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अपरा एकादशी 2026: व्रत कथा, पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और अधिकमास के अचूक उपाय

Daily panchang,अपरा एकादशी व्रत कथा महत्व पूजा विधि एवं अधिकमास में ऐसा क्या उपाय जिससे बनेंगे बिगड़े काम

🌤️ दिनांक – 13 मई 2026
🌤️ दिन – बुधवार
🌤️ विक्रम संवत 2083
🌤️ शक संवत -1948
🌤️ अयन – उत्तरायण
🌤️ ऋतु – ग्रीष्म ॠतु
🌤️ मास – ज्येष्ठ
🌤️ पक्ष – कृष्ण
🌤️ तिथि – एकादशी दोपहर 01:29 तक तत्पश्चात द्वादशी
🌤️ नक्षत्र – उत्तरभाद्रपद रात्रि 12:17 तक तत्पश्चात रेवती
🌤️ योग – विष्कंभ रात्रि 08:55 तक तत्पश्चात प्रीति
🌤️*राहुकाल – दोपहर 12:35 से दोपहर 02:14 तक*
🌤️ सूर्योदय – 06:02
🌤️ सूर्यास्त – 07:07
दिशाशूल – उत्तर दिशा मे

अपरा एकादशी व्रत कथा महत्व पूजा विधि एवं अधिकमास में ऐसा क्या उपाय जिससे बनेंगे बिगड़े काम आओ जानें

ज्येष्ठ मास में आने वाली पहली एकादशी का नाम अपरा एकादशी है। ज्येष्ठ मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम अपरा एकादशी है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करने का विशेष महत्व है। मान्यता है कि जो व्यक्ति एकादशी का व्रत पूरे विधि विधान के साथ करता है। उसकी सारी मनोकामनाएं पूरी हो जाती है। साथ ही घर परिवार में भी सुख समृद्धि बनी रहती है।
अपरा एकादशी का आध्यात्मिक महत्व
अपरा शब्द का अर्थ है, जिसकी सीमा न हो। अर्थात इस दिन किया गया जप, तप, व्रत और दान अनंत गुना फल देने वाला होता है। शास्त्रों में वर्णित है कि जो साधक श्रद्धा और नियमपूर्वक इस एकादशी का व्रत करता है, उसके समस्त पापों का क्षय होता है और जीवन में सुख-शांति का संचार होता है।
यह एकादशी विशेष रूप से उन लोगों के लिए कल्याणकारी मानी जाती है, जो अपने जीवन में किए गए जाने-अनजाने पापों से मुक्ति चाहते हैं। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से ब्रह्महत्या, परनिंदा, असत्य भाषण और अन्य गंभीर दोषों से भी मुक्ति मिलती है। साथ ही, यह व्रत साधक को मोक्ष के मार्ग की ओर अग्रसर करता है।
पूजा विधि
अपरा एकादशी तिथि के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और फिर अच्छे से घर की सफाई करें। ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करें और व्रत का संकल्प लें और साफ वस्त्र धारण करें। ।
इसके बाद हाथ में थोड़ा जल लेकर पूजा स्थल पर जल छिड़कें और व्रत पूरा करने का संकल्प लें।
अब एक लकड़ी की चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर उसपर भगवान विष्णु की मूर्ति स्थापित करें।
अब भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का अभिषेक करके उन्हें नए वस्त्र अर्पित करें।
इसके बाद घी का दीपक जलाकर भगवान विष्णु के मंत्रों का जप करें। इसके बाद उन्हें माखन मिश्री का भोग लगाएं।
एकादशी व्रत कथा का पाठ करें। अंत में भगवान विष्णु की आरती करें और उन्हें भोग लगाकर परिवार जनों में प्रसाद बांट दें।

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क्या करें और क्या न करें
इस पावन दिन सात्विकता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। फलाहार करें, मन को शांत रखें और भगवान के नाम का स्मरण करते रहें। जरूरतमंदों को जल, फल, अन्न या वस्त्र दान करना अत्यंत पुण्यकारी होता है।
वहीं इस दिन कुछ कार्यों से बचना भी आवश्यक है; जैसे चावल का सेवन, तामसिक भोजन, क्रोध, निंदा और असत्य भाषण। इसके अलावा बाल और नाखून काटना, दोपहर में सोना और तुलसी के पत्ते तोड़ना भी वर्जित माना गया है।
इन नियमों का पालन करने से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है और साधक के ऊपर भगवान विष्णु की कृपा बनी रहती है।
अपरा एकादशी पर दान करने का महत्व
सनातन परंपरा में दान को सर्वोत्तम कर्म माना गया है। साथ ही अपरा एकादशी जैसे पुण्यदायी मौके पर इसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन किया गया दान अक्षय पुण्य प्रदान करता है और जीवन के कष्टों को दूर करता है।
इस पावन अवसर पर वैष्णव ब्राह्मणों, दीन-हीन,असहाय और जरूरतमंद लोगों को भोजन, वस्त्र, अन्न और धन का दान करना अत्यंत शुभ माना गया है। विशेष रूप से भूखे को भोजन कराना सबसे बड़ा पुण्य कार्य बताया गया है।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी दान के महत्व को बताते हुए कहा है।
तुलसी पंछी के पिये घटे न सरिता नीर।
दान दिये धन ना घटे जो सहाय रघुवीर।।
अर्थात् जिस प्रकार पक्षियों के पानी पीने से नदी का जल कम नहीं होता, उसी प्रकार यदि भगवान का आशीर्वाद आपके साथ है तो दान देने से आपके धन के भंडार में कभी कमी नहीं होती।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

अपरा एकादशी व्रत कथा
युधिष्ठिर ने पूछा : जनार्दन ! ज्येष्ठ मास के कृष्णपक्ष में किस नाम की एकादशी होती है? मैं उसका माहात्म्य सुनना चाहता हूँ । उसे बताने की कृपा कीजिये ।
भगवान श्रीकृष्ण बोले : राजन् ! आपने सम्पूर्ण लोकों के हित के लिए बहुत उत्तम बात पूछी है । राजेन्द्र ! ज्येष्ठ मास के कृष्णपक्ष की एकादशी का नाम ‘अपरा’ है । यह बहुत पुण्य प्रदान करनेवाली और बड़े बडे पातकों का नाश करनेवाली है । ब्रह्महत्या से दबा हुआ, गोत्र की हत्या करनेवाला, गर्भस्थ बालक को मारनेवाला, परनिन्दक तथा परस्त्रीलम्पट पुरुष भी ‘अपरा एकादशी’ के सेवन से निश्चय ही पापरहित हो जाता है । जो झूठी गवाही देता है, माप तौल में धोखा देता है, बिना जाने ही नक्षत्रों की गणना करता है और कूटनीति से आयुर्वेद का ज्ञाता बनकर वैध का काम करता है… ये सब नरक में निवास करनेवाले प्राणी हैं । परन्तु ‘अपरा एकादशी’ के सवेन से ये भी पापरहित हो जाते हैं । यदि कोई क्षत्रिय अपने क्षात्रधर्म का परित्याग करके युद्ध से भागता है तो वह क्षत्रियोचित धर्म से भ्रष्ट होने के कारण घोर नरक में पड़ता है । जो शिष्य विद्या प्राप्त करके स्वयं ही गुरुनिन्दा करता है, वह भी महापातकों से युक्त होकर भयंकर नरक में गिरता है । किन्तु ‘अपरा एकादशी’ के सेवन से ऐसे मनुष्य भी सदगति को प्राप्त होते हैं ।
माघ में जब सूर्य मकर राशि पर स्थित हो, उस समय प्रयाग में स्नान करनेवाले मनुष्यों को जो पुण्य होता है, काशी में शिवरात्रि का व्रत करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, गया में पिण्डदान करके पितरों को तृप्ति प्रदान करनेवाला पुरुष जिस पुण्य का भागी होता है, बृहस्पति के सिंह राशि पर स्थित होने पर गोदावरी में स्नान करनेवाला मानव जिस फल को प्राप्त करता है, बदरिकाश्रम की यात्रा के समय भगवान केदार के दर्शन से तथा बदरीतीर्थ के सेवन से जो पुण्य फल उपलब्ध होता है तथा सूर्यग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में दक्षिणासहित यज्ञ करके हाथी, घोड़ा और सुवर्ण दान करने से जिस फल की प्राप्ति होती है, ‘अपरा एकादशी’ के सेवन से भी मनुष्य वैसे ही फल प्राप्त करता है । ‘अपरा’ को उपवास करके भगवान वामन की पूजा करने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो श्रीविष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है । इसको पढ़ने और सुनने से सहस्र गौदान का फल मिलता है ।
जय श्री राधे कृष्णा जी

क्यों रखें एकादशी व्रत आध्यात्मिक रहस्य और पौराणिक विधान

अचला (अपरा) एकादशी व्रत 13 मई 2026 बुधवार (ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी)

हर स्वस्थ सनातनी को एकादशी व्रत अवश्य करना चाहिए।
व्रत न कर सकें तो एक दिन पहले शाम से चावल का त्याग करें, श्रीहरि विष्णु की कृपा से सुख-समृद्धि प्राप्त होगी
एकादशी के महत्त्व के बारे में शास्त्र-प्रमाण

नमो नमस्ते गोविन्द बुधश्रवणसंज्ञक ॥
अघौघसंक्षयं कृत्वा सर्वसौख्यप्रदो भव ।
भुक्तिमुक्तिप्रदश्चैव लोकानां सुखदायकः ॥

संस्कृत शब्द एकादशी का शाब्दिक अर्थ ग्यारह होता है। एकादशी प्रत्येक पक्ष (चन्द्र मास) के ग्यारहवें दिन आती है। एक चन्द्र मास में चन्द्रमा अमावस्या से पूर्णिमा तक बढ़ता है (शुक्ल पक्ष) और फिर पूर्णिमा से अमावस्या तक घटता है (कृष्ण पक्ष)।

इस प्रकार हर चन्द्र मास में दो एकादशी आती हैं—
शुक्ल पक्ष की एकादशी
कृष्ण पक्ष की एकादशी

शास्त्रों में बताया गया है कि प्रत्येक वैष्णव को एकादशी का व्रत करना चाहिए। यह व्रत भक्ति, मन-शुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति के लिए अत्यंत लाभकारी माना गया है।

पद्म पुराण में एकादशी के महत्त्व का वर्णन मिलता है। कथा के अनुसार, भगवान श्री विष्णु ने जीवों के कल्याण हेतु एक विशेष शक्ति के रूप में एकादशी देवी को प्रकट किया।
एकादशी के प्रभाव से जीव अपने पापों से मुक्त होकर भगवद्भक्ति की ओर अग्रसर होने लगता है।
शास्त्रों में यह भी वर्णित है कि एकादशी के दिन अन्न (विशेषकर चावल ) का त्याग करना चाहिए, क्योंकि इस दिन अन्न में नकारात्मकता का प्रभाव माना गया है। इसलिए साधक इस दिन अन्न त्यागकर व्रत रखते हैं और भगवान श्री विष्णु की उपासना करते हैं।

एकादशी के दिन यथाशक्ति उपवास रखें
निर्जल व्रत सर्वोत्तम माना गया है, लेकिन सभी के लिए अनिवार्य नहीं
फलाहार या एक समय सात्त्विक आहार भी किया जा सकता है
इस दिन अन्न (विशेषकर चावल, गेहूं आदि) का त्याग करें
भगवान श्री विष्णु का पूजन, जप, कीर्तन और ध्यान करें

शास्त्रों में एकादशी व्रत को अत्यंत पुण्यदायक बताया गया है। कहा गया है कि—
यह व्रत पापों का क्षय करने वाला है
मन और इन्द्रियों को नियंत्रित करने में सहायक है
भगवान श्री विष्णु की कृपा प्राप्त करने का श्रेष्ठ साधन है
एकादशी का मुख्य उद्देश्य केवल उपवास करना नहीं, बल्कि भगवान के प्रति श्रद्धा, भक्ति और समर्पण को बढ़ाना है।

द्वादशी के दिन तुलसी पत्तों का चयन नहीं करना चाहिए
व्रत का पारण द्वादशी तिथि मे (हरि वासर) बीतने के बाद करना चाहिए

शुक्ल पक्ष हो या कृष्ण पक्ष हो, भरणी नक्षत्र हो या अन्य कोई भी कारण हो, भगवान्‌ श्री हरि का प्रेम और उनके धाम की प्राप्ति करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति के लिए एकादशी को उपवास रखना आवश्यक हैं।

उपवास का अर्थ भोजन छोड़ना नहीं, बल्कि प्रभु के ‘निकट’ निवास करना है। इस एकादशी, केवल शरीर को ही नहीं, अपने मन को भी श्री हरि के चरणों में अर्पित करें। क्योंकि जो अंतर्मन से अच्युत का हो जाता है, उसकी उन्नति अचल हो जाती है।

।। जय श्री हरि ।।

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Author: sssrknews

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