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नरेंद्र मोदी का राजनीतिक सफर: विरोध से शक्ति तक की कहानी

ममता बनर्जी की जो हालत कर दी है वो राजनीति का सबसे बड़ा संतोषजनक क्षण है। कांग्रेस अब भी ममता के साथ है ये और ज्यादा सुकून देने वाली बात है, दरसल बंगाल मे अब देखे तो बीजेपी के अलावा कोई पार्टी बची ही नहीं। ऐसा लगा था कि कांग्रेस उस गेप को भरेगी लेकिन हम भूल जाते है इनका नेता राहुल गाँधी है।

इतिहास यदि नरेंद्र मोदी का आंकलन करेगा तो उसमे 2002 के दंगे को सबसे बड़ा मील का पत्थर कहा जाएगा।

दंगों के बाद जिस तरह की राजनीति खेली गयी उसने नरेंद्र मोदी को पूरी ट्रेनिंग दी, पहली लड़ाई तो खुद प्रधानमंत्री वाजपेयी से हुई। उस लड़ाई मे मोदीजी समझ चुके थे कि RSS के बिना आगे बढ़ना मुश्किल है। ज़ब वाजपेयी सरकार की विदाई हुई उसके बाद कांग्रेस बुरी तरह से नरेंद्र मोदी के विरुद्ध लामबंद हुई।

नरेंद्र मोदी के खिलाफ एक से एक हथकंडे अपनाये गए, आपको जानकर आश्चर्य होगा कि दूरदर्शन पर मोदीजी बैन थे जबकि गुजरात दंगो पर एंटी मोदी बात करने वाले लोगो को उसी दूरदर्शन के विशेष कार्यक्रम मे बुलाया जाता था। आज ज़ब ये ही कांग्रेसी बोलते है कि बीजेपी राजनीति खेल रही है तो बड़ा सुकून मिलता है।

सोहराबुद्दीन के एनकाउंटर के समय अमित शाह को गुजरात तक छोड़ना पड़ा था, गुजरात तो छोड़िये मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के भी बजट कट गए थे। ज़ब गुजरात मे कोई निवेशक आना चाहता तो कांग्रेस का इको सिस्टम काम पर लग जाता, गुजरात के विरुद्ध लेख छपते थे।

मध्यप्रदेश मे उन दिनों इंदौर मे समिट हुई थी, एक अमेरिकी कंपनी को निवेश के लिए तैयार किया गया था। संयोग देखिए कि अगले ही दिन मध्यप्रदेश मे जल बचाने के लिए आंदोलन हो गए। नरेंद्र मोदी और शिवराज को बीच कार्यकाल मे गिराने के लिए एक दर्जन प्रयास हुए।

मोदीजी सही कहते थे लाठी खाने से ही उनकी पीठ मजबूत हुई, यदि कांग्रेस ने उन्हें इतना तंग ना किया होता तो आज मोदीजी बीजेपी की शायद दूसरी लाइन मे ही खडे होते। लेकिन चुनौती मिलती रही, वे लड़ना सीखते रहे और आज भारतीय लोकतंत्र के सबसे सफल प्रधानमंत्री ही नहीं बल्कि राजनीतिज्ञ भी बन गए।

जिस IAS अफसर ने 2002 मे उन्हें गांधीनगर मे देखा होगा और आज यदि वह अफसर दिल्ली मे बैठा हो तो वो आसानी से बता सकता है कि दिल्ली वाला मोदी गांधीनगर वाले से बहुत अलग है। ऊपर से शांत रहते है मगर अंदर ज्वालामुखी है, नीतीश कुमार, ममता, लालू, सोनिया, राहुल और ठाकरे समेत तमाम विरोधियो को ठिकाने लगा चुके है मगर मजाल आँखों मे कोई उस बेरहमी को ढूंढ निकाले।

ममता बनर्जी के साथ जो हो रहा है उसे आप पूरी पिक्चर मत समझना, ये तो ट्रेलर भी नहीं टीजर मात्र है। अखिलेश से स्टालिन तक इन सभी का प्रारब्ध किसी भयावह अंत पर ही जाएगा। ये सब ज्यादा दूर नहीं 2029-30 तक हो जाएगा। भारत मे लोकतंत्र तो जीवित रहेगा लेकिन अब दो या उससे अधिक पार्टियों का नहीं होगा।

RSS को ही बागडोर मिलेगी, यही एक संगठन है जहाँ नेता जमीन से उठकर आते है। आगे की राजनीति मे यही होना है जो नेता आएंगे वे RSS से आएंगे या उसकी विचारधारा से निकले होंगे। इसका पूरा क्रेडिट कांग्रेस के उस इको सिस्टम को जाता है जो उसने नरेंद्र मोदी को गिराने मे लगाया।

मोदी समय के साथ उठते रहे लेकिन उन्होंने किसी को माफ़ नहीं किया, यदि गुजरात दंगों को लेकर उन्हें ज़बरदस्ती परेशान ना किया जाता तो शायद इतिहास ही कुछ और होता मगर अब तो परेशान कर दिया। ममता बनर्जी तो बहुत छोटी शुरुआत है, अभी तो बड़े बड़े राजनीतिक वध होने है।

लिखना तो नहीं चाहिए मगर अब अगले 7 सालो मे जो होना है उसके बाद कई मोदी विरोधी ये भी कहेंगे कि मौत ज्यादा बेहतर होती। भारतीय इतिहास नरेंद्र मोदी को शायद एक जननायक के रूप मे या फिर सबसे महानतम शासक के रूप मे याद रखे लेकिन उनका निर्दयी प्रतिशोध शायद कभी इतिहास मे नहीं लिखा जाएगा।

साभार : परख सक्सेना जी की वाल से

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Author: sssrknews

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