2007 में ना तो भाजपा की सरकार दिल्ली में थी, ना ही जम्मू में थी…
ये नोटिस 2007 में कांग्रेस सरकार में लेह कलेक्टर द्वारा सोनम वांगचुक को भेजा गया था…
इसमें 4th पॉइंट को गौर से पढ़िये…
आपकी कुछ गलतफहमियाँ दूर हो सकती हैं…
यदि शुरुआत में ही छात्रों, अभिभावकों और विशेषज्ञों से खुलकर संवाद किया गया होता, उनकी शंकाओं का समय रहते समाधान किया गया होता, तो सम्भवतः कल सड़कों पर इतनी भीड़ न दिखाई देती। सरकार जब संवाद की मेज़ छोड़कर केवल प्रशासनिक शक्ति पर भरोसा करती है, तब वह समस्या का समाधान नहीं करती, बल्कि उसे कुछ समय के लिए टाल भर देती है।
कल के प्रदर्शन में यदि भीम आर्मी, आप और सपा से जुड़े कार्यकर्ता तथा अन्य आंदोलनजीवी तत्व मौजूद थे, तो यह भी उतना ही सच है कि बड़ी संख्या में वास्तविक किशोर छात्र-छात्राएँ भी अपनी आशंकाओं और भविष्य की चिन्ता के साथ वहाँ उपस्थित थीं। लोकतंत्र की सबसे बड़ी भूल तब होती है, जब पूरे आंदोलन का आकलन कुछ उग्र चेहरों के आधार पर कर लिया जाता है और उसके मूल प्रश्नों को अनसुना कर दिया जाता है।
सरकारें अक्सर इस भ्रम का शिकार हो जाती हैं कि चुनावी जीत हर असंतोष का अन्तिम उत्तर है, जबकि जनादेश सरकार चलाने का अधिकार देता है, जनभावना की उपेक्षा करने का लाइसेंस नहीं। राजनीति में समस्याएँ अचानक विस्फोट नहीं करतीं, वे धीरे-धीरे, परत-दर-परत जमा होती हैं; हर टाला गया निर्णय, हर अधूरा संवाद और हर अनुत्तरित प्रश्न भविष्य के किसी बड़े संकट की नींव बन जाता है।
संवाद की कमी
Diclaimer : इसका हमारी The भारत SSSRK News24x7 समाचार और राष्ट्र दर्शन (सबसे तेज़, सबसे आगे…),
यह एक आंकलन मात्र है…





