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₹1000 करोड़ की मांग, कोर्ट ने दिए ₹10 करोड़: 11 साल पुराने जयदेव-पूनम श्रॉफ तलाक केस में बड़ा फैसला

मुंबई: मुंबई के हाई-प्रोफाइल जयदेव श्रॉफ और पूनम श्रॉफ तलाक मामले में बांद्रा फैमिली कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। करीब 11 साल तक चले इस वैवाहिक विवाद में कोर्ट ने पति जयदेव श्रॉफ को पत्नी पूनम श्रॉफ को ₹10 करोड़ की एकमुश्त स्थायी एलिमनी देने का आदेश दिया। यह फैसला ऐसे समय आया है, जब देश में तलाक, गुजारा-भत्ता और वैवाहिक कानूनों के इस्तेमाल को लेकर लगातार बहस होती रही है।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला वर्ष 2015 में शुरू हुआ था। 6 अक्टूबर 2015 को जयदेव श्रॉफ ने तलाक की याचिका दायर की थी। इसके बाद दोनों पक्षों के बीच लंबे समय तक कानूनी लड़ाई चली।

पूनम श्रॉफ की ओर से स्थायी गुजारा-भत्ते के तौर पर ₹1000 करोड़ की मांग की गई थी। दलील थी कि पति की आर्थिक स्थिति, आय और संपत्ति को देखते हुए इतनी राशि उनके और उनकी बेटी के भविष्य के लिए जरूरी है।

11 साल की कानूनी लड़ाई की टाइमलाइन

  • 6 अक्टूबर 2015: जयदेव श्रॉफ ने तलाक की याचिका दायर की।
  • 2018: कोर्ट ने पूनम श्रॉफ के लिए ₹7 लाख प्रति माह और बेटी के लिए ₹5 लाख प्रति माह अंतरिम भरण-पोषण तय किया।
  • 2 जनवरी 2026: कोर्ट ने विवाह समाप्त करने का आदेश देते हुए ₹10 करोड़ की स्थायी एलिमनी तय की।
  • 14 जनवरी 2026: जयदेव श्रॉफ की ओर से ₹10 करोड़ कोर्ट में जमा किए गए।

₹1000 करोड़ की मांग पर कोर्ट ने क्या फैसला दिया?

कोर्ट ने दोनों पक्षों की आर्थिक स्थिति, आय, संपत्ति और जीवन-स्तर समेत संबंधित परिस्थितियों पर विचार करने के बाद ₹1000 करोड़ की मांग को स्वीकार नहीं किया।

कोर्ट ने ₹10 करोड़ की राशि को उचित और संतुलित मानते हुए इसे पूर्ण एवं अंतिम निपटान के तौर पर तय किया।

इस फैसले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि भारत में बड़े एलिमनी दावों का निर्धारण किन आधारों पर होना चाहिए और पति-पत्नी के आर्थिक अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

क्या वैवाहिक कानूनों के दुरुपयोग पर बहस जरूरी है?

इस तरह के हाई-प्रोफाइल मामलों के सामने आने के बाद सोशल मीडिया और कानूनी हलकों में वैवाहिक कानूनों और एलिमनी प्रावधानों के संभावित दुरुपयोग को लेकर चर्चा शुरू हो जाती है।

हालांकि, किसी एक मामले के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि सभी वैवाहिक या गुजारा-भत्ता संबंधी मामले झूठे हैं। अदालतें प्रत्येक मामले में उपलब्ध साक्ष्यों, दोनों पक्षों की आर्थिक स्थिति और जरूरतों को देखते हुए फैसला करती हैं।

कानूनी विशेषज्ञों का भी मानना है कि जहां कानून का दुरुपयोग रोकना जरूरी है, वहीं वास्तविक पीड़ितों को न्याय और आर्थिक सुरक्षा मिलना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

11 साल लंबी सुनवाई ने फिर उठाया सवाल

जयदेव श्रॉफ और पूनम श्रॉफ का यह मामला सिर्फ ₹1000 करोड़ बनाम ₹10 करोड़ की रकम तक सीमित नहीं है। इसने भारत में लंबे समय तक चलने वाले वैवाहिक मुकदमों, एलिमनी की गणना और कानूनी प्रक्रिया में तेजी की जरूरत पर भी चर्चा छेड़ दी है।

कानून का उद्देश्य किसी भी पक्ष को परेशान करना या आर्थिक दबाव बनाना नहीं, बल्कि दोनों पक्षों के अधिकारों के बीच न्यायसंगत संतुलन कायम करना है।

इस मामले का सबसे बड़ा संदेश यही है कि एलिमनी की रकम तय करने में केवल मांग की गई राशि नहीं, बल्कि वास्तविक आर्थिक स्थिति, जरूरत, जीवन-स्तर और मामले की परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण होती हैं।

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