Home » ताजा खबर » कुशा एक साधारण घास या चमत्कारी वनस्पति का आध्यात्मिक पौराणिक वैज्ञानिक महत्त्व क्या है आओ जानें

कुशा एक साधारण घास या चमत्कारी वनस्पति का आध्यात्मिक पौराणिक वैज्ञानिक महत्त्व क्या है आओ जानें

सनातन धर्म में पूजा-पाठ, यज्ञ, श्राद्ध और कर्मकांड कुशा (दर्भ) के बिना अधूरे माने जाते हैं। दिखने में यह एक साधारण सी घास लग सकती है, लेकिन हमारे शास्त्रों और विज्ञान में इसका स्थान अत्यंत ऊँचा है। आइए जानते हैं इसके अद्भुत रहस्य।
पौराणिक मान्यताएं और उत्पत्ति।
माता सीता के केश: मान्यता है कि जब माता सीता धरती में समा रही थीं, तब श्रीराम ने उन्हें रोकने का प्रयास किया, लेकिन उनके हाथ में केवल सीता जी के केश आए, जो कुशा में परिवर्तित हो गए।
अमृत का स्पर्श: गरुड़ जी ने अपनी माता विनता को दासीपन से मुक्त कराने के लिए स्वर्ग से जो अमृत कलश लाकर रखा था, वह कुशा घास पर ही रखा था। (इसी कुशा को चाटने के कारण सर्पों की जीभ दो भागों में बंट गई थी)।
वराह अवतार: भगवान विष्णु के वराह अवतार द्वारा अपने शरीर को झटकने पर गिरे रोम से भी कुशा की उत्पत्ति मानी गई है।
कुशा का वैज्ञानिक और तार्किक पक्ष:
ऊर्जा का कुचालक (Bad Conductor): वैज्ञानिक दृष्टि से कुशा ऊर्जा की कुचालक है। जब हम कुशा के आसन पर बैठकर ध्यान या पूजा करते हैं, तो हमारे शरीर की आध्यात्मिक ऊर्जा (Static Electricity) धरती में जाकर नष्ट नहीं होती।
पवित्री (अंगूठी): अनामिका उंगली (सूर्य की उंगली) में कुशा की अंगूठी पहनने से शरीर की ऊर्जा और तेज सुरक्षित रहता है।
ग्रहण के समय प्रयोग: ऊर्जा की कुचालक होने के कारण ही सूर्य या चंद्र ग्रहण के समय इसे भोजन और पानी में डाला जाता है, ताकि हानिकारक पराबैंगनी किरणों का असर खाने पर न पड़े।
जल शुद्धि: कलश में कुशा डालने से जल लंबे समय तक जीवाणु मुक्त और पवित्र रहता है।
रोचक तथ्य: क्या आप जानते हैं कि ‘कुशल’ और ‘कुशाग्र’ (तेज बुद्धि वाला) शब्द कुशा से ही बने हैं? प्राचीन काल में गुरुकुल में जो शिष्य बिना हाथ कटाए इस तीक्ष्ण घास को उखाड़ कर ले आता था, उसे ‘कुशल’ कहा जाता था!
ज्योतिषीय महत्त्व: कुशा का स्वामी ग्रह ‘केतु’ है, जिसे अध्यात्म और मोक्ष का कारक माना गया है। केतु की शांति और राहु-केतु के बुरे प्रभावों से बचने के लिए कुशा का उपयोग विशेष फलदायी होता है।
कुशोत्पाटिनी (कुशाग्रहणी) अमावस्या:
भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अमावस्या (पिठौरी अमावस्या) के दिन वर्ष भर के धार्मिक कार्यों के लिए कुशा उखाड़ने का विधान है। इस दिन “ॐ हुम् फट स्वाहा” मंत्र के साथ, उत्तराभिमुख होकर बिना कटी-फटी कुशा को जड़ सहित उखाड़कर घर में संचित किया जाता है।
सनातन धर्म की ये परंपराएं केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि गहरा विज्ञान हैं। अगली बार जब आप पूजा में कुशा का उपयोग करें, तो इसके इस महान महत्त्व को अवश्य याद रखें!

मासिक दुर्गाष्टमी हर महीने के शुक्ल पक्ष अष्टमी को मनाई जाती है, जिसमें माँ दुर्गा की पूजा से कष्ट दूर होते हैं और सुख-समृद्धि आती है; पूजा के लिए सुबह स्नान कर लाल वस्त्र पहनें, माँ दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर उन्हें लाल फूल, श्रृंगार, और प्रसाद चढ़ाएं, दुर्गा चालीसा/सप्तशती का पाठ करें और आरती करें; व्रत में फलाहार लें और रात में गुड़-गेहूं से बना भोजन ग्रहण कर व्रत खोलें; कथा के अनुसार, माँ दुर्गा ने महिषासुर का वध कर पृथ्वी को पापों से मुक्ति दिलाई थी, इसलिए यह व्रत विजय और शक्ति का प्रतीक है।
मासिक दुर्गाष्टमी का महत्व (Significance)
कष्ट निवारण: यह व्रत जीवन के सभी कष्टों को दूर करने और सुख-समृद्धि पाने के लिए किया जाता है।
शक्ति और विजय: यह माँ दुर्गा की महिषासुर पर विजय का प्रतीक है, जो शक्ति और साहस प्रदान करती है।
आध्यात्मिक लाभ: इससे आध्यात्मिक ऊर्जा और मानसिक शांति मिलती है।
कन्या पूजन: कई जगहों पर इस दिन 6-12 वर्ष की कन्याओं का पूजन किया जाता है, जिन्हें देवी का रूप माना जाता है।
पूजा विधि (Puja Method)
सुबह की तैयारी: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ, खासकर लाल, वस्त्र धारण करें।
पूजा स्थल की सफाई: पूजा स्थल को गंगाजल छिड़क कर पवित्र करें और चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं।
प्रतिमा स्थापना: माँ दुर्गा की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें।
श्रृंगार और भोग: माँ को लाल चुनरी, सोलह श्रृंगार का सामान (सुहाग की चूड़ियाँ, सिंदूर, बिंदी आदि), लाल फूल, माला और अक्षत चढ़ाएं। फल, मिठाई और चरणामृत का भोग लगाएं।
पाठ और आरती: घी का दीपक जलाकर दुर्गा चालीसा, दुर्गा सप्तशती या दुर्गा स्तुति का पाठ करें और आरती करें।
व्रत खोलना: शाम को गेहूं और गुड़ से बनी चीजें (जैसे रोटी, पूड़ी) खाकर या फलाहार (फल, दूध, दही) लेकर व्रत खोल सकते हैं, अनाज और दालों से बचें।
मासिक दुर्गाष्टमी व्रत कथा (Story)
एक बार महिषासुर नामक राक्षस ने तीनों लोकों में आतंक मचाया।
देवताओं ने मिलकर अपनी शक्तियों से माँ दुर्गा को उत्पन्न किया, जिन्हें देवताओं ने अपने अस्त्र-शस्त्र दिए।
माँ दुर्गा ने महिषासुर को युद्ध के लिए ललकारा, नौ दिनों तक चले भीषण युद्ध के बाद अपने त्रिशूल से उसका वध कर दिया और पृथ्वी को पाप मुक्त कराया।
जिस दिन माँ ने यह कार्य किया, उसी दिन से मासिक दुर्गाष्टमी का पर्व मनाया जाने लगा, जो माँ दुर्गा की विजय और शक्ति का प्रतीक है।

sssrknews
Author: sssrknews

इस खबर पर अपनी प्रतिक्रिया जारी करें

Leave a Comment

Share This