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हवन यज्ञ से रोगों का उपचार एवं श्रीरामरक्षा स्तोत्र का दिव्य महत्व, पाठ और अनुवाद या

हवन यज्ञ के द्वारा विविध रोगों की यज्ञोपचार प्रक्रिया क्या है एवं श्रीरामरक्षा स्तोत्र पाठ-अनुवाद आओ जानें

अथर्ववेद के तीसरे काँड के ‘दीर्घायु प्राप्ति’ नामक 11वें सूक्त में ऐसे अनेक प्रयोगों का उल्लेख है, जिनमें यज्ञाग्नि में औषधीय सामग्री का हवन करके कठिन-से-कठिन रोगों का निवारण एवं जीवनी शक्ति का संवर्द्धन किया जा सकता है। इसी सूक्त में उल्लेख है।

यदि क्षितायुर्यदि व परेतो यदि मृत्योरन्तिकं नीत एव।
तमा हरामि निऋतेरुपस्थादस्पार्शमेनं शतशारदाय॥
अर्थात् यदि व्यक्ति की आयु क्षीण हो गई हो, जीवनी शक्ति समाप्त हो गई हो और वह मरणासन्न हो, तो भी यज्ञ चिकित्सा के माध्यम से वह व्यक्ति रोग के चंगुल से छूट जाता है और सौ वर्ष तक जीवित रहने की शक्ति प्राप्त करता है।

सभी जानते हैं कि हृष्ट-पुष्ट शरीर न केवल रोगों से सुरक्षित रहता है, वरन् जीवन के सारे आनंद निरोग एवं पुष्ट शरीर वाला मनुष्य ही भोगता है। हवन में जो औषधीय एवं पुष्टिकारक पदार्थ डाले जाते हैं, उनके सूक्ष्म परमाणु शरीर में पहुँचकर उसे परिपुष्ट बनाते हैं। पुष्टिकारक एवं रोगनिवारक औषधियों-पदार्थों का खाना भी काया को बल प्रदान करता है, अतः इन्हें अवश्य खाया जाना चाहिए, परंतु उससे भी अधिक उपयोगी इनका हवन कर उससे उत्पन्न यज्ञीय ऊर्जा का लाभ उठाना है। हवन में दो गुण विशेष हैं- प्रथम यह कि खाने में संभव है कि एक साथ अधिक पौष्टिक पदार्थों का सेवन कर लेने पर लाभ के स्थान पर हानि उठानी पड़े, परंतु हवन के साथ यह समस्या नहीं रहती। उसके सूक्ष्म परमाणु सीधे रक्तप्रवाह में पहुँचते हैं और पाचन शक्ति पर कोई बोझ नहीं डालते। तभी तो पुत्रेष्टि यज्ञ में जब खाने के पदार्थों से वीर्य पुष्ट नहीं होता और अधिक खाने से पाचन शक्ति बिगड़ती है, उस समय हवन यज्ञ में डाले गए पौष्टिक पदार्थों के सूक्ष्म परमाणु सीधे रक्त में पहुँचकर आँतरिक शोधन करते हैं और मनवाँछित परिणाम प्रस्तुत करते हैं। दूसरे यज्ञीय ऊर्जा से परिमार्जित वस्तुओं की स्वच्छता एवं स्थिरता बढ़ जाती है। शारीरिक-मानसिक रुग्णता को हटाने-मिटाने में यज्ञ चिकित्सा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

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सर्वप्रथम पाचन तंत्र से संबंधित कुछ रोगों के लिए विशेष हवन सामग्री का वर्णन किया जा रहा है, क्योंकि समस्त रोगों का उद्भव पाचन तंत्र की गड़बड़ी पर निर्भर करता है।

लीवर (यकृत) एवं तिल्ली तथा उससे संबंधित रोगों के लिए विशेष हवन सामग्री का उल्लेख अखण्ड ज्योति के पिछले अंक में किया जा चुका है। यहाँ आम उदर रोगों जैसे अपच, वमन, डायरिया, हैजा, बवासीर आदि को दूर करने के लिए प्रयुक्त होने वाली विशेष हवन सामग्री का वर्णन किया जा रहा है। इसके साथ पूर्व वर्णित हवन सामग्री-’नंबर एक’ अर्थात् (1) अगर, (2) तगर (3) देवदार (4) चंदन (5) रक्त चंदन (6) गुग्गुल (7) लौंग (8) जायफल (9) चिरायता और (10) असगंध को भी बराबर मात्रा में मिलाकर तब हवन किया जाता है। यज्ञोपचार का पूर्ण लाभ तभी मिलता है।

(2) अपच अर्थात् भोजन न पचना एवं संबंधित रोगों के लिए विशेष हवन सामग्री-

अपच के लिए निम्नाँकित औषधियों को बराबर मात्रा में लेकर तैयार किया जाता है-

(1) तालीसपत्र (2) तेजपत्र (3) पोदीना (4) हरड़ (5) अमलतास (6) नागकेसर (7) कालाजीरा (8) सफेद जीरा।

हवन करने के साथ ही उपर्युक्त आठों चीजों के कपड़छन चूर्ण को मिलाकर सुबह-शाम एक-एक चम्मच मट्ठा या जल के साथ रोगी को खिलाने से शीघ्र लाभ मिलता है।

(3) वमन अर्थात् कै, उल्टी तथा संबंधित रोगों के लिए विशेष हवन सामग्री-

इसके लिए निम्नलिखित चीजों को मिलाकर हवन सामग्री तैयार की जाती है-

(1) वायविडंग (2) पीपल (3) छोटी पिप्पली (4) ढाक या पलाश के बीज या सूखे फल (5) गिलोय (6) निशोथ (7) नींबू की जड़ या सूखे फल (8) आम की गुठली (9) प्रियंगु (10) धाय के बीज

उक्त सभी दस चीजों के महीन छने हुए चूर्ण को सुबह-शाम एक-एक चम्मच शहद से खिलाना भी चाहिए।

(4) उदर रोग के लिए विशेष हवन सामग्री-

इसके लिए जिन औषधियों को हवन सामग्री बनाने में प्रयुक्त करते हैं, उनके नाम इस प्रकार हैं-

(1) चव्य (2) चित्रक (3) तालीस पत्र (4) दालचीनी (5) आलूबुखारा (6) छोटी पिप्पली।

हवन करने के साथ-साथ इन छह चीजों को मिलाकर बनाए गए सूक्ष्म चूर्ण को एक-एक चम्मच जल के साथ सुबह-शाम रोगी को खिलाते रहना चाहिए।

(5) दस्त, डायरिया एवं संबंधित रोगों के लिए प्रयुक्त होने वाली विशेष हवन सामग्री-

(1) सफेद जीरा (2) दालचीनी (3) अजमोद (4) चित्रक (5) बेलगिरी (6) अतीस (7) सोंठ (8) तालमखाना (9) ईसबगोल (10) मौलश्री की छाल (11) तालमखाना (12) छुआरा।

उपर्युक्त सभी बारह चीजों को हवन के साथ ही सूक्ष्म चूर्ण बनाकर घोट-पीस एवं कपड़े से छानकर एक-एक चम्मच सुबह शाम दही या मट्ठे के साथ रोगी को पिलाते रहना चाहिए। जब दस्त लग रहे हों, तो परहेज का, पथ्यापथ्य का विशेष ध्यान रखा जाता है। ऐसी स्थिति में दूध व दूध से बने मीठे पदार्थ, तली-भुनी चीजें एवं गरिष्ठ चीजें नहीं देनी चाहिए।

(6) हैजा की विशेष हवन सामग्री

(1) धनिया (2)कासनी (3) सौंफ (4) कपूर (5) चित्रक।

इन्हीं पाँचों हव्य पदार्थों के सूक्ष्म पाउडर को हवन के साथ-साथ एक-एक चम्मच सुबह-शाम खिलाते रहना चाहिए।

(7) आँव-पेचिश आदि के लिए विशेष हवन सामग्री

(1) मरोड़फली (2) अनारदाना (3) पोदीना (4) आम की गुठली (5) कतीरा।

हवन के साथ-साथ उक्त पाँचों के महीन चूर्ण को जल के साथ एक-एक चम्मच सुबह-सायं रोगी को खिलाते रहने से द्विगुणित लाभ मिलता है।

(8) पाइल्स अर्थात् बवासीर, अर्श एवं तत्संबंधित रोगों के लिए विशिष्ट हवन सामग्री-

खान-पान की गड़बड़ी से प्रायः कब्ज बने रहने एवं अमीबायोसिस आदि के कारण यह बीमारी अधिकाँश लोगों में पाई जाती है। शुष्क एवं रक्तार्श दोनों ही स्थितियों में निम्नलिखित औषधियों से बनी हवि सामग्री अत्यंत उपयोगी सिद्ध होती है।

(1) नागकेशर (2) हाऊबेर (3) धमासा (4) दारुहल्दी (5) नीम की गुठली (निमोनी) (6) मूली के बीज (7) जावित्री (8) कमल केशर (9) गूलर के फूल।

इन सभी नौ चीजों को मिलाकर बारीक चूर्ण करके कपड़े से छान लेना चाहिए और हवन के साथ सुबह-शाम एक-एक चम्मच जल के साथ रोगी व्यक्ति को खिलाते रहना चाहिए।

असह्य पीड़ा की स्थिति में निम्नलिखित औषधियों की धूप भी दी जा सकती है। इस संबंध में वृहत् निघंटु-10, में उल्लेख है-

अश्वगंधोऽथ निर्गुण्डी वृहती पिप्पली फलम्। धूपोऽयं र्स्पशमात्रेण र्ह्यशसं शमने ह्यलम्॥

अर्थात् अश्वगंधा, निर्गण्डी, बड़ी कटेरी (कंटकारी), एवं पिप्पली, इन्हें अग्नि में जलाकर धूप देने से बवासीर-अर्श की पीड़ा शाँत होती है।

भावप्रकाश, निघंटु एवं अन्यान्य आयुर्वेद ग्रंथों में विभिन्न रोगों के लिए यज्ञोपचार में प्रयुक्त होने वाली कितनी ही वनौषधियों का वर्णन किया गया है। उनमें से हवन सामग्री में काम आने वाली कुछ प्रमुख वनौषधियों के नाम इस प्रकार हैं-ब्राह्मी, शतावरी, अश्वगंधा, विधारा, जटामाँसी, मंडूकपर्णी, शालपर्णी, इंद्रायण की जड़, मकोय, अड़ूसा, गुलाब के फूल, अगर, तगर, रास्ना, क्षीरकाकोली, पंडरी, प्रोक्षक, तालमखाना, बादाम, मुनक्का, जायफल, जावित्री, बड़ी इलायची, बड़ी हरड़, आँवला, बहेड़ा, छोटी पीपल, पुनर्नवा, नगेंद्र वामड़ी, चीड़ का बुरादा, गिलोय, चंदन, कपूर, केशर, गुग्गल, पानड़ी, मोथा, चिरायता, पितपापड़ा आदि। हवन सामग्री बनाने के लिए इन सभी औषधियों को बराबर मात्रा में लिया जाता है तथा इनका दसवाँ भाग शक्कर एवं आठवाँ भाग शहद डालकर गोघृत में लड्डू बनाकर सूर्य गायत्री मंत्र से हवन किया जाता है।

(9) विष निवारण की विशिष्ट हवन सामग्री-

(1) वन तुलसी के बीज (2) अपामाग्र (3) इंद्रायण की जड़ (4) करंज की गिरी (5) दारुहल्दी (6) चौलाई के पत्ते (7) विनौला गिरी (8) लाल चंदन।

हवन के साथ ही इन्हीं आठ चीजों को मिलाकर बारीक चूर्ण बनाकर सुबह-शाम एक-एक चम्मच जल के साथ देते रहने से तत्काल लाभ मिलता है।

यज्ञ-हवन से रोगोपचार की महिमा अनंत है। आवश्यकता मात्र औषधि चयन, नियमितता एवं भाव-श्रद्धा की गहनता की त्रिवेणी के समन्वय की है। औषधि चयन के संदर्भ में आयुर्वेद ग्रंथों में कहा भी गया है-

सुरभीणि सुपुष्टेश्च कारकाणि सितादिकम्।
द्रव्यारामादाय जुहुयाच्चतुर्थं रोगनाशकम्॥

अर्थात् सुगंधित, पुष्टिकारक, मधुर एवं रोगनाशक चार प्रकार के पदार्थों का हवन करने से नानाप्रकार के रोगों का निवारण होता।

श्रीरामरक्षा स्तोत्र {पाठ-अनुवाद}

श्रीरामरक्षा स्तोत्र सभी तरह की विपत्तियों से व्यक्ति की रक्षा करता है। इस स्तोत्र का पाठ करने से मनुष्य भय रहित हो जाता है। एक कथा है कि भगवान शंकर ने बुधकौशिक ऋषि को स्वप्न में दर्शन देकर, उन्हें रामरक्षास्तोत्र सुनाया और प्रातःकाल उठने पर उन्होंने वह लिख लिया। यह स्तोत्र संस्कृत भाषा में है। इस स्तोत्र के नित्य पाठ से घर के कष्ट व भूतबाधा भी दूर होती है। जो इस स्तोत्र का पाठ करता है वह दीर्घायु, सुखी, संततिवान, विजयी तथा विनयसंपन्न होता है। रामरक्षा स्तोत्र का नियमित एक पाठ करने से शरीर रक्षा होती है। मंगल का कुप्रभाव समाप्त होता है। रामरक्षा स्तोत्र के प्रभाव से व्यक्ति के चारों और एक सुरक्षा कवच बन जाता है जिससे हर प्रकार की विपत्ति से रक्षा होती है। यदि गर्भवती स्त्री रोजाना इस स्तोत्र का पाठ करे तो इसके शुभ प्रभाव से गर्भ रक्षा होती है। स्वस्थ, सौभाग्यशाली एवं आज्ञाकारी संतान प्राप्त होती है। रामरक्षा स्तोत्र पाठ से भगवान राम के साथ पवनपुत्र हनुमान भी प्रसन्न होते हैं।

सर्पप्रथम हाथ में जल लेकर विनियोग मंत्र बोलें-

विनियोग अस्य श्री रामरक्षा स्तोत्र मंत्रस्य बुधकौशिक ऋषिः श्रीसीतारामचंद्रो देवता अनुष्टुप छंदः सीता शक्तिः श्रीमान हनुमान कीलकम श्री रामचंद्र प्रीत्यर्थे रामरक्षा स्तोत्रजपे विनियोगः।

जल को जमीन पर छोड़ दें।

अब इस ध्यान मंत्र से श्री राम के दिव्य स्वरुप का चिंतन करें।

ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपदमासनस्थं पीतं वासो वसानं नवकमल दल स्पर्धिनेत्रम् प्रसन्नम। वामांकारूढ़ सीता मुखकमलमिलल्लोचनम् नीरदाभम् नानालंकारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डलम् रामचंद्रम ।।

॥ श्रीरामरक्षास्तोत्रम्‌ ॥
॥ श्रीगणेशायनम:॥

अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य ।

बुधकौशिक ऋषि: ।

श्रीसीतारामचंद्रोदेवता ।

अनुष्टुप्‌ छन्द: । सीता शक्ति: ।

श्रीमद्‌हनुमान्‌ कीलकम्‌ ।

श्रीसीतारामचंद्रप्रीत्यर्थे जपे विनियोग: ॥

अर्थ: — इस राम रक्षा स्तोत्र मंत्र के रचयिता बुध कौशिक ऋषि हैं, सीता और रामचंद्र देवता हैं, अनुष्टुप छंद हैं, सीता शक्ति हैं, हनुमान जी कीलक है तथा श्री रामचंद्र जी की प्रसन्नता के लिए राम रक्षा स्तोत्र के जप में विनियोग किया जाता हैं |

॥ अथ ध्यानम्‌ ॥

ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्दद्पद्‌मासनस्थं ।
पीतं वासोवसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम्‌ ॥
वामाङ्‌कारूढसीता मुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं ।
नानालङ्‌कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डनं रामचंद्रम्‌ ॥

ध्यान करें👉 जो धनुष-बाण धारण किए हुए हैं,बद्द पद्मासन की मुद्रा में विराजमान हैं और पीतांबर पहने हुए हैं, जिनके आलोकित नेत्र नए कमल दल के समान स्पर्धा करते हैं, जो बाएँ ओर स्थित सीताजी के मुख कमल से मिले हुए हैं- उन आजानु बाहु, मेघश्याम,विभिन्न अलंकारों से विभूषित तथा जटाधारी श्रीराम का ध्यान करें।

॥ इति ध्यानम्‌ ॥

चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम्‌ ।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्‌ ॥१॥

श्री रघुनाथजी का चरित्र सौ करोड़ विस्तार वाला हैं। उसका एक-एक अक्षर महापातकों को नष्ट करने वाला है।

ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम्‌ ।
जानकीलक्ष्मणॊपेतं जटामुकुटमण्डितम्‌ ॥२॥

नीले कमल के श्याम वर्ण वाले, कमलनेत्र वाले , जटाओं के मुकुट से सुशोभित, जानकी तथा लक्ष्मण सहित ऐसे भगवान् श्री राम का स्मरण करके,

सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तं चरान्तकम्‌ ।
स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम्‌ ॥३॥

जो अजन्मा एवं सर्वव्यापक, हाथों में खड्ग, तुणीर, धनुष-बाण धारण किए राक्षसों के संहार तथा अपनी लीलाओं से जगत रक्षा हेतु अवतीर्ण श्रीराम का स्मरण करके।

रामरक्षां पठॆत्प्राज्ञ: पापघ्नीं सर्वकामदाम्‌ ।
शिरो मे राघव: पातु भालं दशरथात्मज: ॥४॥

मैं सर्वकामप्रद और पापों को नष्ट करने वाले राम रक्षा स्तोत्र का पाठ करता हूँ | राघव मेरे सिर की और दशरथ के पुत्र मेरे ललाट की रक्षा करें।

कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रिय: श्रुती ।
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सल: ॥५॥

कौशल्या नंदन मेरे नेत्रों की, विश्वामित्र के प्रिय मेरे कानों की, यज्ञरक्षक मेरे घ्राण की और सुमित्रा के वत्सल मेरे मुख की रक्षा करें।

जिव्हां विद्दानिधि: पातु कण्ठं भरतवंदित:।
स्कन्धौ दिव्यायुध: पातु भुजौ भग्नेशकार्मुक: ॥६॥

मेरी जिह्वा की विधानिधि रक्षा करें, कंठ की भरत-वंदित, कंधों की दिव्यायुध और भुजाओं की महादेवजी का धनुष तोड़ने वाले भगवान् श्रीराम रक्षा करें।

करौ सीतपति: पातु हृदयं जामदग्न्यजित्‌ ।
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रय: ॥७॥

मेरे हाथों की सीता पति श्रीराम रक्षा करें, हृदय की जमदग्नि ऋषि के पुत्र (परशुराम) को जीतने वाले, मध्य भाग की खर (नाम के राक्षस) के वधकर्ता और नाभि की जांबवान के आश्रयदाता रक्षा करें।

सुग्रीवेश: कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभु: ।
ऊरू रघुत्तम: पातु रक्ष:कुलविनाशकृत्‌ ॥८॥

मेरे कमर की सुग्रीव के स्वामी, हडियों की हनुमान के प्रभु और रानों की राक्षस कुल का विनाश करने वाले रघुश्रेष्ठ रक्षा करें।

जानुनी सेतुकृत्पातु जङ्‌घे दशमुखान्तक: ।
पादौ बिभीषणश्रीद: पातु रामोSखिलं वपु: ॥९॥

मेरे जानुओं की सेतुकृत, जंघाओं की दशानन वधकर्ता, चरणों की विभीषण को ऐश्वर्य प्रदान करने वाले और सम्पूर्ण शरीर की श्रीराम रक्षा करें।

एतां रामबलोपेतां रक्षां य: सुकृती पठॆत्‌ ।
स चिरायु: सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत्‌ ॥१०॥

शुभ कार्य करने वाला जो भक्त भक्ति एवं श्रद्धा के साथ रामबल से संयुक्त होकर इस स्तोत्र का पाठ करता हैं, वह दीर्घायु, सुखी, पुत्रवान, विजयी और विनयशील हो जाता हैं।

पातालभूतलव्योम चारिणश्छद्‌मचारिण: ।
न द्र्ष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभि: ॥११॥

जो जीव पाताल, पृथ्वी और आकाश में विचरते रहते हैं अथवा छद्दम वेश में घूमते रहते हैं , वे राम नामों से सुरक्षित मनुष्य को देख भी नहीं पाते।

रामेति रामभद्रेति रामचंद्रेति वा स्मरन्‌ ।
नरो न लिप्यते पापै भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥१२॥

राम, रामभद्र तथा रामचंद्र आदि नामों का स्मरण करने वाला रामभक्त पापों से लिप्त नहीं होता. इतना ही नहीं, वह अवश्य ही भोग और मोक्ष दोनों को प्राप्त करता है |

जगज्जेत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम्‌ ।
य: कण्ठे धारयेत्तस्य करस्था: सर्वसिद्द्दय: ॥१३॥

जो संसार पर विजय करने वाले मंत्र राम-नाम से सुरक्षित इस स्तोत्र को कंठस्थ कर लेता हैं, उसे सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं।

वज्रपंजरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत्‌ ।
अव्याहताज्ञ: सर्वत्र लभते जयमंगलम्‌ ॥१४॥

जो मनुष्य वज्रपंजर नामक इस राम कवच का स्मरण करता हैं, उसकी आज्ञा का कहीं भी उल्लंघन नहीं होता तथा उसे सदैव विजय और मंगल की ही प्राप्ति होती हैं।

आदिष्टवान्यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हर: ।
तथा लिखितवान्‌ प्रात: प्रबुद्धो बुधकौशिक: ॥१५॥

भगवान् शंकर ने स्वप्न में इस रामरक्षा स्तोत्र का आदेश बुध कौशिक ऋषि को दिया था, उन्होंने प्रातः काल जागने पर उसे वैसा ही लिख दिया।

आराम: कल्पवृक्षाणां विराम: सकलापदाम्‌ ।
अभिरामस्त्रिलोकानां राम: श्रीमान्‌ स न: प्रभु: ॥१६॥

जो कल्प वृक्षों के बगीचे के समान विश्राम देने वाले हैं, जो समस्त विपत्तियों को दूर करने वाले हैं (विराम माने थमा देना, किसको थमा देना/दूर कर देना ? सकलापदाम = सकल आपदा = सारी विपत्तियों को) और जो तीनो लोकों में सुंदर (अभिराम + स्+ त्रिलोकानाम) हैं, वही श्रीमान राम हमारे प्रभु हैं।

तरुणौ रूपसंपन्नौ सुकुमारौ महाबलौ ।
पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ॥१७॥

जो युवा,सुन्दर, सुकुमार,महाबली और कमल (पुण्डरीक) के समान विशाल नेत्रों वाले हैं, मुनियों की तरह वस्त्र एवं काले मृग का चर्म धारण करते हैं।

फलमूलशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ ।
पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥१८॥

जो फल और कंद का आहार ग्रहण करते हैं, जो संयमी , तपस्वी एवं ब्रह्रमचारी हैं , वे दशरथ के पुत्र राम और लक्ष्मण दोनों भाई हमारी रक्षा करें।

शरण्यौ सर्वसत्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम्‌ ।
रक्ष:कुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघुत्तमौ ॥१९॥

ऐसे महाबली – रघुश्रेष्ठ मर्यादा पुरूषोतम समस्त प्राणियों के शरणदाता, सभी धनुर्धारियों में श्रेष्ठ और राक्षसों के कुलों का समूल नाश करने में समर्थ हमारा त्राण करें।

आत्तसज्जधनुषा विषुस्पृशा वक्षया शुगनिषङ्‌ग सङि‌गनौ ।
रक्षणाय मम रामलक्ष्मणा वग्रत: पथि सदैव गच्छताम्‌ ॥२०॥

संघान किए धनुष धारण किए, बाण का स्पर्श कर रहे, अक्षय बाणों से युक्त तुणीर लिए हुए राम और लक्ष्मण मेरी रक्षा करने के लिए मेरे आगे चलें।

संनद्ध: कवची खड्‌गी चापबाणधरो युवा ।
गच्छन्‌मनोरथोSस्माकं राम: पातु सलक्ष्मण: ॥२१॥

हमेशा तत्पर, कवचधारी, हाथ में खडग, धनुष-बाण तथा युवावस्था वाले भगवान् राम लक्ष्मण सहित आगे-आगे चलकर हमारी रक्षा करें।

रामो दाशरथि: शूरो लक्ष्मणानुचरो बली ।
काकुत्स्थ: पुरुष: पूर्ण: कौसल्येयो रघुत्तम: ॥२२॥

भगवान् का कथन है की श्रीराम, दाशरथी, शूर, लक्ष्मनाचुर, बली, काकुत्स्थ , पुरुष, पूर्ण, कौसल्येय, रघुतम,

वेदान्तवेद्यो यज्ञेश: पुराणपुरुषोत्तम: ।
जानकीवल्लभ: श्रीमानप्रमेय पराक्रम: ॥२३॥
वेदान्त्वेघ, यज्ञेश,पुराण पुरूषोतम , जानकी वल्लभ, श्रीमान और अप्रमेय पराक्रम आदि नामों का।

इत्येतानि जपेन्नित्यं मद्‌भक्त: श्रद्धयान्वित: ।
अश्वमेधाधिकं पुण्यं संप्राप्नोति न संशय: ॥२४॥
नित्यप्रति श्रद्धापूर्वक जप करने वाले को निश्चित रूप से अश्वमेध यज्ञ से भी अधिक फल प्राप्त होता हैं।

रामं दूर्वादलश्यामं पद्‌माक्षं पीतवाससम्‌ ।
स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नर: ॥२५॥

दूर्वादल के समान श्याम वर्ण, कमल-नयन एवं पीतांबरधारी श्रीराम की उपरोक्त दिव्य नामों से स्तुति करने वाला संसारचक्र में नहीं पड़ता।

रामं लक्शमण पूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुंदरम्‌ ।
काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम्‌

राजेन्द्रं सत्यसंधं दशरथनयं श्यामलं शान्तमूर्तिम्‌ ।
वन्दे लोकभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम्‌ ॥२६॥

लक्ष्मण जी के पूर्वज , सीताजी के पति, काकुत्स्थ, कुल-नंदन, करुणा के सागर , गुण-निधान , विप्र भक्त, परम धार्मिक , राजराजेश्वर, सत्यनिष्ठ, दशरथ के पुत्र, श्याम और शांत मूर्ति, सम्पूर्ण लोकों में सुन्दर, रघुकुल तिलक , राघव एवं रावण के शत्रु भगवान् राम की मैं वंदना करता हूँ।

रामाय रामभद्राय रामचंद्राय वेधसे ।
रघुनाथाय नाथाय सीताया: पतये नम: ॥२७॥
राम, रामभद्र, रामचंद्र, विधात स्वरूप , रघुनाथ, प्रभु एवं सीताजी के स्वामी की मैं वंदना करता हूँ।

श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम ।
श्रीराम राम भरताग्रज राम राम ।
श्रीराम राम रणकर्कश राम राम ।
श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥२८॥

हे रघुनन्दन श्रीराम ! हे भरत के अग्रज भगवान् राम! हे रणधीर, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ! आप मुझे शरण दीजिए।

श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि ।
श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि ।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि ।

श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥२९॥
मैं एकाग्र मन से श्रीरामचंद्रजी के चरणों का स्मरण और वाणी से गुणगान करता हूँ, वाणी द्धारा और पूरी श्रद्धा के साथ भगवान् रामचन्द्र के चरणों को प्रणाम करता हुआ मैं उनके चरणों की शरण लेता हूँ।

माता रामो मत्पिता रामचंन्द्र: ।
स्वामी रामो मत्सखा रामचंद्र: ।
सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालु ।

नान्यं जाने नैव जाने न जाने ॥३०॥
श्रीराम मेरे माता, मेरे पिता , मेरे स्वामी और मेरे सखा हैं | इस प्रकार दयालु श्रीराम मेरे सर्वस्व हैं. उनके सिवा में किसी दुसरे को नहीं जानता।

दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे तु जनकात्मजा।
पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनंदनम्‌ ॥३१॥

जिनके दाईं और लक्ष्मण जी, बाईं और जानकी जी और सामने हनुमान ही विराजमान हैं, मैं उन्ही रघुनाथ जी की वंदना करता हूँ।

लोकाभिरामं रनरङ्‌गधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्‌ ।
कारुण्यरूपं करुणाकरंतं श्रीरामचंद्रं शरणं प्रपद्ये ॥३२॥

मैं सम्पूर्ण लोकों में सुन्दर तथा रणक्रीड़ा में धीर, कमलनेत्र, रघुवंश नायक, करुणा की मूर्ति और करुणा के भण्डार की श्रीराम की शरण में हूँ।

मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्‌ ।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥३३॥

जिनकी गति मन के समान और वेग वायु के समान (अत्यंत तेज) है, जो परम जितेन्द्रिय एवं बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हैं, मैं उन पवन-नंदन वानरग्रगण्य श्रीराम दूत की शरण लेता हूँ ।

कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम्‌ ।
आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम्‌ ॥३४॥

मैं कवितामयी डाली पर बैठकर, मधुर अक्षरों वाले ‘राम-राम’ के मधुर नाम को कूजते हुए वाल्मीकि रुपी कोयल की वंदना करता हूँ।

आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसंपदाम्‌ ।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्‌ ॥३५॥

मैं इस संसार के प्रिय एवं सुन्दर उन भगवान् राम को बार-बार नमन करता हूँ, जो सभी आपदाओं को दूर करने वाले तथा सुख-सम्पति प्रदान करने वाले हैं।

भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसंपदाम्‌ ।
तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम्‌ ॥३६॥

‘राम-राम’ का जप करने से मनुष्य के सभी कष्ट समाप्त हो जाते हैं। वह समस्त सुख-सम्पति तथा ऐश्वर्य प्राप्त कर लेता हैं। राम-राम की गर्जना से यमदूत सदा भयभीत रहते हैं।

रामो राजमणि: सदा विजयते रामं रमेशं भजे ।
रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नम: ।

रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोSस्म्यहम्‌ ।
रामे चित्तलय: सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ॥३७॥

राजाओं में श्रेष्ठ श्रीराम सदा विजय को प्राप्त करते हैं। मैं लक्ष्मीपति भगवान् श्रीराम का भजन करता हूँ। सम्पूर्ण राक्षस सेना का नाश करने वाले श्रीराम को मैं नमस्कार करता हूँ। श्रीराम के समान अन्य कोई आश्रयदाता नहीं। मैं उन शरणागत वत्सल का दास हूँ। मैं हमेशा श्रीराम मैं ही लीन रहूँ। हे श्रीराम! आप मेरा (इस संसार सागर से) उद्धार करें।

राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे ।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥३८॥

(शिव पार्वती से बोले –) हे सुमुखी ! राम- नाम ‘विष्णु सहस्त्रनाम’ के समान हैं। मैं सदा राम का स्तवन करता हूँ और राम-नाम में ही रमण करता हूँ।

इति श्रीबुधकौशिकविरचितं श्रीरामरक्षास्तोत्रं संपूर्णम्‌ ॥

॥ श्री सीतारामचंद्रार्पणमस्तु ॥

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Author: sssrknews

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