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मानसून सत्र में नहीं पेश होगा ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ बिल, सरकार का फोकस महिला आरक्षण पर

मानसून सत्र: ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ बिल फिलहाल टला, सरकार का फोकस महिला आरक्षण और परिसीमन पर

संसद का मानसून सत्र सोमवार से शुरू होने जा रहा है, लेकिन इस बार ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ विधेयक पेश किए जाने की संभावना नहीं है। सूत्रों के मुताबिक, केंद्र सरकार का मानना है कि इस विधेयक को लागू करने का लक्ष्य वर्ष 2029 के आम चुनाव हैं, इसलिए इसे लाने के लिए अभी पर्याप्त समय है। फिलहाल सरकार की प्राथमिकता महिला आरक्षण और परिसीमन (डिलिमिटेशन) विधेयक पर केंद्रित है। हालांकि परिसीमन बिल इसी सत्र में पेश होगा या नहीं, इस पर अगले एक-दो दिनों में स्थिति स्पष्ट हो सकती है।

मंत्रियों की बैठक में तय हुई रणनीति

मानसून सत्र की तैयारियों को लेकर शुक्रवार को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में मंत्रियों के समूह (ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स) की बैठक हुई। बैठक में गृह मंत्री अमित शाह, कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान, संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू, जेडीयू नेता ललन सिंह, टीडीपी नेता राम मोहन नायडू और आरएलडी नेता जयंत चौधरी समेत कई वरिष्ठ नेता शामिल हुए।

सूत्रों के अनुसार, सरकार का आकलन है कि महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे मुद्दों पर विपक्ष के कई दल समर्थन कर सकते हैं, जिससे कांग्रेस इस विषय पर अलग-थलग पड़ सकती है।

विपक्ष भी बना रहा रणनीति

मानसून सत्र से पहले विपक्षी दल भी अपनी रणनीति तैयार करने में जुटे हैं। डीएमके अध्यक्ष एम. के. स्टालिन, जो इन दिनों लंदन दौरे पर हैं, ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पार्टी नेताओं के साथ बैठक की। बैठक के बाद डीएमके नेताओं ने कहा कि यदि परिसीमन विधेयक मौजूदा स्वरूप में संसद में लाया जाता है, तो पार्टी इसका विरोध करेगी।

डीएमके नेताओं का कहना है कि मौजूदा प्रस्ताव से तमिलनाडु सहित दक्षिण भारतीय राज्यों के हित प्रभावित हो सकते हैं। उनका आरोप है कि परिसीमन के बाद दक्षिण भारत की लोकसभा सीटों की संख्या घट सकती है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि सरकार ने इस मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक बुलाई है और यदि विधेयक में आवश्यक बदलाव किए जाते हैं तो स्थिति पर पुनर्विचार किया जाएगा।

दक्षिण भारत की पार्टियों की चिंता

परिसीमन विधेयक को लेकर सबसे अधिक चिंता दक्षिण भारतीय राज्यों की राजनीतिक पार्टियों ने जताई है। उनका मानना है कि नई व्यवस्था से उत्तर और दक्षिण भारत के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व का संतुलन प्रभावित हो सकता है।

तमिलनाडु की शिवगंगा लोकसभा सीट से कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने भी इस मुद्दे पर चिंता व्यक्त की। उनका कहना है कि यदि लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाई जाती है, तो संसद में सांसदों को बोलने के अवसर और सीमित हो सकते हैं। उन्होंने आशंका जताई कि बड़ी संख्या में सांसद केवल औपचारिक उपस्थिति तक सीमित रह जाएंगे।

अब सभी की नजरें इस बात पर हैं कि सरकार मानसून सत्र में परिसीमन विधेयक पेश करती है या नहीं, और यदि करती है तो उसके अंतिम स्वरूप में क्या बदलाव किए जाते हैं।

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