किसने दिया इन्हें हमारी जिंदगी का फैसला करने का हक ⁉️
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आज जब हम ऐसी तस्वीरें देखते हैं जहाँ कुछ रसूखदार लोग यह तय करने की बात करते हैं
कि
कौन “उपयोगी” है और कौन “बेकार”, तो कलेजा फटने लगता है…।
लेकिन सवाल यह नहीं है कि ये लोग कौन हैं, सवाल यह है कि हमने इन्हें अपनी गर्दन पकड़ने का मौका दिया और कैसे…?
आठ सौ करोड़ की आबादी वाली इस दुनिया में, मुट्ठी भर लोग पूरी इंसानियत का भविष्य लिखने का दुस्साहस इसलिए कर रहे हैं
क्योंकि
हमने अपनी ‘आज़ादी’ को किश्तों में उनके हाथों बेच दिया है…।
हमारी सबसे बड़ी गलतियां- हमने क्या खोया…?
इन्हें ‘भगवान’ बनने का मौका आसमान से नहीं मिला, बल्कि हमारी अपनी छोटी-छोटी गलतियों और आलस ने इन्हें यह सिंहासन दिया है ।
मिट्टी से गद्दारी-
हमने अपनी उपजाऊ खेती छोड़ दी और शहरों की कंक्रीट वाली ‘डिजिटल जेलों’ में जाकर बस गए। जो किसान कल तक पूरी दुनिया का पेट भरता था, आज वह खुद बाज़ार से हाइब्रिड बीज और केमिकल वाला अनाज खरीदने पर मजबूर है।
मेहनत से मुंह मोड़ना-
हमने पसीने की कमाई और शारीरिक मेहनत को ‘पिछड़ापन’ समझ लिया। हम फ्लैटों में कैद हो गए, जहाँ हमारी धूप, हमारी हवा और हमारा पानी भी अब ‘मीटर’ और ‘कंपनियों’ के कंट्रोल में है।
परंपराओं का गला घोंटना-
हमने अपनी कच्ची घानी का तेल, गुड़, बाजरा और आयुर्वेद को ‘पुराना’ कहकर त्याग दिया।
बदले में हमने रिफाइंड तेल और डिब्बाबंद ज़हर को ‘स्टेटस सिंबल’ मान लिया।
अंधी निर्भरता (Dependency)-
आज हम अपनी एक छींक के लिए भी उनकी दवाइयों(गोलियां और इंजेक्शन) के मोहताज हैं। हमने अपना स्वास्थ्य, अपनी शिक्षा और अपना डेटा—सब कुछ उन कॉर्पोरेट घरानों को सौंप दिया है जिन्हें हमारी जान से ज़्यादा अपने ‘प्रॉफिट मार्जिन’ की फ़िक्र है।
कौन हैं ये ‘ठेकेदार’?
ये वो लोग हैं जिन्हें किसी ने नहीं चुना।
ये न तो आपके प्रतिनिधि हैं और
न ही ईश्वर के दूत।
ये वो ‘ग्लोबल एलीट्स’ हैं जिनके पास सिर्फ पैसा है और उस पैसे के दम पर ये सरकारों, वैज्ञानिकों और मीडिया को खरीद चुके हैं…।
इनके लिए इंसान ‘इंसान’ नहीं, बल्कि सिर्फ एक ‘डेटा पॉइंट’ या ‘यूज़लेस क्लास’ (बेकार वर्ग) है।
ये तय करना चाहते हैं कि आपकी थाली में क्या होगा, आपके खून में कौन सा इंजेक्शन लगेगा और आपकी जेब में डिजिटल करेंसी कितनी होगी।
यह “पब्लिक हेल्थ” नहीं, बल्कि “पब्लिक कंट्रोल” का सबसे बड़ा ब्लूप्रिंट है।
अब बचाव का रास्ता-वापस जड़ों की ओर लौटो…!
अगर हमें अपनी और अपनी आने वाली पीढ़ियों की ‘इंसानियत’ को बचाना है, तो हमें उस निर्भरता को तोड़ना होगा जिससे ये ताकत पाते हैं,
आत्मनिर्भरता (Self-Sufficiency)-
अपनी खेती और अपने भोजन पर वापस कब्ज़ा कीजिये…।
अगर संभव हो तो अपनी सब्जियां खुद उगाएं या सीधे जैविक (Organic) किसान से जुड़ें। बाज़ार के ज़हर को अपनी रसोई से बाहर निकालें।
अपने शरीर को अभेद किला बनाइये-
अपनी इम्यूनिटी को इनकी ‘वैक्सीन’ के भरोसे नहीं, बल्कि धूप, मिट्टी, योग और शुद्ध खान-पान के दम पर मज़बूत करें। अस्पताल जाने की नौबत ही न आए, ऐसी जीवनशैली अपनाएं।
भीड़ का हिस्सा न बनें-
शहरों की अंधी दौड़ और दिखावे वाली सुख-सुविधाओं के लालच में अपनी आज़ादी मत बेचिये।
सादगी ही वह ढाल है जिससे ये ग्लोबल माफिया सबसे ज़्यादा डरता है।
जागरूकता फैलाएं-
सवाल पूछना शुरू करें….। जब तक आप चुप रहेंगे, ये आपको ‘यूज़लेस’ समझते रहेंगे।
जिस दिन ८०० करोड़ लोग खड़े होकर यह पूछेंगे कि “तुम होते कौन हो हमारे भाग्य का फैसला करने वाले?”
उसी दिन इनकी सत्ता की ईंट से ईंट बज जाएगी।
इंसानियत कोई मशीन नहीं है जिसे कोई सॉफ्टवेयर अपडेट कर दे। हम ईश्वर की रचना हैं, किसी कंपनी का ‘प्रॉडक्ट’ नहीं। जाग जाइये, इससे पहले कि आपकी ‘सांसों’ पर भी ये लोग टैक्स लगा दें।
आज़ादी का रास्ता वापस अपनी मिट्टी की ओर जाता है। लौट आइये, अभी भी वक्त है…!
बहुत गंभीर समस्या है.
साभार: सोशल मीडिया
“जय जय सियाराम”
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