मुझे पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव की वह दो टूक लाइन याद आती है कि “विकास गया तेल लेने…! हम समाज सुधारक नहीं हैं। हम राजनीति के बिजनेस में हैं। अगर वे गटर में पड़े रहना चाहते हैं तो रहने दो।” क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि विकास के कारण भी हार हो सकती है? अर्थात कोई नेता या पार्टी केवल इसलिये हार जाये क्योंकि उसने विकास किया। सुनने में ये अजीब और हास्यास्पद ज़रूर लगे लेकिन अपने भारत के संदर्भ में ये बिल्कुल सच है। असल में इस चुनाव से कुछ पहले देवघर की बात है। देवघर मतलब बाबा बैद्यनाथ की नगरी जो कि हमारे 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। वह गोड्डा लोकसभा क्षेत्र में आता है और वहाँ के वर्तमान सांसद तेजतर्रार निशिकांत दुबे हैं जिन्होंने देवघर में AIMS से लेकर एयरपोर्ट और नये रेलवे स्टेशन आदि ढेरों काम करवाये। चुनाव से कुछ दिन पहले वहाँ प्रधानमंत्री मोदी जी गये थे और उन्होंने वहाँ बाबा बैद्यनाथ मंदिर में पूजा करने के उपरांत उस मंदिर के जीर्णोउद्धार के लिये 700 करोड़ देने का ऐलान किया था। बस इसी बात से वहाँ मंदिर के आसपास के लोग बहुत नाराज़ हो गये कि पहले तो एयरपोर्ट और एम्स और अब मंदिर का जीर्णोउद्धार! ‘हम भाजपा को वोट देबे नहीं करेंगे। न भाजपा सत्ता में आयेगी और न मंदिर का जीर्णोउद्धार होगा।’ सांसद द्वारा ये समझाने पर कि अरे बाबा मंदिर का जीर्णोउद्धार होगा तो यहाँ और भी ज़्यादा श्रद्धालु आयेंगे जिससे पूरे देवघर शहर की आमदनी बढ़ेगी। क्योंकि लोग आयेंगे तो यहीं होटल में रुकेंगे, कुछ खायेंगे, कुछ खरीदेंगे, पूजा पाठ करेंगे और दान दक्षिणा भी देंगे। वे लोग उलटे लड़ने लगेः ‘अगर मंदिर का जीर्णोउद्धार हुआ आसपास के सभी घर/दुकान टूटेंगे। सड़कें चौड़ी होंगी। फुटपाथ पर लाइट्स लगेंगी तो गरीब दुकानदार क्या करेंगे….? आदि आदि इतनी समस्याएँ गिनवाने लगे कि अंततः सांसद ने पूजा करके चुपचाप वापस हो जाना बेहतर समझा। अभी सुनने में आया कि वहाँ के सांसद (भाजपा) भी हारते-हारते बचे हैं तो इस भयावह अनुभव के बाद मुझे अच्छे से समझ आ गया कि आखिर लोग चाहते क्या हैं? क्यों अयोध्या से लेकर वाराणसी तक में भाजपा कहीं हार गई तो कहीं हारते-हारते बची है? लिखते हुए तो अच्छा नहीं लग रहा है, लेकिन एक बार पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने कटेशरों के संबंध में कहा थाः अरे “वे गटर में पड़े रहना चाहते हैं तो रहने दो न” तो भाई जी काहे उन्हें वहाँ से निकालने का प्रयास कर रहे हो? अगर तुम उन्हें गटर से निकालने का प्रयास करोगे तो वे तुम्हीं से रूष्ट होकर चुनाव में हरा देंगे। हालांकि नरसिंह राव ने ये उक्ति “कटेशरों” के लिये कही थी लेकिन अब लगता है कि उनकी ये उक्ति इस खेमे के लिये भी पूरी तरह सच है। सूत्रों के अनुसार मोदी जी बनारस भी इसीलिये हारते हारते बचे हैं क्योंकि उन्होंने काशी विश्वनाथ मंदिर को गंदी-बजबजाती नालियों और तंग गलियों से मुक्त करवा दिया। उन्होंने काशी का कायाकल्प करते हुए वहाँ गंगा घाट पर क्रूज़ और बोट चलवा दिये जिससे कि वहाँ के पंडित और मल्लाह नाराज़ हो गये..! पंडित इसलिये नाराज़ हो गये क्योंकि मोदी जी ने मंदिर के पास से सभी अवैध और कब्ज़ा की गई ज़मीन से उन्हें दो तीन गुना मुआवजा देकर हटा दिया। जबकि मल्लाह इसलिये नाराज़ हो गये क्योंकि पुरानी काशी में अपने टूटे-फूटे बोट से थोड़ा बहुत कमा लेते थे। लेकिन क्रूज़ और आधुनिक बोट आने से उनकी एकछत्रता खत्म हो गयी। (सिर्फ़ एकछत्रता ही खत्म हुई कमाई नहीं। क्योंकि पहले जहाँ रोज़ाना 200 लोग बनारस जाते थे तो अब 2000 लोग रोज़ जाते हैं। इसी तरह पहले जहाँ उनकी बोट पर पहले 100 लोग बैठते थे अब 150-200 लोग बैठते हैं) इसलिये मल्लाह भी भाजपा से बहुत नाराज़ हैं, जिनकी संख्या ढाई लाख के लगभग बताई जाती है..! शायद ऐसा ही कुछ अयोध्या के बारे में भी हो। क्योंकि चौड़ी सड़क, एयरपोर्ट तक के लिये कनेक्टिविटी,पार्क आदि के लिये जो तोड़ फोड़ हुई होगी इससे वहाँ के लोग नाराज़ होंगे। कुल मिलाकर हम हिंदुओं की तरफ़ से संदेश ये हैः ‘देखो हमको विकास-फिकास नहीं चाहिये। हम को नाली में पड़े रहने में ही सुख है। तथा हमें गंदी बजबजाती नालियों, अतिक्रमित संकरी गलियों और टूटे फूटे मंदिरों (अगर मंदिर की जगह टेंट रहे तो और भी उत्तम) में ही आस्था नज़र आती है। इसलिये इन्हें बदलने की कोशिश मत करो।’ बस हमको 400 रुपये में गैस सिलिंडर, 60 रुपये लीटर पेट्रोल और 25 रुपये किलो प्याज़ देते रहो हम उसी में खुश हैं..! और हाँ, साल में दो चार सरकारी नौकरी (चपरासी, किरानी, मास्टरी आदि) की वैकेंसी निकालते रहो। 100-200 यूनिट बिजली फ़्री देते रहो। फ़िर देखो कि हम आपको कैसे भर-भर के वोट देते हैं लेकिन अगर कहीं विकास-फिकास की बात की तो फ़िर इस बार प्रधानमंत्री को भी उनकी सीट बचाना मुश्किल हो जायेगा। समझे क्या….? अब हमें इतना तो पता ही है कि घी किसे हजम नहीं होता..!
जय सियाराम
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साभार : बहन अंजली यादव जी के वाल से





