एक तरफ देश के प्रधानमंत्री, दूसरी तरफ विपक्ष का एक युवा नेता। एक के हाथों में सत्ता की बागडोर, दूसरे के जुबान पर तीखे सवाल। लेकिन, जिस दिन ये दोनों आमने-सामने आए, तो प्रधानमंत्री ने ऐसा कुछ कर दिया जिसे देखकर पूरी संसद सन्न रह गई थी?
हम बात कर रहे हैं साठ के दशक की।जब देश 1965 के युद्ध के बाद नाजुक दौर से गुजर रहा था। संसद का माहौल गरम था ! देश कई चुनौतियों से गुजर रहा था।
संसद के भीतर बहस चल रही थी। एक तरफ भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी, जो अपनी सादगी, शांत स्वभाव और कम शब्दों में बड़ी बात कहने वाले नेता के रूप में जाने जाते थे।
वहीं, दूसरी तरफ विपक्ष की बेंच पर बैठे एक युवा सांसद अटल बिहारी वाजपेयी, जो विपक्ष की ओर से अपनी ओजस्वी वाणी के लिए जाने जाते थे।
संसद में अटल बिहारी वाजपेयी ने शास्त्री जी की नीतियों पर सवाल उठाए।सदन में उनकी आवाज गूंज रही थी। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ध्यान से सुन रहे थे।
लेकिन जैसे ही सदन खत्म हुआ, शास्त्री जी ने अटल जी को अपने पास बुलाया। लोग सोचे कि शायद प्रधानमंत्री उन्हें डांटने वाले हैं। लेकिन शास्त्री जी ने जो कहा, वह सुनकर आज की राजनीति के लोगों को सीख लेनी चाहिए।
शास्त्री जी ने अटल जी से कहा— ‘अटल जी, आप जो सवाल पूछते हैं, उनमें राष्ट्र का दर्द झलकता है। आप विपक्ष में जरूर हैं, लेकिन भारत के भविष्य के लिए आप उतने ही जरूरी हैं जितना मैं। आप में जो ओज है, उसे कभी कम मत होने देना।’ कहा जाता है कि कई मौकों पर, शास्त्री जी ने वाजपेयी जी की प्रखर मेधा और देशप्रेम के प्रति उनके सम्मान में सिर झुकाकर उनका अभिवादन किया था।
ये वो दौर था जहां विचारधाराएं अलग थीं, पर लक्ष्य एक था—भारत। शास्त्री जी की सादगी और वाजपेयी जी की वाकपटुता के बीच का यह रिश्ता आज की पीढ़ी के लिए एक सबक है कि राजनीति में ‘विरोध’ का मतलब ‘दुश्मनी’ नहीं होता।
लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष दुश्मन नहीं होता, बल्कि राष्ट्र को बेहतर बनाने का एक जरूरी स्तंभ होता है।
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