Daily panchang,सनातन धर्म के 16 संस्कार कौन कौन से हैं एवं घर परिवार में सुख समृद्धि के क्या करें घर के क्लेश से कैसे बचेंगे
दिनांक – 21 मई 2026
⛅दिन – गुरुवार
⛅विक्रम संवत् – 2083
⛅अयन – उत्तरायण
⛅ऋतु – ग्रीष्म
⛅मास – अधिक ज्येष्ठ
⛅पक्ष – शुक्ल
⛅तिथि – पंचमी सुबह 08:26 तक तत्पश्चात् षष्ठी
⛅नक्षत्र – पुष्य मध्यरात्रि 02:49 तक तत्पश्चात् अश्लेशा
⛅योग – गण्ड सुबह 10:58 तक तत्पश्चात् वृद्धि
⛅राहुकाल – दोपहर 02:04 से दोपहर 03:44 तक
⛅सूर्योदय – 05:43
⛅सूर्यास्त – 07:04
दिशा शूल – दक्षिण दिशा में
सनातन धर्म के 16 संस्कार कौन कौन से हैं एवं घर परिवार में सुख समृद्धि के क्या करें घर के क्लेश से कैसे बचें आओ जानें
भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म में मानव जीवन को पवित्र, सुसंस्कृत और मर्यादित बनाने के लिए 16 संस्कारों का विधान है। ये संस्कार जन्म से पहले शुरू होकर मृत्यु के बाद तक चलते हैं।
जन्मकुंडली में ग्यारवे स्थान में बेठे शनि संतान को कष्ट देते है
जबकि आय पूरे जीवन अच्छी रहती है
व्यक्ति की जन्मकुण्डली में ग्यारवे स्थान का शनि संतान सुख की कमी करता है ।सन्तान या तो दूर रहती है या पास रहकर भी मतभेद रहते है
उपाय :- घर की पश्चिम दिशा में तांबे के लोटे में सिक्के भरकर रखे।
जन्मकुंडली परामर्श के लिए सम्पर्क करें
ऋषियों के अनुसार, संस्कारों का उद्देश्य व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास को सही दिशा देना है।
1. गर्भावस्था एवं जन्म से पूर्व के संस्कार
* *गर्भाधान: * सुयोग्य संतान की प्राप्ति के लिए किया जाने वाला प्रथम संस्कार।
* *पुंसवन: * गर्भस्थ शिशु के मानसिक विकास और स्वास्थ्य के लिए, आमतौर पर तीसरे महीने में।
* *सीमन्तोन्नयन: * गर्भवती स्त्री को मानसिक रूप से प्रसन्न और शांत रखने के लिए (आमतौर पर छठे या आठवें महीने में)।
2. बाल्यावस्था के संस्कार
* *जातकर्म: * शिशु के जन्म के समय बुद्धि और स्वास्थ्य की प्रार्थना के साथ शहद और घी चटाना।
* *नामकरण: * जन्म के 11वें या 12वें दिन शिशु का नाम रखना।
* *निश्रमण: * शिशु को पहली बार घर से बाहर निकालना और प्रकृति (सूर्य/चंद्रमा) के दर्शन कराना।
* *अन्नप्राशन: * छठे माह में शिशु को पहली बार ठोस आहार (खीर/अन्न) खिलाना।
* *चूड़ाकर्म (मुंडन): * सिर के बाल पहली बार कटवाना ताकि शुद्धि और मस्तिष्क की सुरक्षा हो सके।
* *कर्णवेध: * कान छिदवाना, जो स्वास्थ्य (एक्यूपंक्चर लाभ) और आभूषण के लिए किया जाता है।
3. शिक्षा एवं किशोरावस्था के संस्कार
* *विद्यारंभ: * बालक को अक्षरों का ज्ञान कराना।
* *उपनयन (यज्ञोपवीत): * जनेऊ धारण करना; यहाँ से बालक का आध्यात्मिक और औपचारिक शिक्षण शुरू होता है।
* *वेदारंभ: * वेदों और शास्त्रों के अध्ययन की शुरुआत।
* *केशांत: * किशोरावस्था में पहली बार दाढ़ी-मूंछ की सफाई (गुरुकुल में ब्रह्मचर्य के दौरान)।
* *समावर्तन: * शिक्षा पूरी होने के बाद गुरुकुल से विदा लेकर घर लौटना (स्नातक समारोह)।
4. गृहस्थ एवं अंत्येष्टि संस्कार
* *विवाह: * युवावस्था में धर्म के मार्ग पर चलने और वंश वृद्धि के लिए गृहस्थ आश्रम में प्रवेश।
* *अंत्येष्टि: * जीवन का अंतिम संस्कार, जिसमें शरीर को पंचतत्व में विलीन किया जाता है।
विशेष:* हिंदू धर्मशास्त्रों (जैसे मनुस्मृति और गौतम धर्मसूत्र) में इन संस्कारों का क्रम और महत्व विस्तार से बताया गया है। आधुनिक समय में नामकरण, यज्ञोपवीत, विवाह और अंत्येष्टि सबसे प्रमुखता से मनाए जाते हैं।
अगर आपक़ो गृहस्थ जीवन में आ रही है परेशानी या शादी को नहीं बचा पा रहे हैं आज ही हमसे सम्पर्क करें
पति पत्नी और सप्तम भाव
आपके पास बहुत पैसा है अपना बहुत अच्छा व्यापार है बहुत अच्छा मान सम्मान है बहुत अच्छे जिंदगी है लेकिन पति पत्नी के बीच में हरदम क्लेश हो तो पूरा जीवन बर्बाद हो जाता है।
आज हम बात करते हैं कुंडली के सप्तम भाव की जो कि हर जातक के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है स्त्री हो या पुरुष सप्तम भाव हमारा जीवन में पति-पत्नी का घर होता है। अगर सातवां घर शुभ है या शुभ ग्रह बैठा है तो जीवन बहुत सुख से बीतता है।
सप्तम भाव लग्न कुडंली में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है, लग्न से सातवाँ भाव ही दाम्पत्य व विवाह के लिए कारक माना है। इस भाव एवं इस भाव के स्वामी के साथ ग्रहों की स्थिति व दृष्टि संबंध के अनुसार उस जातक पर शुभ-अशुभ प्रभाव पड़ता है।
सप्तम भाव विवाह एवं जीवनसाथी का घर माना जाता है। इस भाव में शनि का होना विवाह और वैवाहिक जीवन के लिए शुभ संकेत नहीं माना जाता है।
इस भाव में शनि की स्थिति होने पर व्यक्ति की शादी सामान्य आयु से देरी से होती है।
सप्तम भाव में शनि अगर नीच राशि में हो तो तब यह संभावना रहती है कि व्यक्ति काम पीड़ित होकर किसी ऐसे व्यक्ति से विवाह करता है जो उम्र में उससे अधिक बड़ा हो।
शनि सप्तम भाव में हो तो विवाह देर से होता है अगर जल्दी से हो गया तो कलह से घर अशांत रहता है।
चन्द्रमा के साथ शनि की युति होने पर व्यक्ति अपने जीवनसाथी के प्रति प्रेम नहीं रखता एवं किसी अन्य के प्रेम में गृह कलह को जन्म देता है।
सप्तम शनि एवं उससे युति बनाने वाले ग्रह विवाह एवं गृहस्थी के लिए सुखकारक नहीं होते हैं।
नवमांश कुडंली या जन्म कुडंली में जब शनि हो तो शादी 30 वर्ष की आयु के बाद ही करनी चाहिए क्योकि इससे पहले शादी की संभावना नहीं बनती है।
जिनकी कुडंली शनि लग्न में उनके साथ भी यही स्थिति होती है एवं इनकी शादी असफल होने की भी संभावना प्रबल रहती है।
कुडंली में लग्न स्थान से शनि द्वादश होता है और सूर्य द्वितीयेश होता है एवं लग्न कमजोर हो तो उनकी शादी बहुत विलंब से होती है अथवा ऐसी स्थिति बनती है कि ऐसे व्यक्ति शादी नहीं करते।
शनि जिस वधु की कुडंली में सूर्य या चन्द्रमा से युत या दृष्ठ होकर लग्न या सप्तम में होते हैं उनकी शादी में भी बाधा रहती है।
जिन जातकों की लग्न कुंडली में शनि सातवें घर में हो या नवमांश कुंडली में भी सातवें भाव में हो तो ऐसे जातक को शनि के उपाय जरूर करें
सातवें घर का शनी जातक को वैराग्य दे देता है गृहस्थी जीवन से मन उठने लग जाता है ।
शादी तो हो जाती है लेकिन पति पत्नी के रिश्ते से मन दूर होने लगता है।
अगर किसी भी स्त्री पुरुष को इस तरह की बाधाये जीवन में आ रही हैं तो आप शनि के उपचार करें और एक अच्छा जीवन आप शुरू कर सकते हैं।
नोट
समय पर जन्मकुडंली के अनुसार उपाय करना लाभभदायक रहता है।
21 मई को करें तुलसीदल और कनेर फूल का अचूक उपाय, खुलेंगे धन-समृद्धि के द्वार
बाल काले व मजबूत बनाने के लिए
नींबू रस और आँवला रस मिलाकर सिर पर लगा दो अथवा तो केवल आँवले का रस लगा दो। 15 – 20 मिनट बाद नहाओ तो आँवले का रस सिर की गर्मी खींच लेगा। बाल जल्दी सफेद नहीं होंगे और बालों की जड़ें कमजोर नहीं होंगी, बाल बने रहेंगे। यदि आँवले का रस नहीं मिले तो आँवले के चूर्ण को रात को पानी में भिगो दो और सुबह उसी का उपयोग कर लो।
वास्तु शास्त्र
बिना स्नान किये किचन में प्रवेश करने से किचन में नेगेटिव एनर्जी आती है और घर के सदस्यों में चिड़चिड़ापन और आलस्य बढ़ता हैं।
धन, आरोग्य एवं शांति की प्राप्ति के लिए
जो व्यक्ति चतुर्मास में अथवा अधिक (पुरुषोत्तम) मास में भगवान् विष्णु पर कनेर के पुष्प अर्पित करता है, उस पर लक्ष्मीजी की सदैव कृपा बनी रहती है | उसे आरोग्य एवं शांति की प्राप्ति होती है तथा उसके संकट दूर होते है |
शास्त्रों में भगवान के 24 अवतारो का वर्णन मुख्य रूप से आता है इन 24 अवतारों की उपासना अलग-अलग कार्य की सिद्धि के लिए की जाती है। जिस अवतार में जिस गुण की प्रधानता रहती उस गुण से संबंधित कार्य उस अवतार की उपासना से जल्दी सिद्ध होते हैं।
यहां पर 24 अवतार और की उपासना किसी विशेष कार्य के लिए की जा सकती है उसकी चर्चा करेंगे…
1. सनकादि अवतार : ब्रह्म ज्ञान
2. वराह अवतार : भूमि संबंधित समस्या
3. नारद अवतार : अखंड भक्ति, ज्योति ज्ञान, पंचरात्र विधि सिद्धि के लिए।
4. नर नारायण अवतार : तपस्या की सिद्धि के लिए।
5. कपिल अवतार : सांख्य योग ज्ञान
6. दत्तात्रेय अवतार : अवधूत ज्ञान, तंत्र मंत्र का ज्ञान।
7. यज्ञ अवतार : संपूर्ण मनोकामना
8. ऋषभ अवतार : ब्रह्म ज्ञान
9. पृथु अवतार : कृषि संबंधित समस्या
10. मत्स्य अवतार : लुप्त होती चीजो की
रक्षा के लिए।
11. कूर्म अवतार : स्थिरता के लिए
12. धनवंतरी अवतार: आरोग्यता की प्राप्ति के लिए।
13. मोहिनी अवतार: रूप सौंदर्य व आकर्षण की प्राप्ति के लिए।
14. भगवान नरसिंह: शत्रु विजय, तंत्र-मंत्र आदि सुरक्षा के लिए।
15. वामन अवतार : सब जगह से हार जाने के बाद अंतिम शरण।
16. हयग्रीव अवतार : विद्या प्राप्ति के लिए।
17. बलराम अवतार : पराक्रम प्राप्ति
18. परशुराम अवतार : शस्त्र विद्या के ज्ञान के लिए और पराक्रम की प्राप्ति के लिए।
19. वेदव्यास अवतार : शास्त्र ज्ञान के लिए।
20. हंस अवतार: मोक्ष धर्म के ज्ञान के लिए।
21. श्री राम अवतार : सभी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए।
22. श्री कृष्ण अवतार : सभी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए।
23. बुद्ध अवतार : बुद्धत्व की प्राप्ति के लिए।
24. कल्कि अवतार : कलियुग के दोषो से रक्षा के लिए।






