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जिउतिया पर्व 2026: दादी माँ के आशीर्वाद और पारिवारिक संस्कारों से सजा श्रीवास्तव परिवार का पावन उत्सव

॥श्री राज श्यामा जी सदा सहाय॥

राधे 💞💞 राधे 🙏

जीवित्पुत्रिका व्रत ने फिर याद दिलाई परिवार, परंपरा और संस्कारों की ताकत; जानिए चील-सियारिन की पौराणिक कथा

SSSRK NEWS 24×7 | धर्म-संस्कार-संस्कृति Desk

सनातन परंपरा में अनेक ऐसे पर्व और व्रत हैं, जिनमें केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि परिवार, त्याग, प्रेम, सेवा और संस्कारों की गहरी भावना भी जुड़ी होती है। इन्हीं महत्वपूर्ण पर्वों में से एक है जिउतिया पर्व, जिसे जीवित्पुत्रिका व्रत के नाम से भी जाना जाता है।

वर्ष 2026 में भी यह पावन पर्व श्रद्धा और पारंपरिक उत्साह के साथ मनाया गया। इसी अवसर पर श्रीवास्तव परिवार की एक भावपूर्ण तस्वीर सामने आई, जिसमें परिवार के सदस्यों ने एक साथ मिलकर अपनी पारिवारिक परंपराओं और संस्कारों को जीवंत किया।

इस आयोजन का सबसे भावुक पक्ष परिवार की वरिष्ठ सदस्य दादी माँ के प्रति सम्मान और सेवा का भाव रहा।

दादी माँ को केंद्र में रखकर निभाई गई परंपरा

प्राप्त तस्वीरों और परिवार से मिली जानकारी के अनुसार, जिउतिया पर्व के अवसर पर परिवार के सदस्यों ने दादी माँ को केंद्र में रखते हुए पारंपरिक पूजा-अर्चना की।

परिवार के नाती-नतिनी, पोते-परपोते और अन्य सदस्यों ने दादी माँ के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लिया और उनके प्रति प्रेम एवं सम्मान व्यक्त किया।

इस अवसर पर प्रयास-दीपाली, परितोष-प्रियंका, तांहवी, तान्या, डॉ. शुभांगी, डॉ. शिवांगी, सताक्षी, जान्ह्वी, वैभवी, कृष्ण, राघव, परिकांश, जियांश, पर्णिका, बड़ी बेटी सरिता, छोटे दामाद बिनोद, बड़ी बहू-बेटे संगीता-संजीव (मिक्कू), मझली बहू-बेटे डॉ. स्मृता-राजीव (रिक्कू), तथा छोटे बहू-बेटे प्रीति-संदीप सहित परिवार के सदस्यों ने परंपरा में सहभागिता की।

यह दृश्य केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि पीढ़ियों को जोड़ने वाले पारिवारिक संस्कारों की खूबसूरत तस्वीर बनकर सामने आया।

पूजा की थाली में दिखाई दी परंपरा की झलक

तस्वीरों में परिवार की बहुएं श्रद्धापूर्वक जमीन पर बैठकर पारंपरिक पूजा की तैयारी करती दिखाई देती हैं।

पूजा सामग्री में अरवा चावल, पीली दाल, मिट्टी के पिंड, तरोई (नेनुआ), पत्तों पर रखा प्रसाद, रोली, लाल धागा यानी जिउतिया और जल आदि दिखाई देते हैं।

इन पारंपरिक सामग्रियों के माध्यम से पर्व की धार्मिक और सांस्कृतिक भावना को निभाया गया।

परिवार की वरिष्ठ सदस्य के प्रति सम्मान और नई पीढ़ी की इस परंपरा में भागीदारी ने यह संदेश दिया कि आधुनिक जीवनशैली के बीच भी अपनी जड़ों से जुड़े रहना परिवार को मजबूत बनाता है।

जिउतिया व्रत की पौराणिक कथा: चील और सियारिन की कहानी

जिउतिया पर्व से जुड़ी लोकपरंपराओं में चील और सियारिन की कथा विशेष रूप से सुनाई जाती है।

लोकमान्यता के अनुसार, प्राचीन समय में नर्मदा नदी के किनारे एक जंगल में एक चील और एक सियारिन रहती थीं। दोनों के बीच गहरी मित्रता थी।

एक बार दोनों ने जिउतिया व्रत रखने का संकल्प लिया।

व्रत के दौरान सियारिन भूख-प्यास के कारण परेशान हो गई। इसी बीच उसने कुछ लोगों को भोजन करते देखा। भूख से व्याकुल होकर उसने अपना व्रत तोड़ दिया और भोजन कर लिया।

दूसरी ओर, चील ने पूरी श्रद्धा और संयम के साथ व्रत पूरा किया।

लोककथा के अनुसार, अगले जन्म में दोनों ने मनुष्य के रूप में जन्म लिया। व्रत पूरा करने वाली चील का जन्म एक राजपरिवार में हुआ, जबकि सियारिन का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ।

कथा में बताया जाता है कि राजपरिवार में जन्मी स्त्री के पुत्र स्वस्थ और दीर्घायु हुए, जबकि दूसरी स्त्री के बच्चों को जीवन से जुड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

जब उसने इसका कारण जाना, तब उसे अपने पूर्व जन्म और जिउतिया व्रत की कथा का स्मरण हुआ। इसके बाद उसने श्रद्धा और नियम के साथ व्रत किया।

इसी लोकमान्यता से जुड़ी कथा के अनुसार, जिउतिया व्रत को संतान की दीर्घायु और परिवार के मंगल से जोड़कर देखा जाने लगा।

राजा जीमूतवाहन से भी जुड़ी है जिउतिया की कथा

जिउतिया पर्व की धार्मिक परंपरा में राजा जीमूतवाहन की कथा भी विशेष महत्व रखती है।

लोकमान्यता के अनुसार, राजा जीमूतवाहन ने नागवंश की रक्षा के लिए स्वयं को गरुड़ के सामने समर्पित कर दिया था। उनके त्याग और करुणा से प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद प्राप्त हुआ।

इसी कारण जिउतिया पर्व की कथाओं में त्याग, साहस, करुणा और परिवार की रक्षा जैसे मूल्यों को विशेष स्थान दिया जाता है।

कथा का संदेश क्या है?

जिउतिया से जुड़ी लोककथाएं केवल धार्मिक विश्वासों तक सीमित नहीं हैं। इनमें परिवार और रिश्तों से जुड़े कई भावनात्मक संदेश भी दिखाई देते हैं।

श्रद्धा, संयम, त्याग, सेवा और परिवार के प्रति जिम्मेदारी इस पर्व की सांस्कृतिक भावना का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

आज के समय में जब परिवार के सदस्य अलग-अलग शहरों और व्यस्त जीवनशैली में रहते हैं, ऐसे पर्व लोगों को फिर से एक साथ बैठने और अपनी पारिवारिक जड़ों से जुड़ने का अवसर देते हैं।

Family Values: संस्कारों से जुड़ना ही परिवार की असली ताकत

SSSRK परिवार का मानना है कि व्यवसाय, आधुनिक जीवन और व्यक्तिगत सफलता के साथ-साथ अपनी संस्कृति, परिवार और संस्कारों से जुड़े रहना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

दादी माँ के प्रति सम्मान, बड़ों का आशीर्वाद लेना और बच्चों को पारंपरिक रीति-रिवाजों से परिचित कराना केवल एक धार्मिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि पीढ़ियों के बीच संबंधों को मजबूत करने का माध्यम भी है।

जिउतिया का यह आयोजन इसी पारिवारिक भावना की एक सुंदर झलक प्रस्तुत करता है।

जब परिवार साथ बैठता है, तो केवल पर्व नहीं मनता—संस्कार अगली पीढ़ी तक पहुंचते हैं।

🙏 जिउतिया पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं।

ईश्वर सभी परिवारों में प्रेम, सुख, स्वास्थ्य, सौहार्द और बड़ों का आशीर्वाद बनाए रखें।

Reporter

राजीव कुमार श्रीवास्तव

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IMPORTANT DISCLAIMER | महत्वपूर्ण अस्वीकरण

  1. यह समाचार और संबंधित तस्वीरें परिवार द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के आधार पर प्रस्तुत की गई हैं।
  2. जिउतिया पर्व की पूजा-विधि, परंपराएं और मान्यताएं विभिन्न क्षेत्रों और समुदायों में अलग-अलग हो सकती हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड तथा अन्य क्षेत्रों में इसके पालन की परंपराओं में अंतर संभव है। धार्मिक अनुष्ठान के लिए अपने स्थानीय पंडित या परिवार की परंपरा का पालन करें।
  3. चील-सियारिन तथा राजा जीमूतवाहन से संबंधित कथाएं धार्मिक परंपराओं, लोककथाओं और जनश्रुतियों पर आधारित हैं। इन्हें ऐतिहासिक या वैज्ञानिक तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि धार्मिक-सांस्कृतिक संदर्भ में समझा जाना चाहिए।
  4. इस लेख का उद्देश्य जिउतिया पर्व से जुड़ी पारिवारिक परंपराओं, संस्कारों और सांस्कृतिक भावनाओं को प्रस्तुत करना है।
  5. Reporter द्वारा दी जाने वाली अन्य व्यावसायिक सेवाएं इस धार्मिक एवं सांस्कृतिक समाचार से स्वतंत्र हैं।

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