परहित सरिस धरम नहिं भाई।
पर पीड़ा सम नहिं अधमाई ।।
अर्थ:इस चौपाई में प्रभु श्री राम और लक्ष्मण के संवाद के माध्यम से गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि हे भाई! दूसरों की भलाई (परोपकार) करने के समान संसार में कोई दूसरा धर्म या पुण्य नहीं है और दूसरों को कष्ट पहुँचाने या दुःख देने से बड़ा कोई दूसरा पाप (अधर्म) नहीं है।
चौपाई इंसानियत का सबसे बड़ा मूलमंत्र है। इसका सीधा सा अर्थ है कि जो इंसान निस्वार्थ भाव से दूसरों के काम आता है, वही सच्चा धार्मिक है। इसके विपरीत, जो वाणी या कर्म से किसी को भी पीड़ा देता है, उससे बड़ा पापी कोई नहीं है।



