।
NEET की परीक्षा।
देश के 20 लाख से ज़्यादा परीक्षार्थी।
ज्यादातर 17 से 20 साल के।
उनके बीच
एक इंसान बैठा था।
जिनकी ढलती उम्र साफ झलक रही थी।
झुर्रियों भरा चेहरा।
पर आंखों में
एक ऐसी चमक
जो उन लाखों युवाओं में भी शायद न हो।
अशोक बहार।
उम्र 17 नहीं, 71।
लखनऊ।
वो डॉक्टर बनने नहीं आए थे।
वो -एक वादा पूरा करने आए थे।
वो वादा -जो उन्होंने अपनी मां से किया था।
जो मां -अब इस दुनिया में नहीं हैं।
एक बुज़ुर्ग -अपने से आधी से आधी उम्र के बच्चों के बीच -परीक्षा दे रहे हैं
मेरे लिए यह समाचार सिर्फ इस बुजुर्ग की कहानी नहीं।
यह एक मां की भी कहानी थी।
अशोक बहार कौन हैं?
लखनऊ के अलाम नगर के चंद्र नगर में रहने वाले अशोक बहार, एक pharmaceutical company में उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के Marketing Head थे। 2000 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली थी।
उनके पिता, लखनऊ के एक सम्मानित चिकित्सक थे। उनकी पत्नी डॉ. मंजू बहार, एक वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं।
यानी
घर में डॉक्टर थे।
बाहर डॉक्टर थे।
दवाइयों की दुनिया में ज़िंदगी गुजरी।
पर
एक सर्टिफिकेट नहीं थी।
एक डिग्री नहीं थी।
एक वादा
पूरा नहीं हुआ था।
वो वादा
उनकी मां
हमेशा चाहती थीं
कि अशोक
अपने पिता की तरह डॉक्टर बनें।
पर जिंदगी ने
दूसरा रास्ता दिखाया।
नौकरी।
जिम्मेदारियां।
वक्त।
और मां
बिना उस सपने को पूरा देखे
चली गईं।
पर वो सपना
अशोक के दिल में
जीवित रहा।
25 साल तक।
30 साल तक।
जब तक वो खुद 71 के नहीं हो गए।
3 मई 2026, वो सुबह
परीक्षा केंद्र।
अशोक बहार-उन्हीं नियमों के साथ
उन्हीं बच्चों के बीच बैठे।
परीक्षा केंद्र के अधिकारियों ने बताया
उनके लिए कोई विशेष व्यवस्था नहीं थी।
वो बाकी परीक्षार्थियों की तरह
वही नियम, वही वेरिफिकेशन, वही प्रोसेस।
सोचो उस पल को।
एक 71 साल का इंसान
20 साल के बच्चों के बीच।
Question paper सामने।
Answer sheet सामने।
और शायद, उस कमरे में
एक और उपस्थिति
मां की।
उनके शब्द, जो दिल में उतर जाते हैं
परीक्षा के बाद India Today से बात करते हुए अशोक बहार ने कहा, “मेरी चिकित्सा के क्षेत्र में लंबे समय से रुचि रही है।
मुझे लगा कि अगर मैं समाज में सार्थक योगदान देना चाहता हूं
तो मुझे सही training और recognized qualification चाहिए।”
“सार्थक योगदान।”
71 साल की उम्र में।
जब ज्यादातर लोग
आराम की तलाश में होते हैं।
यह इंसान
अभी भी देना चाहता है।
धरती पर ऐसे लोग भी हैं।
तेलंगाना। 2025।
भुक्या सरिता, 38 साल।
उनकी बेटी कावेरी के साथ
NEET की परीक्षा दी।
शादी के बाद जो सपना अधूरा रह गया था
बेटी को तैयार होते देखकर
मां ने भी कहा
“मैं भी।”
राजस्थान। 2025।
हंसराम पटेल।
7वीं कक्षा में पिता को खो दिया।
मजदूरी करके घर चलाया।
NEET पास किया।
वजह?
“ताकि कोई और बच्चा
अपने पिता को इसलिए न खोए
क्योंकि इलाज नहीं मिला।”
पर अशोक बहार का संदेश हर उम्र के लिए बहुत बड़ा है
Stanford University का शोध:
“The brain’s neuroplasticity
यानी सीखने की क्षमता
जीवन भर बनी रहती है।”
Harvard Medical School:
“वयस्क जो सीखना जारी रखते हैं,उनमें डिमेंशिया (मनोभ्रंश) का जोखिम 46% कम होता है।
सीखना केवल शिक्षा नहीं है,यह मन की औषधि है।”
यानी
पढ़ना, सिर्फ डिग्री के लिए नहीं।
पढ़ना, जिंदगी को जीवित रखने के लिए है।
सुकरात
जब उन्हें मौत की सजा दी गई
उन्होंने कहा
“मैं तब तक सीखना बंद नहीं करूंगा
जब तक मेरी साँस है।”
गालिब ने लिखा:
“हज़ारों साल नरगिस अपनी बेनूरी पे रोती है।
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा।”
हजारों साल की प्रतीक्षा के बाद
एक आंख खुलती है।
अशोक बहार की आंख
71 साल में
मां के सपने के लिए
खुली।
आपके भीतर भी कोई सपना है
जो कहीं दब गया है?
किसी ने कहा “अब बहुत देर हो गई।”
और अपने मान लिया?
या कोई वादा है
जो किसी अपने से किया था
और अभी भी अधूरा है?
अशोक बहार 71 साल में
उन 20 लाख बच्चों के बीच बैठे
और उन्हें नहीं लगा
“बहुत देर हो गई।”
मां का सपना बूढ़ा नहीं हुआ।
उस दिन जब वह परीक्षा दे रहे थे
कहीं किसी कोने में किसी आसमान में
मां मुस्कुराई होगी।
मेरे बच्चों को मैंने ये समाचार सुनाया
मैंने देखा बच्चे बहुत प्रेरित हुए
मैं चाहता हूं कि हर वो व्यक्ति इसे पढ़े
जिसने सीखना पढ़ना जानना व्यस्तता के बहाने छोड़ दिया है
शायद यह पोस्ट
कल उठकर कुछ करने की
ताकत दे।
💙🙏
स्रोत: NDTV, India Today, The Logical Indian, Medical Dialogues, The Education India मई 2026






